स्वीकारोक्तियाँ
तेरहवीं पुस्तक

अध्याय 13 · 1 घंटे 9 मिनट का पठन

तेरहवीं पुस्तक

अध्याय 1

हे मेरे परमेश्वर, मेरी दया, मैं तुझे पुकारता हूँ, जिस ने मुझे रचा, और तुझे भूल जानेवाले मुझ को न भूला। मैं तुझे अपने उस प्राण में पुकारता हूँ, जिसे तू उस लालसा के द्वारा, जो तू आप ही उस में उत्पन्न करता है, अपने लिये तैयार करता है। अब जब मैं तुझे पुकारता हूँ, तब मुझे न त्याग, तू जिस ने मेरे पुकारने से पहले ही मुझ पर कृपा की, और बार-बार अनेक प्रकार की पुकारों से मुझ पर दबाव डाला, कि मैं तुझे दूर से सुनूँ, और फिरूँ, और तुझे पुकारूँ, जो मेरे पीछे पुकारता रहा; क्योंकि हे प्रभु, तू ने मेरे सब बुरे कर्मों के दण्ड मिटा दिए, ऐसा कि जिन से मैं तुझ से गिरा, उनका बदला मेरे हाथ में न लौटाए; और तू ने मेरे सब भले कर्मों से पहले ही कृपा की, कि अपने हाथों के काम का बदला दे, जिन से तू ने मुझे बनाया; क्योंकि इससे पहले कि मैं होता, तू था; और मैं कुछ भी न था, जिसे तू होने का अनुग्रह देता; तौभी देख, मैं हूँ, तेरी भलाई से, इस सब से पहले जो तू ने मुझे बनाया, और जिस से तू ने मुझे बनाया। क्योंकि न तो तुझे मेरी आवश्यकता थी, और न मैं ऐसा कोई भला हूँ कि तेरे, अपने प्रभु और परमेश्वर के, काम आऊँ; न तेरी सेवा करने में, मानो तू काम करते-करते थक जाएगा; या ऐसा न हो कि मेरी सेवा के बिना तेरी सामर्थ्य घट जाए; और न तेरी सेवा को ऐसे जोतने में, मानो वह कोई भूमि हो, जो बिना जोते पड़ी रहेगी, यदि मैं तुझे न जोतूँ; परन्तु तेरी सेवा और आराधना इसलिये करता हूँ, कि तुझ से कल्याण पाऊँ, जिस से यह होता है कि मेरा ऐसा अस्तित्व है जो कल्याण के योग्य है।

अध्याय 2

क्योंकि तेरी भलाई की भरपूरी से ही तेरी सृष्टि बनी रहती है, कि जो भला किसी भी रीति से न तो तेरे काम आ सकता था, और न तुझ से था (ऐसा न हो कि वह तेरे तुल्य ठहरे), तौभी हो सके, क्योंकि वह तुझ से बनाया जा सकता था। क्योंकि आकाश और पृथ्वी ने, जिन्हें तू ने आदि में बनाया, तुझ से क्या पाने का हक रखा था? वे आत्मिक और शारीरिक प्रकृतियाँ, जिन्हें तू ने अपनी बुद्धि में बनाया, कहें कि उन्होंने तुझ से क्या पाने का हक रखा था कि तुझ पर निर्भर रहें (अपनी उस आरम्भिक और बेडौल दशा में भी, चाहे आत्मिक हो या शारीरिक, जो एक असंयमित स्वतंत्रता में और तुझ से बहुत दूर की असमानता में गिरने को तैयार थी;—आत्मिक, यद्यपि बिना रूप के, तौभी बनाई हुई शारीरिक से श्रेष्ठ, और शारीरिक, यद्यपि बिना रूप के, तौभी इससे भली कि वह बिलकुल कुछ भी न होती), और इस प्रकार तेरे वचन पर निर्भर रहें, बिना रूप के रहकर, जब तक कि उसी वचन के द्वारा वे तेरी एकता में लौटा न लाई जातीं, रूप से भरी हुई, और तुझ से, जो एकमात्र प्रभुतासम्पन्न भला है, वे सब अत्यन्त भली न बनाई जातीं। उन्होंने तुझ से क्या हक रखा था कि वे बेडौल भी हों, जब कि वे यह भी न होतीं, यदि तुझ से न होतीं?

शारीरिक पदार्थ ने तुझ से क्या हक रखा था कि वह अनदेखा और बेडौल भी हो? जब कि वह यह भी न होता, यदि तू ने उसे न बनाया होता, और इसलिये कि वह था ही नहीं, तुझ से बनाए जाने का हक भी न रख सकता था। अथवा वह आरम्भिक आत्मिक सृष्टि तुझ से यह हक भी कैसे रख सकती थी कि गहरे जल के समान अन्धकार में उठे और गिरे,—तुझ से भिन्न, जब तक कि उसी वचन के द्वारा, जिस से वह रची गई, वह उसकी ओर न फेरी जाती, और उसी से प्रकाशित होकर ज्योति न बन जाती; यद्यपि उसके तुल्य नहीं, तौभी उस रूप के अनुरूप, जो तेरे बराबर है? क्योंकि जैसे शरीर में, होना और सुन्दर होना एक बात नहीं, नहीं तो वह कुरूप न हो सकता; वैसे ही रची हुई आत्मा के लिये, जीना और बुद्धिमानी से जीना एक बात नहीं; नहीं तो वह अटल रीति से बुद्धिमान होती। परन्तु उसके लिये यही भला है कि वह सदा तुझ से लिपटी रहे; ऐसा न हो कि जो ज्योति उस ने तेरी ओर फिरकर पाई, उसे तुझ से फिर जाने पर खो दे, और उस अन्धकारमय गहरे जल के समान जीवन में फिर गिर पड़े। क्योंकि हम आप भी, जो प्राण के विषय में एक आत्मिक सृष्टि हैं, अपनी ज्योति तुझ से फिरकर, उस जीवन में कभी-कभी अन्धकार थे; और अब भी अपने अन्धकार के अवशेषों के बीच परिश्रम करते हैं, जब तक कि तेरे उस एकलौते में हम तेरी धार्मिकता न बन जाएँ, परमेश्वर के पहाड़ों के समान। क्योंकि हम तेरे न्याय-कार्य रहे हैं, जो महासागर के समान हैं।

अध्याय 3

जो तू ने सृष्टि के आदि में कहा, उजियाला हो, और उजियाला हो गया; मैं इसे बिना किसी अनुपयुक्तता के आत्मिक सृष्टि के विषय में समझता हूँ: क्योंकि पहले से ही एक प्रकार का जीवन था, जिसे तू प्रकाशित कर सकता था। परन्तु जैसे उसका तुझ पर ऐसे जीवन के लिये कोई हक न था, जिसे प्रकाशित किया जा सके, वैसे ही अब जब वह हो चुकी थी, तब भी उसका प्रकाशित किए जाने का कोई हक न था। क्योंकि न तो उसकी बेडौल दशा तुझे भा सकती थी, जब तक कि वह ज्योति न बन जाती, और वह भी केवल अस्तित्व में रहकर नहीं, परन्तु उस प्रकाशित करनेवाली ज्योति को निहारकर, और उससे लिपटकर; ऐसा कि जो वह जीई, और आनन्द से जीई, यह वह केवल तेरे अनुग्रह का ऋणी है, एक श्रेष्ठ परिवर्तन के द्वारा उस की ओर फिरकर जो न बुरे में और न भले में बदला जा सकता है; जो केवल तू है, क्योंकि केवल तू ही सरलता से है; तेरे लिये जीना एक बात और आनन्द से जीना दूसरी बात नहीं, क्योंकि तू आप ही अपना आनन्द है।

अध्याय 4

तब तेरी उस भलाई में, जो तू आप है, क्या घट जाता, चाहे ये वस्तुएँ या तो कभी होतीं ही नहीं, या बिना रूप के रह जातीं; जिन्हें तू ने किसी अभाव से नहीं, परन्तु अपनी भलाई की भरपूरी से बनाया, उन्हें थामे रखते और रूप में फेरते हुए, मानो तेरा आनन्द उन से पूरा हो जाता? क्योंकि तू सिद्ध है, इसलिये उनकी अपूर्णता तुझे नापसन्द है, और इसी कारण वे तुझ से सिद्ध की गईं, और तुझे भाती हैं; परन्तु ऐसे नहीं मानो तू अपूर्ण था, और उनके सिद्ध होने से तू भी सिद्ध किया जाता। क्योंकि तेरी भली आत्मा तो जल के ऊपर मँडराती थी, उन के द्वारा ऊपर उठाई हुई नहीं, मानो वह उन पर टिकी हो। क्योंकि जिन पर तेरी भली आत्मा का टिकना कहा जाता है, उन्हें वह आप ही में विश्राम देती है। परन्तु तेरी अविनाशी और अपरिवर्तनीय इच्छा, जो अपने आप में अपने लिये सर्वथा पर्याप्त है, उस जीवन के ऊपर मँडराती थी जिसे तू ने रचा था; जिसके लिये जीना और आनन्द से जीना एक बात नहीं, क्योंकि वह अपने ही अन्धकार में उठते-गिरते हुए भी जीता है: इसलिये उसके लिये यही शेष रहता है कि वह उसकी ओर फेरा जाए, जिस से वह बनाया गया, और जीवन के सोते से अधिकाधिक जीए, और उसकी ज्योति में ज्योति देखे, और सिद्ध, और प्रकाशित, और सुशोभित किया जाए।

अध्याय 5

देख, अब त्रिएकता मुझे धुँधले दर्पण में सी दिखाई देती है, जो तू मेरा परमेश्वर है, क्योंकि हे पिता, तू ने उसी में जो हमारी बुद्धि का आदि है, जो तेरी बुद्धि है, तुझ से उत्पन्न, तेरे तुल्य और तेरे साथ अनन्त, अर्थात् अपने पुत्र में, आकाश और पृथ्वी को रचा। अब हम ने आकाशों के आकाश के विषय में, और अनदेखी तथा बेडौल पृथ्वी के विषय में, और उस अन्धकारमय गहरे जल के विषय में बहुत कुछ कहा है, उसकी आत्मिक कुरूपता की भटकती हुई अस्थिरता के सम्बन्ध में, जब तक कि वह उसकी ओर न फेरी जाती, जिस से उसे उस समय की जीवन की मात्रा मिली, और उसके प्रकाशित करने से एक सुन्दर जीवन बन जाती, और उस आकाश का आकाश, जो बाद में जल और जल के बीच रखा गया। और परमेश्वर के नाम के अधीन मैं ने अब पिता को समझा, जिस ने ये वस्तुएँ बनाईं, और आदि के नाम के अधीन पुत्र को, जिस में उस ने ये वस्तुएँ बनाईं; और जैसा मैं ने किया, अपने परमेश्वर पर त्रिएकता के रूप में विश्वास करते हुए, मैं ने उसके पवित्र वचनों में आगे खोज की, और देख, तेरी आत्मा जल के ऊपर मँडराती थी। देख, त्रिएकता, मेरा परमेश्वर, पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा, सारी सृष्टि का सिरजनहार।

अध्याय 6

परन्तु इसका कारण क्या था, हे सत्य बोलनेवाली ज्योति?—तेरी ओर मैं अपना मन उठाता हूँ, वह मुझे व्यर्थ बातें न सिखाए, उसके अन्धकार को दूर कर; और मुझे बता, मैं तुझ से बिनती करता हूँ, हमारी माता प्रेम की दुहाई देकर, मुझे कारण बता, मैं तुझ से बिनती करता हूँ, कि आकाश की, और अनदेखी तथा बेडौल पृथ्वी की, और गहरे जल पर के अन्धकार की चर्चा के बाद, तेरे पवित्रशास्त्र ने अन्त में तेरी आत्मा की चर्चा क्यों की? क्या इसलिये कि यह उचित था कि उसका ज्ञान इस रीति से पहुँचाया जाए कि वह “ऊपर मँडराती हुई” है; और यह न कहा जा सकता, जब तक कि पहले उस का उल्लेख न होता, जिसके ऊपर तेरी आत्मा का मँडराना समझा जा सके। क्योंकि न तो वह पिता के ऊपर मँडराती थी, न पुत्र के, और न ठीक-ठीक यह कहा जा सकता कि वह ऊपर मँडराती है, यदि वह किसी वस्तु के ऊपर न मँडराती। तब पहले उस का उल्लेख होना था, जिसके ऊपर वह मँडरा सके; और फिर उसका, जिसके विषय में यही उचित था कि वह मँडराती हुई ही कही जाए। परन्तु उसका ज्ञान इस से भिन्न रीति से, अर्थात् ऊपर मँडराती हुई कहने के सिवा, पहुँचाना क्यों उचित न था?

अध्याय 7

इसलिये जो कर सके, वह अपनी समझ से तेरे प्रेरित के पीछे चले, जहाँ वह यों कहता है, इसलिये कि परमेश्वर का प्रेम पवित्र आत्मा के द्वारा जो हमें दिया गया है, हमारे हृदयों में उंडेला गया है: और जहाँ वह आत्मिक वरदानों के विषय में हमें प्रेम का एक और भी उत्तम मार्ग सिखाता और दिखाता है; और जहाँ वह हमारे लिये तेरे सामने घुटने टेकता है, कि हम मसीह के प्रेम का वह ज्ञान जान लें जो सब ज्ञान से बढ़कर है। और इसीलिये आदि से ही वह जल के ऊपर सर्वोपरि रीति से मँडराती थी। यह मैं किस से कहूँ? कैसे कहूँ कि बुरी अभिलाषाओं का बोझ नीचे उस गहरी खाई की ओर खींचता है; और कैसे प्रेम तेरी उस आत्मा के द्वारा फिर ऊपर उठाता है जो जल के ऊपर मँडराती थी? मैं यह किस से कहूँ? कैसे कहूँ? क्योंकि हम किसी स्थान में तो नहीं डूबते और न उभरते। इस से बढ़कर मिलता-जुलता, और तौभी इस से घटकर मिलता-जुलता क्या हो सकता है? वे भाव हैं, वे प्रेम हैं; हमारी आत्मा की मलिनता चिन्ताओं के प्रेम के साथ नीचे बहती जाती है, और तेरी पवित्रता निश्चिन्त विश्राम के प्रेम के द्वारा हमें ऊपर उठाती है; कि हम अपने हृदय तेरी ओर उठाएँ, जहाँ तेरी आत्मा जल के ऊपर मँडराती है; और उस सर्वोपरि विश्राम तक पहुँचें, जब हमारा प्राण उन जलों में से पार हो जाएगा जो कोई आधार नहीं देते।

अध्याय 8

स्वर्गदूत गिर पड़े, मनुष्य का प्राण गिर पड़ा, और इस से उन्होंने उस अन्धकारमय गहराई में उस खाई की ओर संकेत किया, जो सारी आत्मिक सृष्टि के लिये तैयार थी, यदि तू ने आदि से न कहा होता, उजियाला हो, और उजियाला हो जाता, और तेरे स्वर्गिक नगर की हर आज्ञाकारी बुद्धि तुझ से लिपट जाती, और तेरी आत्मा में विश्राम पाती, जो हर परिवर्तनशील वस्तु के ऊपर अपरिवर्तनीय रीति से मँडराती है। नहीं तो आकाशों का आकाश भी अपने आप में एक अन्धकारमय गहरा जल होता; परन्तु अब वह प्रभु में ज्योति है। क्योंकि उन आत्माओं की उस दयनीय बेचैनी में भी, जो गिर पड़ीं और तेरी ज्योति के वस्त्र से नंगी होकर अपने ही अन्धकार को प्रगट कर बैठीं, तू यह भली भाँति प्रगट करता है कि तू ने बुद्धिमान सृष्टि को कितना श्रेष्ठ बनाया; जिसे तुझ से कम किसी वस्तु से सुखमय विश्राम न मिलेगा; और इसलिये स्वयं अपने आप से भी नहीं। क्योंकि हे हमारे परमेश्वर, तू हमारे अन्धकार को उजियाला कर देगा: तुझ से हमारी ज्योति का वस्त्र उगता है; और तब हमारा अन्धकार दोपहर के समान हो जाएगा। हे मेरे परमेश्वर, तू अपने आप को मुझे दे, अपने आप को मुझे फिर दे: देख, मैं प्रेम करता हूँ, और यदि यह बहुत थोड़ा है, तो मैं और भी दृढ़ता से प्रेम करना चाहता हूँ। मैं इतना नाप नहीं सकता कि जान सकूँ, कि मुझ में अब भी कितना प्रेम घटता है, जब तक मेरा जीवन तेरे आलिंगन में न दौड़ जाए, और तब तक न मुड़े, जब तक वह तेरी उपस्थिति के गुप्त स्थान में छिप न जाए। मैं केवल यही जानता हूँ, कि तुझ को छोड़ मुझ पर धिक्कार है: न केवल अपने बाहर, परन्तु अपने भीतर भी; और जो भी बहुतायत मेरा परमेश्वर नहीं, वह मेरे लिये रीतापन है।

अध्याय 9

परन्तु क्या न तो पिता, और न पुत्र, जल के ऊपर मँडराता था? यदि इस का अर्थ यह है कि किसी स्थान में, शरीर के समान, तो पवित्र आत्मा भी न मँडराती थी; परन्तु यदि इस का अर्थ है ईश्वरत्व की वह अपरिवर्तनीय सर्वोपरिता जो सब परिवर्तनशील वस्तुओं के ऊपर है, तो पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा, तीनों जल के ऊपर मँडराते थे। तब यह केवल तेरी आत्मा के विषय में क्यों कहा गया, यह केवल उसी के विषय में क्यों कहा गया? मानो वह किसी स्थान में रही हो, जो स्थान में नहीं है, जिसके विषय में केवल यही लिखा है कि वह तेरा वरदान है? तेरे वरदान में हम विश्राम पाते हैं; वहाँ हम तेरा आनन्द भोगते हैं। हमारा विश्राम ही हमारा स्थान है। प्रेम हमें वहाँ ऊपर उठाता है, और तेरी भली आत्मा हमारी दीनता को मृत्यु के फाटकों से ऊपर उठाती है। तेरी भली इच्छा में हमारी शान्ति है। शरीर अपने ही भार से अपने स्थान की ओर खिंचता है। भार केवल नीचे की ओर ही नहीं, परन्तु अपने ही स्थान की ओर ले जाता है। आग ऊपर की ओर चढ़ती है, पत्थर नीचे की ओर। वे अपने ही भार से प्रेरित होते हैं, वे अपने ही स्थान ढूँढ़ते हैं। तेल यदि जल के नीचे उंडेला जाए, तो जल के ऊपर उठ आता है; जल यदि तेल के ऊपर उंडेला जाए, तो तेल के नीचे बैठ जाता है। वे अपने ही भार से प्रेरित होकर अपने स्थान ढूँढ़ते हैं। जब वे अपने क्रम से बाहर होते हैं, तब बेचैन रहते हैं; क्रम में लौटा दिए जाने पर वे विश्राम पाते हैं। मेरा भार मेरा प्रेम है; उसी से मैं वहन किया जाता हूँ, जहाँ कहीं मैं वहन किया जाता हूँ। हम प्रज्वलित होते हैं, तेरे वरदान से हम सुलगाए जाते हैं; और ऊपर की ओर ले जाए जाते हैं; हम भीतर ही भीतर दहकते हैं, और आगे बढ़ते हैं। हम तेरे उन मार्गों पर चढ़ते हैं जो हमारे हृदय में हैं, और यात्रा का गीत गाते हैं; हम तेरी आग से, तेरी भली आग से भीतर ही भीतर दहकते हैं, और चलते जाते हैं; क्योंकि हम यरूशलेम की शान्ति की ओर ऊपर चढ़ते हैं: क्योंकि मैं उन से आनन्दित हुआ जिन्होंने मुझ से कहा, हम प्रभु के भवन को चलें। वहीं तेरी भली इच्छा ने हमें रखा है, कि हम और कुछ न चाहें, केवल यह कि सदा वहीं बने रहें।

अध्याय 10

धन्य वह सृष्टि, जो आप तुझ से भिन्न होकर भी, उस दशा के सिवा और कोई दशा न जानती रही, कि जैसे ही वह बनी, वैसे ही, बिना किसी अन्तराल के, तेरे उस वरदान के द्वारा, जो हर परिवर्तनशील वस्तु के ऊपर मँडराता है, वह उस पुकार के द्वारा ऊपर उठा ली गई जिस से तू ने कहा, उजियाला हो, और उजियाला हो गया। जब कि हम में यह भिन्न-भिन्न समयों में हुआ, कि हम अन्धकार थे, और ज्योति बनाए गए: परन्तु उसके विषय में केवल यही कहा गया है, कि वह क्या होती, यदि वह प्रकाशित न की जाती। और यह ऐसे कहा गया है, मानो वह पहले अस्थिर और अन्धकारमय रही हो; ऐसा कि वह कारण जिस से वह अन्यथा बनाई गई, प्रगट हो जाए, अर्थात् यह कि अटल ज्योति की ओर फेरी जाकर वह ज्योति बन गई। जो कोई कर सके, वह इसे समझे; वह तुझ से पूछे। वह मुझे क्यों सताए, मानो मैं इस जगत में आनेवाले किसी मनुष्य को प्रकाशित कर सकता हूँ?

अध्याय 11

हम में से कौन सर्वशक्तिमान त्रिएकता को समझ सकता है? और तौभी कौन उसकी चर्चा नहीं करता, यदि वह वस्तुतः वही हो? विरला है वह प्राण, जो उसकी चर्चा करते हुए जानता है कि वह किसकी चर्चा कर रहा है। और वे लड़ते-झगड़ते हैं, तौभी बिना शान्ति के कोई मनुष्य वह दर्शन नहीं देखता। मेरी इच्छा है कि मनुष्य इन तीनों पर विचार करें, जो उन्हीं में हैं। ये तीनों तो त्रिएकता से बहुत ही भिन्न हैं: मैं तो केवल बताता हूँ, कि वे कहाँ अपने आप को परख सकते हैं, और वहाँ यह जाँच और अनुभव कर सकते हैं कि वे कितने दूर हैं। अब जिन तीनों की मैं ने चर्चा की, वे हैं, होना, जानना, और चाहना। क्योंकि मैं हूँ, और जानता हूँ, और चाहता हूँ: मैं जानते और चाहते हुए हूँ: और मैं अपने को होना, और चाहना जानता हूँ: और मैं होना, और जानना चाहता हूँ। तब इन तीनों में जो कोई कर सके, वह पहचाने, कि कैसा अविभाज्य जीवन यहाँ है, हाँ एक ही जीवन, मन, और एक ही तत्व, हाँ अन्ततः कैसा अविभाज्य भेद यहाँ है, और तौभी एक भेद। निश्चय मनुष्य के सामने यह है; वह अपने भीतर देखे, और परखे, और मुझे बताए। परन्तु जब वह इनके विषय में कुछ खोज ले और कह सके, तब वह यह न समझ बैठे कि उसने वह पा लिया जो इनके ऊपर है, अर्थात् वह अपरिवर्तनीय, जो अपरिवर्तनीय रीति से है, और अपरिवर्तनीय रीति से जानता है, और अपरिवर्तनीय रीति से चाहता है; और चाहे इन तीनों के कारण परमेश्वर में भी एक त्रिएकता हो, या तीनों में से हर एक में तीनों हों, ऐसा कि तीनों हर एक के हों; या दोनों ही रीति से एक साथ, अद्भुत रीति से, सरल और तौभी अनेक प्रकार से, वह अपने आप ही अपने भीतर अपने आप की सीमा, और तौभी असीम; जिस से वह है, और अपने आप को जाना जाता है और अपने लिये पर्याप्त है, अपनी एकता की उमड़ती हुई महानता से अपरिवर्तनीय रीति से वही का वही,—इसे कौन सहज में समझ सके? इसे कौन किसी भी रीति से व्यक्त कर सके? इस पर कौन किसी भी रीति से हठात् कुछ कहने का साहस करे?

अध्याय 12

अपनी स्वीकारोक्ति में आगे बढ़, हे मेरे विश्वास, अपने प्रभु परमेश्वर से कह, पवित्र, पवित्र, पवित्र, हे मेरे प्रभु परमेश्वर, तेरे नाम में हम ने बपतिस्मा पाया है, पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम में; तेरे नाम में हम बपतिस्मा देते हैं, पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम में, क्योंकि हमारे बीच भी, अपने मसीह में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी को बनाया, अर्थात् अपनी कलीसिया के आत्मिक और शारीरिक लोगों को। हाँ और हमारी पृथ्वी भी, इससे पहले कि उसने शिक्षा का रूप पाया, अनदेखी और बेडौल थी; और हम अज्ञान के अन्धकार से ढके हुए थे। क्योंकि तू ने मनुष्य को अधर्म के कारण ताड़ना दी, और तेरे न्याय-कार्य उसके लिये महासागर के समान थे। परन्तु इसलिये कि तेरी आत्मा जल के ऊपर मँडराती थी, तेरी दया ने हमारी दुर्दशा को न त्यागा, और तू ने कहा, उजियाला हो, मन फिराओ, क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट है। मन फिराओ, उजियाला हो। और इसलिये कि हमारा प्राण हमारे भीतर व्याकुल था, हम ने यरदन के देश से तुझे स्मरण किया, हे प्रभु, और उस पर्वत से जो तेरे तुल्य है, परन्तु हमारे निमित्त छोटा हुआ: और हमारा अन्धकार हमें अप्रिय लगा, हम तेरी ओर फिरे और उजियाला हो गया। और देख, हम कभी अन्धकार थे, परन्तु अब प्रभु में ज्योति हैं।

अध्याय 13

परन्तु अब तक विश्वास से, न कि दृष्टि से, क्योंकि आशा के द्वारा हमारा उद्धार हुआ है; परन्तु जो आशा देखी जाती है वह आशा नहीं। अब तक गहरा जल गहरे जल को पुकारता है, परन्तु अब तेरे झरनों के शब्द में। वह भी, जो कहता है, मैं तुम से आत्मिक लोगों की नाईं न कह सका, परन्तु शारीरिक लोगों की नाईं, वही भी अब तक अपने आप को यह नहीं समझता कि मैं ने पा लिया है, और जो बातें पीछे रह गई हैं उन्हें भूलकर आगे की बातों की ओर बढ़ता है, और बोझ से दबा हुआ कराहता है, और उसका प्राण जीवते परमेश्वर के लिये ऐसा प्यासा है जैसा हरिण जल के सोतों के लिये, और कहता है, मैं कब आऊँगा? यह चाहते हुए कि अपने उस घर से जो स्वर्ग से है, ढाँप दिया जाए, और इस निचले गहरे जल को पुकारता हुआ कहता है, इस संसार के सदृश न बनो, परन्तु अपने मन के नये हो जाने से बदलते जाओ। और, समझ में बालक न बनो, परन्तु बुराई में बालक बनो, कि समझ में सिद्ध हो जाओ; और हे निर्बुद्धि गलातियो, किस ने तुम पर जादू कर दिया? परन्तु अब अपने ही शब्द में नहीं; परन्तु तेरे शब्द में, तू जिस ने ऊपर से अपनी आत्मा भेजी; उसके द्वारा जो ऊँचे पर चढ़ गया, और अपने वरदानों के बाँध के फाटक खोल दिए, कि उसकी धाराओं का बल परमेश्वर के नगर को आनन्दित करे। उसी के लिये दूल्हे का यह मित्र आहें भरता है, अब आत्मा के पहले फल अपने साथ रखते हुए, तौभी अपने भीतर कराहता हुआ, लेपालकपन की, अर्थात् अपनी देह के छुटकारे की बाट जोहता हुआ; उसी के लिये वह आहें भरता है, दुल्हिन का एक अंग होकर; उसी के लिये वह जलन रखता है, दूल्हे का मित्र होने के नाते; उसी के लिये वह जलन रखता है, अपने लिये नहीं; क्योंकि तेरे झरनों के शब्द में, न कि अपने ही शब्द में, वह उस दूसरी गहराई को पुकारता है, जिसके विषय में जलन रखते हुए वह डरता है, कि जैसे साँप ने अपनी चतुराई से हव्वा को बहकाया, वैसे ही उनके मन उस पवित्रता से भ्रष्ट न हो जाएँ जो हमारे दूल्हे, तेरे एकलौते पुत्र में है। ओह, वह कैसी सुन्दरता की ज्योति होगी, जब हम उसे वैसा ही देखेंगे जैसा वह है, और वे आँसू बीत जाएँगे, जो रात-दिन मेरा आहार रहे हैं, जब कि वे प्रतिदिन मुझ से कहते हैं, अब तेरा परमेश्वर कहाँ है?

अध्याय 14

देख, मैं भी कहता हूँ, हे मेरे परमेश्वर, तू कहाँ है? देख, तू कहाँ है! तुझ में मैं थोड़ा साँस लेता हूँ, जब मैं आनन्द और स्तुति के शब्द में, पर्व माननेवाले के स्वर में अपना प्राण अपने भीतर से उंडेल देता हूँ। और तौभी वह फिर उदास हो जाता है, क्योंकि वह फिर गिर पड़ता है, और गहरा जल बन जाता है, या यों कहें कि अनुभव करता है कि वह अब भी गहरा जल ही है। उससे मेरा वह विश्वास कहता है जिसे तू ने रात में मेरे पाँवों को उजियाला देने के लिये सुलगाया है, हे मेरे प्राण, तू क्यों उदास है? और मुझे क्यों व्याकुल करता है? परमेश्वर पर आशा रख; उसका वचन तेरे पाँवों के लिये दीपक है: आशा रख और धीरज धर, जब तक कि रात, दुष्टों की माता, जब तक कि प्रभु का प्रकोप बीत न जाए, जिसके हम भी कभी सन्तान थे, जो कभी अन्धकार थे, जिसके अवशेष हम अपने शरीर में लिये फिरते हैं, जो पाप के कारण मरा हुआ है; जब तक कि दिन न निकले, और छायाएँ भाग न जाएँ। तू प्रभु पर आशा रख; भोर को मैं तेरी उपस्थिति में खड़ा होऊँगा, और तुझे निहारूँगा: मैं सर्वदा तुझ से अंगीकार करता रहूँगा। भोर को मैं तेरी उपस्थिति में खड़ा होऊँगा, और अपने मुख के स्वास्थ्य को देखूँगा, हे मेरे परमेश्वर, जो उस आत्मा के द्वारा जो हम में बसती है, हमारी मरणहार देहों को भी जिलाएगा, क्योंकि उस ने दया करके हमारे भीतरी अन्धकारमय और डगमगाते गहरे जल के ऊपर मँडराई है: जिससे हम ने इस यात्रा में एक बयाना पाया है, कि हम अब ज्योति हों: जब कि आशा के द्वारा हमारा उद्धार होता है, और हम ज्योति की सन्तान, और दिन की सन्तान हैं, न रात की सन्तान, और न अन्धकार की, जो तौभी हम कभी थे। उनके और हमारे बीच, मानवी ज्ञान की इस अनिश्चितता में, केवल तू ही बाँटता है; तू, जो हमारे हृदयों को परखता है, और ज्योति को दिन, और अन्धकार को रात कहता है। क्योंकि तुझे छोड़ हम में कौन भेद करता है? और हमारे पास क्या है जो हम ने तुझ से नहीं पाया? एक ही लोंदे से आदर के पात्र बनते हैं, जिस से दूसरे अनादर के भी बनते हैं।

अध्याय 15

अथवा हे हमारे परमेश्वर, तुझे छोड़ और किस ने हमारे लिये अपने ईश्वरीय पवित्रशास्त्र में हमारे ऊपर वह अधिकार का आकाशमण्डल बनाया? जैसा कहा गया है, क्योंकि आकाश एक पत्री के समान लपेट लिया जाएगा; और अब वह हमारे ऊपर चमड़े के समान तान दिया गया है। क्योंकि तेरा ईश्वरीय पवित्रशास्त्र और भी श्रेष्ठ अधिकार का है, क्योंकि जिन मरणहार लोगों के द्वारा तू उसे हमें बाँटता है, वे मृत्यु के वश हो गए। और हे प्रभु, तू जानता है, तू जानता है, कि जब मनुष्य पाप के कारण मरणहार हो गए, तब तू ने उन्हें चमड़ों से कैसे ढाँपा। इसी से तू ने अपनी पुस्तक के आकाशमण्डल को, अर्थात् अपने उन संगत वचनों को, चमड़े के समान तान दिया है, जिन्हें तू मरणहार मनुष्यों की सेवकाई के द्वारा हमारे ऊपर फैलाता है। क्योंकि उनकी मृत्यु ही के द्वारा अधिकार का वह दृढ़ आकाशमण्डल, जो उनके द्वारा तेरे प्रवचनों में रखा गया, उन सब के ऊपर और भी श्रेष्ठ रीति से तान दिया गया जो उसके नीचे हैं; जो जब तक वे यहाँ जीवित थे, इतनी श्रेष्ठ रीति से तानी नहीं गई थी। तू ने तब तक आकाश को चमड़े के समान फैलाया न था; तू ने तब तक उनकी मृत्यु की महिमा को चारों ओर बढ़ाया न था।

हे प्रभु, हम आकाशों को देखें, तेरी उँगलियों की कारीगरी को; हमारी आँखों से वह बादल हटा दे, जिसे तू ने उनके नीचे फैलाया है। वहाँ तेरी साक्षी है, जो छोटों को बुद्धि देती है: हे मेरे परमेश्वर, बालकों और दूध पीते बच्चों के मुख से अपनी स्तुति सिद्ध कर। क्योंकि हम और कोई पुस्तकें नहीं जानते, जो इस प्रकार घमण्ड को नष्ट करती हों, जो इस प्रकार बैरी और प्रतिवादी को नष्ट करती हों, जो अपने ही पापों की हिमायत करके तेरे मेल-मिलाप का विरोध करता है। हे प्रभु, मैं नहीं जानता, मैं और ऐसे किसी शुद्ध वचन नहीं जानता, जो मुझे इस प्रकार अंगीकार करने को मनाएँ, और मेरी गर्दन को तेरे जूए के नीचे नम्र बनाएँ, और मुझे तेरी सेवा व्यर्थ ही करने को बुलाएँ। हे भले पिता, मुझे इन्हें समझने दे: यह मुझे दे, जो इनके नीचे रखा गया हूँ: क्योंकि जो इनके नीचे रखे गए हैं, उन्हीं के लिये तू ने इन्हें स्थिर किया है।

इस आकाशमण्डल के ऊपर और भी जल हैं, मेरा विश्वास है कि अविनाशी, और पार्थिव विकार से अलग किए हुए। वे तेरे नाम की स्तुति करें, वे तेरी स्तुति करें, वे स्वर्गोपरि लोग, तेरे स्वर्गदूत, जिन्हें इस आकाशमण्डल की ओर ऊपर ताकने की, या पढ़कर तेरे वचन को जानने की कोई आवश्यकता नहीं। क्योंकि वे सदा तेरा मुख देखते हैं, और वहाँ समय के अक्षरों के बिना पढ़ते हैं कि तेरी अनन्त इच्छा क्या चाहती है; वे पढ़ते हैं, वे चुनते हैं, वे प्रेम करते हैं। वे सदा पढ़ते ही रहते हैं; और जो वे पढ़ते हैं वह कभी नहीं मिटता; क्योंकि चुनने और प्रेम करने के द्वारा वे तेरी युक्ति की उसी अपरिवर्तनीयता को पढ़ते हैं। उनकी पुस्तक कभी बन्द नहीं होती, और न उनकी पत्री लपेटी जाती है; क्योंकि तू आप ही उनके लिये यह है, और अनन्त काल से है; क्योंकि तू ने उन्हें इस आकाशमण्डल के ऊपर ठहराया है, जिसे तू ने निचले लोगों की निर्बलता के ऊपर दृढ़ता से स्थापित किया है, जहाँ वे ऊपर ताककर तेरी दया सीख सकें, और समय में उसका प्रचार कर सकें जिस ने समयों को बनाया। क्योंकि हे प्रभु, तेरी दया आकाशों में है, और तेरी सच्चाई बादलों तक पहुँचती है। बादल बीत जाते हैं, परन्तु आकाश बना रहता है। तेरे वचन के प्रचारक इस जीवन से निकलकर दूसरे जीवन में चले जाते हैं; परन्तु तेरा पवित्रशास्त्र लोगों के ऊपर फैला हुआ है, जगत के अन्त तक भी। तौभी आकाश और पृथ्वी भी टल जाएँगे, परन्तु तेरे वचन कभी न टलेंगे। क्योंकि पत्री एक साथ लपेटी जाएगी: और वह घास जिसके ऊपर वह फैलाई गई थी, अपनी सारी शोभा समेत टल जाएगी; परन्तु तेरा वचन सर्वदा बना रहता है, जो अब हमें बादलों के धुँधले प्रतिबिम्ब के नीचे, और आकाशों के दर्पण के द्वारा दिखाई देता है, वैसा नहीं जैसा वह है: क्योंकि हम भी, यद्यपि तेरे पुत्र के प्रिय हैं, तौभी अभी यह प्रगट नहीं हुआ कि हम क्या होंगे। वह हमारे शरीर की झिलमिली में से झाँकता है, और उस ने हमें कोमलता से पुकारा, और हमें सुलगाया, और हम उसकी सुगन्ध के पीछे दौड़े। परन्तु जब वह प्रगट होगा, तब हम उसके समान होंगे, क्योंकि हम उसे वैसा ही देखेंगे जैसा वह है। जैसा वह है, हे प्रभु, वैसी ही हमारी दृष्टि होगी।

अध्याय 16

क्योंकि तू सर्वथा जैसा है, वैसा केवल तू ही जानता है; जो अपरिवर्तनीय रीति से है, और अपरिवर्तनीय रीति से जानता है, और अपरिवर्तनीय रीति से चाहता है। और तेरा तत्व अपरिवर्तनीय रीति से जानता, और चाहता है; और तेरा ज्ञान है, और अपरिवर्तनीय रीति से चाहता है; और तेरी इच्छा है, और अपरिवर्तनीय रीति से जानती है। और तेरी दृष्टि में यह उचित नहीं जान पड़ता, कि जैसे अपरिवर्तनीय ज्योति अपने आप को जानती है, वैसे ही वह प्रकाशित की हुई और परिवर्तनशील वस्तु के द्वारा जानी जाए। इसलिये मेरा प्राण उस भूमि के समान है जहाँ जल नहीं, क्योंकि जैसे वह अपने आप को अपने आप से प्रकाशित नहीं कर सकता, वैसे ही वह अपने आप को अपने आप से तृप्त भी नहीं कर सकता। क्योंकि जीवन का सोता तेरे ही पास है, जैसे तेरी ज्योति में हम ज्योति देखेंगे।

अध्याय 17

किस ने कड़वे मनवालों को एक ही समाज में इकट्ठा किया? क्योंकि उन सब का एक ही ध्येय है, एक क्षणिक और पार्थिव सुख, जिसे पाने के लिये वे सब कुछ करते हैं, यद्यपि वे असंख्य प्रकार की चिन्ताओं के साथ इधर-उधर डगमगाते हैं। हे प्रभु, तुझे छोड़ और किस ने कहा, जल एक ही स्थान में इकट्ठे हो जाएँ, और सूखी भूमि दिखाई दे, जो तेरे लिये प्यासी है? क्योंकि समुद्र भी तेरा है, और तू ने उसे बनाया, और तेरे हाथों ने सूखी भूमि को रचा। और मनुष्यों की इच्छाओं की कड़वाहट नहीं, परन्तु जलों का एक साथ इकट्ठा होना समुद्र कहलाता है; क्योंकि तू मनुष्यों के प्राणों की बुरी अभिलाषाओं को रोकता है, और उनकी सीमाएँ ठहराता है कि वे कहाँ तक बढ़ने पाएँ, कि उनकी लहरें एक दूसरे से टकराकर टूट जाएँ: और यों तू सब वस्तुओं पर अपने प्रभुत्व के क्रम से उसे समुद्र बना देता है।

परन्तु जो प्राण तेरे लिये प्यासे हैं, और जो तेरे सामने आते हैं (और भिन्न सीमाओं से समुद्र के समाज से अलग किए हुए हैं), उन्हें तू एक मीठे सोते से सींचता है, कि भूमि अपना फल उपजाए, और हे प्रभु परमेश्वर, तेरी ऐसी आज्ञा से हमारा प्राण अपनी-अपनी जाति के अनुसार दया के काम उपजाए, अपने पड़ोसी से उसकी शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रेम रखते हुए, अपने में उसकी समानता के अनुसार बीज रखते हुए, जब हम अपनी निर्बलता के अनुभव से कंगालों पर ऐसा तरस खाते हैं कि उनकी सहायता करें; उनकी वैसी सहायता करते हुए जैसी हम चाहते कि हमारी की जाए, यदि हम भी वैसी ही आवश्यकता में होते; न केवल सहज वस्तुओं में, जैसे बीजवाली घास में, परन्तु अपनी सहायता की रक्षा में भी, अपने पूरे बल से, फलदाई वृक्ष के समान: अर्थात्, उसका भला करना जो अन्याय सहता है, बलवन्त के हाथ से उसे छुड़ाकर, और उसे न्यायपूर्ण निर्णय के महान बल से रक्षा की छाया देकर।

अध्याय 18

तो हे प्रभु, ऐसे ही, मैं तुझ से बिनती करता हूँ, जैसा तू करता है, जैसा तू प्रसन्नता और सामर्थ्य देता है, वैसे ही उगने दे, सच्चाई भूमि से उगे, और धार्मिकता स्वर्ग से नीचे झाँके, और आकाशमण्डल में ज्योतियाँ हों। हम अपनी रोटी भूखों को तोड़ दें, और घरहीन कंगालों को अपने घर ले आएँ। हम नंगों को पहिनाएँ, और अपने ही कुटुम्ब के लोगों की उपेक्षा न करें। जब ये फल भूमि से उग आएँ, तो देख यह भला है: और हमारी अस्थायी ज्योति फूट निकले; और हम भी, कर्म की इस निचली फलदाइता से मनन के आनन्द तक पहुँचकर, ऊपर के जीवन के वचन को थामे हुए, जगत में ज्योतियों के समान दिखाई दें, तेरे पवित्रशास्त्र के आकाशमण्डल से लिपटे हुए। क्योंकि वहाँ तू हमें सिखाता है, कि बौद्धिक वस्तुओं और इन्द्रियों की वस्तुओं के बीच भेद करें, जैसे दिन और रात के बीच; या उन प्राणों के बीच, जो या तो बौद्धिक वस्तुओं में, या इन्द्रियों की वस्तुओं में लगे हैं, ऐसा कि अब केवल तू ही अपने न्याय के भेद में, जैसे आकाशमण्डल के बनने से पहले, ज्योति और अन्धकार के बीच भेद न करे, परन्तु तेरी आत्मिक सन्तान भी, जो उसी आकाशमण्डल में रखी और ठहराई गई है (अब जब कि तेरा अनुग्रह सारे जगत में खोल दिया गया है), पृथ्वी पर ज्योति दे, और दिन और रात के बीच भेद करे, और समयों के चिह्न ठहरे, कि पुरानी बातें बीत गईं, और देख, सब बातें नई हो गईं; और यह कि हमारा उद्धार अब उससे अधिक निकट है जब हम ने विश्वास किया था: और यह कि रात बहुत बीत गई है, और दिन निकलने पर है: और यह कि तू अपने वर्ष को आशीष का मुकुट पहनाएगा, अपनी भलाई के मजदूरों को अपने खेत में भेजते हुए, जिसे बोने में औरों ने परिश्रम किया, और एक और खेत में भी भेजते हुए, जिसकी कटनी अन्त में होगी। यों तू माँगनेवाले की प्रार्थनाओं को पूरा करता है, और धर्मियों के वर्षों को आशीष देता है; परन्तु तू वही का वही है, और अपने उन वर्षों में जो कभी नहीं घटते, तू हमारे बीतते वर्षों के लिये एक भण्डार तैयार करता है। क्योंकि तू एक अनन्त युक्ति के द्वारा उनकी उचित ऋतुओं में पृथ्वी पर स्वर्गिक आशीषें बरसाता है। क्योंकि एक को आत्मा के द्वारा बुद्धि का वचन दिया जाता है, मानो वह बड़ी ज्योति हो: दूसरे को विश्वास; दूसरे को स्पष्ट सत्य की ज्योति के साथ वरदान, मानो दिन पर प्रभुता करने के लिये। दूसरे को उसी आत्मा के द्वारा ज्ञान का वचन, मानो छोटी ज्योति हो: दूसरे को विश्वास; दूसरे को चंगा करने का वरदान; दूसरे को सामर्थ्य के काम; दूसरे को भविष्यद्वाणी; दूसरे को आत्माओं की परख; दूसरे को अनेक प्रकार की भाषाएँ। और ये सब मानो तारे हों। क्योंकि ये सब वही एक आत्मा करता है, जो हर एक को उसका अपना बाँट देती है जैसा वह चाहती है; और तारों को प्रगट रीति से प्रगट कराती है, कि उनसे लाभ हो। परन्तु ज्ञान का वचन, जिस में सब भेद समाए हुए हैं, जो अपनी-अपनी ऋतुओं में चन्द्रमा के समान बदलते हैं, और वरदानों की वे अन्य पहचानें, जो क्रम से गिनी जाती हैं, मानो तारे हों, क्योंकि वे बुद्धि की उस चमक से घट जाती हैं, जो पहले कहे हुए दिन को आनन्दित करती है, केवल रात पर प्रभुता करने के लिये हैं। क्योंकि वे ऐसों के लिये आवश्यक हैं, जिनसे तेरा वह अति बुद्धिमान दास आत्मिक लोगों की नाईं न कह सका, परन्तु शारीरिक लोगों की नाईं; वही, जो सिद्ध लोगों के बीच बुद्धि की बातें कहता है। परन्तु शारीरिक मनुष्य, मानो मसीह में एक बालक हो और दूध पर पला हुआ, जब तक कि वह ठोस भोजन के लिये बलवन्त न किया जाए और उसकी आँख सूर्य को निहारने योग्य न हो जाए, वह ऐसी रात में न रहे जो सारी ज्योति से रहित हो, परन्तु चन्द्रमा और तारों की ज्योति से सन्तुष्ट रहे। यों तू हम से बोलता है, हे हमारे सर्वबुद्धिमान परमेश्वर, अपनी पुस्तक में, अपने आकाशमण्डल में; कि हम सब वस्तुओं को एक अद्भुत मनन में परख सकें; यद्यपि अब तक चिह्नों में, और समयों में, और दिनों में, और वर्षों में।

अध्याय 19

परन्तु पहले, अपने आप को धो, शुद्ध हो जा; अपने प्राणों में से, और मेरी आँखों के सामने से बुराई दूर कर, कि सूखी भूमि दिखाई दे। भला करना सीख, अनाथ का न्याय कर, विधवा की पैरवी कर, कि पृथ्वी भोजन के लिये हरी घास उपजाए, और फलदाई वृक्ष; और आओ, हम आपस में विवाद कर लें, प्रभु कहता है, कि आकाश के आकाशमण्डल में ज्योतियाँ हों, और वे पृथ्वी पर चमकें। उस धनवान ने भले गुरु से पूछा, कि अनन्त जीवन पाने के लिये वह क्या करे। वह भला गुरु उससे कहे (जिसे उसने केवल मनुष्य ही समझा; परन्तु वह भला है क्योंकि वह परमेश्वर है), वह उससे कहे, कि यदि वह जीवन में प्रवेश करना चाहता है, तो उसे आज्ञाओं को मानना होगा: वह अपने से बैर और दुष्टता की कड़वाहट दूर करे; हत्या न करे, व्यभिचार न करे, चोरी न करे, झूठी गवाही न दे; कि सूखी भूमि दिखाई दे, और माता-पिता का आदर, और पड़ोसी का प्रेम उपजाए। इन सब को (वह कहता है) मैं ने माना है। तब यदि पृथ्वी फलदाई है, तो इतने काँटे कहाँ से? जा, लोभ की फैली हुई झाड़ियों को उखाड़ दे; अपनी सम्पत्ति बेच दे, और कंगालों को देकर फल से भर जा, और स्वर्ग में तेरे लिये धन होगा; और यदि तू सिद्ध होना चाहता है, तो प्रभु के पीछे हो ले, उनके साथ मिलकर जिनके बीच वह बुद्धि की बातें कहता है, जो जानता है कि दिन के लिये और रात के लिये क्या बाँटना है, कि तू भी उसे जान ले, और तेरे लिये आकाश के आकाशमण्डल में ज्योतियाँ हों; जो न होंगी, यदि तेरा हृदय वहाँ न हो: और न वह भी होगा, यदि वहाँ तेरा धन न हो; जैसा तू ने भले गुरु से सुना है। परन्तु वह बंजर भूमि उदास हुई; और काँटों ने वचन को दबा दिया।

परन्तु तुम, चुने हुए वंश, तुम जगत के निर्बल जन, जिन्होंने सब कुछ त्याग दिया है, कि तुम प्रभु के पीछे हो लो; उसके पीछे चलो, और बलवन्तों को लज्जित करो; उसके पीछे चलो, हे सुन्दर पाँवो, और तुम आकाशमण्डल में चमको, कि आकाश उसकी महिमा का बखान करें, सिद्धों की ज्योति के बीच, यद्यपि स्वर्गदूतों के समान नहीं, और छोटों के अन्धकार के बीच, यद्यपि तुच्छ नहीं, भेद करते हुए। पृथ्वी पर चमको; और दिन, जो सूर्य से प्रकाशित है, दिन से बुद्धि की बात कहे; और रात, जो चन्द्रमा से चमकती है, रात को ज्ञान का वचन दिखाए। चन्द्रमा और तारे रात के लिये चमकते हैं; तौभी रात उन्हें धुँधला नहीं करती, क्योंकि वे उसे उसकी मात्रा में ज्योति देते हैं। क्योंकि देख, परमेश्वर मानो यह कहते हुए, आकाश के आकाशमण्डल में ज्योतियाँ हों; अचानक स्वर्ग से एक शब्द आया, मानो प्रचण्ड आँधी का सा हो, और आग की सी कटी हुई जीभें दिखाई दीं, और उन में से हर एक पर बैठ गईं। और आकाश के आकाशमण्डल में ज्योतियाँ बन गईं, जो जीवन का वचन थामे हुए हैं। इधर-उधर सब कहीं दौड़ो, हे पवित्र आगो, हे सुन्दर आगो; क्योंकि तुम जगत की ज्योति हो, और तुम पैमाने के नीचे नहीं रखे जाते; जिस से तुम लिपटे हो, वह ऊँचा किया गया है, और उस ने तुम्हें ऊँचा किया है। इधर-उधर दौड़ो, और सब जातियों में जाने जाओ।

अध्याय 20

समुद्र भी गर्भ धारण करके तुम्हारे कामों को उत्पन्न करे; और जल जीवधारी रेंगनेवाले जन्तु उपजाएँ। क्योंकि तुम, जो अनमोल को तुच्छ से अलग करते हो, परमेश्वर के मुख बनाए गए हो, जिसके द्वारा वह कहता है, जल उपजाएँ, वह जीवधारी नहीं जो पृथ्वी उपजाती है, परन्तु जीवधारी रेंगनेवाले जन्तु, और पंछी जो पृथ्वी के ऊपर उड़ते हैं। क्योंकि हे परमेश्वर, तेरे भेद, तेरे पवित्र जनों की सेवकाई के द्वारा, जगत की परीक्षाओं की लहरों के बीच घूमे हैं, कि अन्यजातियों को तेरे नाम में, तेरे बपतिस्मे में पवित्र करें। और इन बातों के बीच अनेक बड़े आश्चर्यकर्म किए गए, मानो बड़ी मछलियाँ हों: और तेरे दूतों के शब्द पृथ्वी के ऊपर, तेरी पुस्तक के खुले आकाशमण्डल में उड़ते हुए; कि वह उनके ऊपर, उस अधिकार के रूप में जिसके अधीन वे उड़ने को थे, तान दी गई, जहाँ कहीं वे गए। क्योंकि न तो कोई बोली है और न कोई भाषा, जहाँ उनका शब्द सुना न जाए: क्योंकि उनका स्वर सारी पृथ्वी में गूँज गया है, और उनके वचन जगत के छोर तक, क्योंकि हे प्रभु, तू ने आशीष देकर उन्हें बढ़ाया।

क्या मैं झूठ बोलता हूँ, या मिलाकर गड़बड़ कर देता हूँ, और आकाश के आकाशमण्डल में इन बातों के उजले ज्ञान, और लहराते समुद्र में तथा आकाश के आकाशमण्डल के नीचे के भौतिक कामों में भेद नहीं करता? क्योंकि जिन बातों का ज्ञान ठोस और निश्चित है, बिना पीढ़ी-दर-पीढ़ी की किसी वृद्धि के, मानो बुद्धि और ज्ञान की ज्योतियाँ हों, तौभी उन्हीं के भौतिक कार्य अनेक और नाना प्रकार के हैं; और एक वस्तु दूसरी से बढ़ती हुई, हे परमेश्वर, वे तेरी आशीष से बहुत हो जाती हैं, तू जिस ने मरणहार इन्द्रियों की उकताहट को ताज़ा किया है; कि हमारे मन की समझ में एक ही वस्तु, शरीर की गतियों के द्वारा, अनेक रीतियों से रखी और व्यक्त की जाए। इन भेदों को जल ने उत्पन्न किया; परन्तु तेरे वचन में। तेरे सत्य की अनन्तता से दूर हुए लोगों की आवश्यकताओं ने इन्हें उत्पन्न किया, परन्तु तेरे सुसमाचार में; क्योंकि जलों ने आप ही इन्हें बाहर उगल दिया, जिनकी रोगी कड़वाहट ही वह कारण थी, जिससे वे तेरे वचन में भेजे गए।

अब वे सब वस्तुएँ सुन्दर हैं जो तू ने बनाईं; परन्तु देख, तू आप अकथनीय रीति से और भी सुन्दर है, जिस ने सब को बनाया; जिससे यदि आदम न गिरा होता, तो समुद्र का खारापन उसमें से कभी न बहता, अर्थात् मनुष्य-जाति, जो इतनी गहराई तक कौतूहली, और तूफान की नाईं उमड़ती, और बेचैनी से इधर-उधर लुढ़कती है; और तब तेरे उन भण्डारियों की कोई आवश्यकता न होती जो अनेक जलों में, शारीरिक और इन्द्रिय-गोचर रीति से, रहस्यमय कर्म और वचन करते हैं। क्योंकि वे रेंगनेवाले और उड़नेवाले जन्तु अब मुझे यही अर्थ देते जान पड़ते हैं, जिनके द्वारा जो लोग शारीरिक भेदों से आरम्भ और समर्पित किए जाते हैं, उन्हें आगे कोई लाभ न होता, जब तक कि उनके प्राण को आत्मिक जीवन न मिलता, और जब तक कि प्रवेश के वचन के बाद वह सिद्धता की ओर न ताकता।

अध्याय 21

और इसी से, तेरे वचन में, समुद्र की गहराई नहीं, परन्तु जलों की कड़वाहट से अलग की हुई पृथ्वी, जीवधारी रेंगनेवाला जन्तु नहीं, परन्तु जीवते प्राण को उत्पन्न करती है। क्योंकि अब उसे बपतिस्मे की और आवश्यकता नहीं, जैसी अन्यजातियों को है, और जैसी उसे आप भी थी, जब वह जलों से ढका हुआ था; (क्योंकि स्वर्ग के राज्य में और कोई प्रवेश नहीं, क्योंकि तू ने ठहराया है कि यही प्रवेश हो:) और न वह विश्वास उपजाने के लिये आश्चर्यकर्मों की अद्भुतता ढूँढ़ता है; क्योंकि वह ऐसा नहीं कि जब तक चिह्न और अद्भुत काम न देखे, तब तक विश्वास न करे, अब जब कि विश्वासी पृथ्वी उन जलों से अलग कर दी गई है जो अविश्वास से कड़वे थे; और भाषाएँ एक चिह्न के लिये हैं, विश्वास करनेवालों के लिये नहीं, परन्तु विश्वास न करनेवालों के लिये। तब वह पृथ्वी जिसे तू ने जलों के ऊपर स्थापित किया, उस उड़नेवाली जाति की आवश्यकता नहीं रखती, जिसे तेरे वचन पर जलों ने उत्पन्न किया। तू अपना वचन उसमें अपने दूतों के द्वारा भेज: क्योंकि हम उनके काम की चर्चा करते हैं, तौभी तू ही है जो उनमें काम करता है, कि वे उसमें एक जीवता प्राण उपजाएँ। पृथ्वी उसे उत्पन्न करती है, क्योंकि पृथ्वी ही वह कारण है कि वे प्राण में इसे करते हैं; जैसे समुद्र वह कारण था कि उन्होंने जीवधारी रेंगनेवाले जन्तुओं पर, और आकाश के आकाशमण्डल के नीचे उड़नेवाले पंछियों पर काम किया, जिनकी पृथ्वी को कोई आवश्यकता नहीं; यद्यपि वह उस मछली को खाती है जो गहराई से निकाली गई, उस मेज़ पर जो तू ने विश्वास करनेवालों के सामने तैयार की है। क्योंकि इसीलिये वह गहराई से निकाला गया, कि वह सूखी भूमि को भोजन दे; और पंछी, यद्यपि समुद्र में जन्मा, तौभी पृथ्वी पर बढ़ता है। क्योंकि सुसमाचार-प्रचारकों के पहले प्रचारों का कारण मनुष्य का अविश्वास था; तौभी विश्वासी भी उनके द्वारा अनेक रीतियों से, दिन-प्रतिदिन उत्साहित और आशीषित होते हैं। परन्तु जीवता प्राण अपना आरम्भ पृथ्वी से लेता है: क्योंकि इससे केवल उन्हीं को लाभ होता है जो पहले से विश्वासियों के बीच हैं, कि वे अपने आप को इस संसार के प्रेम से रोक रखें, ताकि उनका प्राण तेरे लिये जीए, जो सुखविलासों में जीते हुए मरा हुआ था; मृत्यु लानेवाले सुखविलासों में, हे प्रभु, क्योंकि तू ही, हे प्रभु, शुद्ध हृदय का जीवनदायी आनन्द है।

तब अब तेरे सेवक पृथ्वी पर काम करें,—अविश्वास के जलों पर की नाईं नहीं, प्रचार करके और आश्चर्यकर्मों, और भेदों, और रहस्यमय वचनों से बोलकर; जिनमें अज्ञान, जो आश्चर्य की माता है, उन गुप्त चिह्नों के प्रति एक भय के कारण उन पर एकाग्र हो सके। क्योंकि आदम की उन सन्तानों के लिये, जो तुझे भूल गई हैं, विश्वास में प्रवेश ऐसा ही है, जब वे तेरे मुख से अपने आप को छिपाते और एक अन्धकारमय गहरा जल बन जाते हैं। परन्तु—अब तेरे सेवक सूखी भूमि पर की नाईं काम करें, जो महासागर के भँवरों से अलग की गई है: और वे विश्वासियों के लिये एक आदर्श ठहरें, उनके सामने जीकर, और उन्हें अनुकरण के लिये उभारकर। क्योंकि यों मनुष्य सुनते हैं, कि केवल सुनें ही नहीं, परन्तु करें भी। प्रभु को ढूँढ़ो, और तुम्हारा प्राण जीएगा, कि पृथ्वी जीवता प्राण उपजाए। संसार के सदृश न बनो। अपने आप को उससे रोक रखो: प्राण उससे बचकर जीता है जिसकी लालसा से वह मरता है। घमण्ड की उच्छृंखल जंगलीपन से, विलास की सुस्त कामुकता से, और ज्ञान के झूठे नाम से अपने आप को रोक रखो: कि जंगली पशु वश में लाए जाएँ, पशु जूए के लिये साधे जाएँ, और साँप हानिरहित हों। क्योंकि ये एक दृष्टान्त के अधीन हमारे मन की गतियाँ हैं; अर्थात्, घमण्ड की उद्धतता, वासना का सुख, और कौतूहल का विष, एक मरे हुए प्राण की गतियाँ हैं; क्योंकि प्राण ऐसा नहीं मरता कि सारी गति खो दे; क्योंकि वह जीवन के सोते को त्यागकर मरता है, और यों इस क्षणभंगुर संसार से पकड़ लिया जाता है, और उसी के सदृश बन जाता है।

परन्तु हे परमेश्वर, तेरा वचन अनन्त जीवन का सोता है; और वह टलता नहीं: इसलिये प्राण का यह भटकना तेरे वचन से रोका जाता है, जब हम से कहा जाता है, इस संसार के सदृश न बनो; कि यों पृथ्वी जीवन के सोते में एक जीवता प्राण उपजाए; अर्थात्, एक ऐसा प्राण जो तेरे वचन में संयमी बनाया गया है, तेरे सुसमाचार-प्रचारकों के द्वारा, तेरे मसीह के अनुयायियों का अनुकरण करते हुए। क्योंकि यह उसकी जाति के अनुसार है; क्योंकि मनुष्य प्रायः अपने मित्र का अनुकरण करता है। तुम (वह कहता है) वैसे बनो जैसा मैं हूँ, क्योंकि मैं भी वैसा ही हूँ जैसे तुम हो। यों इस जीवते प्राण में भले पशु होंगे, कर्म की नम्रता में (क्योंकि तू ने आज्ञा दी है, अपना काम नम्रता से करता जा, तब तू सब मनुष्यों का प्रिय होगा); और भले पशु, जो न तो खाएँ तो अति तृप्त हों, और न न खाएँ तो कुछ घटी हो; और भले साँप, जो हानि करने को घातक नहीं, परन्तु सावधान रहने को बुद्धिमान हों; और इस क्षणिक प्रकृति में केवल इतनी ही खोज करते हों, कि अनन्तता स्पष्ट देखी जाए, बनाई हुई वस्तुओं के द्वारा समझी जाकर। क्योंकि ये सृष्टि बुद्धि के अधीन आज्ञाकारी हैं, जब हम पर घातक रीति से प्रबल होने से रोकी जाकर, वे जीती और भली हैं।

अध्याय 22

क्योंकि देख, हे प्रभु, हमारे परमेश्वर, हमारे सिरजनहार, जब हमारे भाव संसार के प्रेम से रोके गए, जिससे हम बुरे जीवन के द्वारा मरे थे; और भले जीवन के द्वारा हम एक जीवता प्राण होने लगे; और तेरा वह वचन जो तू ने अपने प्रेरित के द्वारा कहा, हम में सच्चा ठहरा, इस संसार के सदृश न बनो: तब वह भी होता है जिसे तू ने तुरन्त और जोड़ा, यह कहते हुए, परन्तु अपने मन के नये हो जाने से बदलते जाओ; अब अपनी जाति के अनुसार नहीं, मानो अपने उस पड़ोसी के पीछे चलते हुए जो तुम से आगे गया, और न किसी उत्तम मनुष्य के उदाहरण के अनुसार जीते हुए (क्योंकि तू ने यह न कहा, “मनुष्य अपनी जाति के अनुसार बनाया जाए,” परन्तु, हम मनुष्य को अपने स्वरूप और समानता के अनुसार बनाएँ), कि हम परख लें कि तेरी इच्छा क्या है। क्योंकि तेरे उस भण्डारी ने (जिस ने सुसमाचार के द्वारा सन्तान उत्पन्न कीं) इसी उद्देश्य से कहा, कि वह उन्हें सदा बालक न रखे, जिन्हें उसे दूध से पालना और धाय की नाईं दुलारना पड़े; अपने मन के नये हो जाने से बदलते जाओ (वह कहता है), कि तुम परख लो कि परमेश्वर की भली, और ग्रहणयोग्य, और सिद्ध इच्छा क्या है। इसलिये तू यह नहीं कहता, “मनुष्य बनाया जाए,” परन्तु, हम मनुष्य को बनाएँ। और न तू ने कहा, “उसकी जाति के अनुसार”; परन्तु, अपने स्वरूप और समानता के अनुसार। क्योंकि मनुष्य अपने मन में नया होकर, और तेरे सत्य को निहारकर और समझकर, अपने मार्गदर्शक के रूप में किसी मनुष्य की आवश्यकता नहीं रखता, कि अपनी जाति के अनुसार उसके पीछे चले; परन्तु तेरे मार्गदर्शन से परख लेता है कि तेरी वह भली, वह ग्रहणयोग्य, और सिद्ध इच्छा क्या है: हाँ, तू उसे, जो अब योग्य बनाया गया है, सिखाता है, कि वह एकता की त्रिएकता, और त्रिएकता की एकता को पहचाने। इसलिये जो बहुवचन में कहा गया, हम मनुष्य को बनाएँ, उसमें तौभी एकवचन में और जोड़ा गया है, और परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया: और जो बहुवचन में कहा गया, अपनी समानता के अनुसार, उसमें एकवचन में और जोड़ा गया है, परमेश्वर के स्वरूप के अनुसार। यों मनुष्य परमेश्वर के ज्ञान में नया किया जाता है, अपने सिरजनहार के स्वरूप के अनुसार: और आत्मिक बनाया जाकर, वह सब बातों को परखता है (उन सब बातों को जो परखे जाने योग्य हैं), तौभी वह आप किसी मनुष्य से परखा नहीं जाता।

अध्याय 23

परन्तु यह कि वह सब बातों को परखता है, यह इसके अनुरूप है कि उसे समुद्र की मछलियों पर, और आकाश के पंछियों पर, और सब पशुओं और जंगली जन्तुओं पर, और सारी पृथ्वी पर, और हर रेंगनेवाले जन्तु पर, जो पृथ्वी पर रेंगता है, प्रभुता मिली। क्योंकि वह यह अपने मन की समझ से करता है, जिससे वह परमेश्वर की आत्मा की बातों को बूझता है; जब कि अन्यथा, मनुष्य आदर में रखा जाकर, समझ से रहित था, और पशुओं के तुल्य हो गया, और उनके समान बन गया। इसलिये हे हमारे परमेश्वर, तेरी कलीसिया में, तेरे उस अनुग्रह के अनुसार जो तू ने उस पर उंडेला है (क्योंकि हम तेरी कारीगरी हैं, भले कामों के लिये सृजे गए), न केवल वे जो आत्मिक रीति से अध्यक्ष ठहराए गए हैं, परन्तु वे भी जो आत्मिक रीति से उनके अधीन हैं जो उन पर ठहराए गए हैं,—क्योंकि इसी रीति से तू ने मनुष्य को नर और नारी बनाया, अपने आत्मिक अनुग्रह में, जहाँ शरीर के लिंग के अनुसार न तो नर है और न नारी, क्योंकि न यहूदी है न यूनानी, न दास है न स्वतंत्र।—आत्मिक जन (चाहे वे हों जो अध्यक्ष ठहराए गए हैं, या वे जो आज्ञा मानते हैं); आत्मिक रीति से परखते हैं; उस आत्मिक ज्ञान का नहीं जो आकाशमण्डल में चमकता है (क्योंकि उन्हें ऐसे परम अधिकार का न्याय न करना चाहिए), और न वे तेरी पुस्तक ही का न्याय कर सकते हैं, यद्यपि उसमें कुछ स्पष्ट रीति से नहीं चमकता; क्योंकि हम अपनी समझ को उसके अधीन कर देते हैं, और निश्चय मानते हैं, कि जो हमारी दृष्टि से छिपा भी है, वह तौभी ठीक और सच्चाई से कहा गया है। क्योंकि यों मनुष्य, यद्यपि अब आत्मिक और अपने सिरजनहार के स्वरूप के अनुसार परमेश्वर के ज्ञान में नया, तौभी व्यवस्था पर चलनेवाला हो, न कि उसका न्यायी। और न वह आत्मिक और शारीरिक मनुष्यों के उस भेद का न्याय करता है, जो तेरी आँखों के सामने जाने हुए हैं, हे हमारे परमेश्वर, और जिन्होंने अभी तक कामों के द्वारा अपने आप को हम पर प्रगट नहीं किया, कि उनके फलों से हम उन्हें पहचानें: परन्तु हे प्रभु, तू उन्हें अभी से जानता है, और तू ने आकाशमण्डल के बनने से पहले ही, गुप्त रीति से उन्हें अलग किया और बुलाया है। और न वह, यद्यपि आत्मिक, इस संसार के अशान्त लोगों का न्याय करता है; क्योंकि उसे उनसे क्या काम, कि उनका न्याय करे जो बाहर के हैं, यह न जानते हुए कि उनमें से कौन आगे चलकर तेरे अनुग्रह की मिठास में आएगा; और कौन अभक्ति की सदा की कड़वाहट में बना रहेगा?

इसलिये मनुष्य, जिसे तू ने अपने ही स्वरूप के अनुसार बनाया, उसे स्वर्ग की ज्योतियों पर, न उस छिपे हुए स्वर्ग ही पर, न दिन और रात पर, जिन्हें तू ने आकाश की नींव से पहले पुकारा, न जलों के इकट्ठे होने पर, जो समुद्र है, प्रभुता मिली; परन्तु उसे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पंछियों, और सब पशुओं, और सारी पृथ्वी, और उन सब रेंगनेवाले जन्तुओं पर प्रभुता मिली जो पृथ्वी पर रेंगते हैं। क्योंकि वह न्याय करता और जो ठीक पाता है उसे ठहराता है, और जो अनुचित पाता है उसे अस्वीकार करता है, चाहे उन भेदों के मानने में जिनके द्वारा ऐसे लोग आरम्भ किए जाते हैं, जैसे तेरी दया अनेक जलों में खोज निकालती है: या उसमें, जिसमें वह मछली प्रगट की जाती है, जो गहराई से निकाली जाकर, भक्त पृथ्वी उसे खाती है: या वचनों की अभिव्यक्तियों और चिह्नों में, जो तेरी पुस्तक के अधिकार के अधीन हैं,—ऐसे चिह्न, जो मुख से निकलते और गूँजते हैं, मानो आकाशमण्डल के नीचे उड़ते हुए, अर्थ बताकर, समझाकर, प्रवचन करके, विवाद करके, समर्पित करके, या तुझ से प्रार्थना करके, कि लोग उत्तर दें, आमीन। इन सब वचनों का मुख से उच्चारण, इस संसार की गहराई, और शरीर के अन्धेपन के कारण होता है, जो विचारों को देख नहीं सकता; ऐसा कि कानों में ऊँचे स्वर से बोलना पड़ता है; ऐसा कि यद्यपि उड़नेवाले पंछी पृथ्वी पर बढ़ जाते हैं, तौभी वे अपना आरम्भ जलों से लेते हैं। आत्मिक मनुष्य विश्वासियों के कामों और जीवन में भी, जो ठीक है उसे स्वीकार करके, और जो अनुचित पाता है उसे अस्वीकार करके न्याय करता है; उनके दान, मानो पृथ्वी फल उपजाती हो, और जीवते प्राण के, जो पवित्रता में, उपवास में, पवित्र मननों में, भावों को वश में करके जीता है; और उन वस्तुओं के भी, जो शरीर की इन्द्रियों से बूझी जाती हैं। इन सब पर अब वह न्याय करता कहा जाता है, जिनमें उसे सुधार का भी अधिकार है।

अध्याय 24

परन्तु यह क्या है, और यह किस प्रकार का भेद है? देख, हे प्रभु, तू मनुष्य-जाति को आशीष देता है, कि वे फूलें-फलें और बढ़ें, और पृथ्वी में भर जाएँ; क्या तू इसके द्वारा हमें कुछ समझने का संकेत नहीं देता? तू ने उस ज्योति को, जिसे तू ने दिन कहा, वैसे ही आशीष क्यों न दी; न आकाश के आकाशमण्डल को, न ज्योतियों को, न तारों को, न पृथ्वी को, न समुद्र को? हे परमेश्वर, मैं कह सकता कि तू ने, जिस ने हमें अपने स्वरूप के अनुसार सृजा, यह आशीष विशेष रीति से मनुष्य पर बरसाना तुझे भला लगा; यदि तू ने वैसे ही मछलियों और बड़ी मछलियों को भी आशीष न दी होती, कि वे फूलें-फलें और बढ़ें, और समुद्र के जलों में भर जाएँ, और पंछी पृथ्वी पर बढ़ें। मैं वैसे ही कह सकता कि यह आशीष ठीक ऐसी ही सृष्टि के लिये थी, जो अपनी ही जाति से उत्पन्न होती है, यदि मैं ने इसे फलदाई वृक्षों, और पौधों, और पृथ्वी के पशुओं को दिया हुआ पाया होता। परन्तु अब न तो घास से, न वृक्षों से, न पशुओं से, न साँपों से यह कहा गया, फूलो-फलो और बढ़ो; तौभी ये सब भी, मछलियों, पंछियों, या मनुष्यों की नाईं, पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ते और अपनी जाति बनाए रखते हैं।

तब मैं क्या कहूँ, हे सत्य, मेरी ज्योति? “कि यह व्यर्थ और बिना अर्थ के कहा गया?” ऐसा नहीं, हे भक्ति के पिता, तेरे वचन के सेवक से यह दूर रहे कि वह ऐसा कहे। और यदि मैं यह न समझूँ कि उस वाक्यांश से तेरा क्या अभिप्राय है, तो मुझ से बड़े, अर्थात् जो मुझ से अधिक समझ रखते हैं, उसका उससे उत्तम उपयोग करें, जैसा तू ने, हे मेरे परमेश्वर, हर एक मनुष्य को समझने की सामर्थ्य दी है। परन्तु मेरी स्वीकारोक्ति भी तेरी आँखों में भली लगे, जिसमें मैं तुझ से अंगीकार करता हूँ, कि मुझे विश्वास है, हे प्रभु, कि तू ने यह व्यर्थ नहीं कहा; और न मैं यह छिपाऊँगा, जो यह पाठ मुझे सुझाता है। क्योंकि यह सच है, और मैं नहीं देखता कि मुझे तेरी बाइबल की आलंकारिक बातों को यों समझने से क्या रोके। क्योंकि मैं जानता हूँ कि एक वस्तु शारीरिक अभिव्यक्तियों से अनेक रीतियों से सूचित की जाती है, जो मन में एक ही रीति से समझी जाती है; और वह मन में अनेक रीतियों से समझी जाती है, जो शारीरिक अभिव्यक्ति से एक ही रीति से सूचित की जाती है। देख, परमेश्वर और अपने पड़ोसी का एकमात्र प्रेम, कितने अनेक भेदों से, और असंख्य भाषाओं से, और हर भाषा में, कितनी असंख्य बोलने की रीतियों से, शारीरिक रूप में व्यक्त किया जाता है। यों जलों की सन्तान फूलती-फलती और बढ़ती है। फिर देख, हे तू जो कोई यह पढ़ता है; देख, पवित्रशास्त्र जो सौंपता है, और वाणी जो केवल एक ही रीति से उच्चारण करती है, आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी को बनाया; क्या यह अनेक रीतियों से नहीं समझा जाता, किसी भूल के छल से नहीं, परन्तु सच्चे अर्थों के नाना प्रकारों से? यों मनुष्य की सन्तान फूलती-फलती और बढ़ती है।

इसलिये यदि हम वस्तुओं की प्रकृतियों को आलंकारिक रीति से नहीं, परन्तु ठीक-ठीक अर्थ में लें, तब वह वाक्यांश फूलो-फलो और बढ़ो, उन सब वस्तुओं पर लागू होता है, जो बीज से उत्पन्न होती हैं। परन्तु यदि हम वचनों को आलंकारिक रीति से कहा गया मानें (जो मैं ही पवित्रशास्त्र का अभिप्राय अधिक समझता हूँ, जो निश्चय ही यह आशीष केवल जलचरों और मनुष्य की सन्तान को व्यर्थ ही नहीं देता); तब हम पाते हैं कि “बहुतायत” आत्मिक और शारीरिक दोनों सृष्टियों की है, जैसे आकाश और पृथ्वी में, और धर्मियों तथा अधर्मियों की, जैसे ज्योति और अन्धकार में; और उन पवित्र लेखकों की जो हमारे लिये व्यवस्था के सेवक रहे, जैसे उस आकाशमण्डल में जो जलों और जलों के बीच स्थिर किया गया है; और उन लोगों के समाज की जो अभी अविश्वास की कड़वाहट में हैं, जैसे समुद्र में; और पवित्र प्राणों की उत्सुकता की, जैसे सूखी भूमि में; और इस वर्तमान जीवन के दया के कामों की, जैसे बीजवाली घास में, और फलदाई वृक्षों में; और उन्नति के लिये प्रगट किए गए आत्मिक वरदानों की, जैसे आकाश की ज्योतियों में; और संयम की ओर बने भावों की, जैसे जीवते प्राण में। इन सब उदाहरणों में हम बहुतायत, प्रचुरता, और वृद्धि पाते हैं; परन्तु ऐसा क्या इस रीति से फूले-फले और बढ़े कि एक ही वस्तु अनेक रीतियों से व्यक्त की जाए, और एक ही अभिव्यक्ति अनेक रीतियों से समझी जाए; यह हम नहीं पाते, केवल शारीरिक रूप में व्यक्त किए गए चिह्नों में, और मन में गढ़ी हुई वस्तुओं में। शारीरिक रूप से उच्चारित चिह्नों से हम जलों की सन्तानें समझते हैं, जो अनिवार्य रूप से शरीर की गहराई से उत्पन्न हैं; मन में गढ़ी हुई वस्तुओं से, मनुष्य की सन्तानें, बुद्धि की फलदाइता के कारण। और इसी उद्देश्य से हम विश्वास करते हैं, हे प्रभु, कि तू ने इन जातियों से कहा, फूलो-फलो और बढ़ो। क्योंकि इस आशीष में, मैं समझता हूँ कि तू ने हमें एक सामर्थ्य और योग्यता दी है, कि जो हम एक ही रीति से समझते हैं उसे अनेक रीतियों से व्यक्त करें; और जो हम केवल एक ही रीति से गूढ़ रूप में सौंपा हुआ पढ़ते हैं उसे अनेक रीतियों से समझें। यों समुद्र के जल भर जाते हैं, जो अनेक अर्थों के सिवा और किसी बात से नहीं हिलते: यों मनुष्य की वृद्धि से पृथ्वी भी भर जाती है, जिसका सूखापन उसकी लालसा में प्रगट होता है, और बुद्धि उस पर प्रभुता करती है।

अध्याय 25

हे मेरे प्रभु परमेश्वर, मैं यह भी कहूँगा, जो आगे का पवित्रशास्त्र मुझे स्मरण कराता है; हाँ, मैं कहूँगा, और न डरूँगा। क्योंकि मैं सच कहूँगा, तू आप मुझ में वह प्रेरित करते हुए जो तू ने मुझ से उन वचनों में से निकालने को चाहा। परन्तु तेरी प्रेरणा के सिवा और किसी प्रेरणा से मैं यह विश्वास नहीं करता कि मैं सच बोलता हूँ, क्योंकि तू ही सत्य है, और हर मनुष्य झूठा है। इसलिये जो झूठ बोलता है, वह अपने ही मन से बोलता है; इसलिये कि मैं सच बोलूँ, मैं तेरी बातों से बोलूँगा। देख, तू ने हमें भोजन के लिये हर एक बीजवाली घास दी है जो सारी पृथ्वी पर है; और हर एक वृक्ष, जिसमें बीजवाले वृक्ष का फल है। और केवल हमें ही नहीं, परन्तु आकाश के सब पंछियों को भी, और पृथ्वी के पशुओं को, और सब रेंगनेवाले जन्तुओं को; परन्तु मछलियों और बड़ी मछलियों को तू ने वे नहीं दिए। अब हम ने कहा कि पृथ्वी के इन फलों से दया के काम सूचित और एक दृष्टान्त में चित्रित किए गए हैं, जो इस जीवन की आवश्यकताओं के लिये फलदाई पृथ्वी से जुटाए जाते हैं। ऐसी ही एक पृथ्वी वह भक्त उनेसिफुरुस था, जिसके घराने पर तू ने दया की, क्योंकि उस ने तेरे पौलुस को बार-बार ताज़ा किया, और उसकी जंजीर से लज्जित न हुआ। यों उन भाइयों ने भी किया, और ऐसा ही फल उन्होंने उपजाया, जिन्होंने मकिदुनिया से उसकी घटी को पूरा किया। परन्तु उसे कुछ वृक्षों के लिये कैसा दुःख हुआ, जिन्होंने उसे उसका उचित फल न दिया, जहाँ वह कहता है, मेरे पहले उत्तर के समय कोई मेरे साथ खड़ा न हुआ, परन्तु सब ने मुझे छोड़ दिया। परमेश्वर से मेरी प्रार्थना है कि यह उनके लेखे में न लिखा जाए। क्योंकि ये फल उनके योग्य हैं जो ईश्वरीय भेदों की अपनी समझ में से हमें आत्मिक शिक्षा देते हैं; और वे उनके योग्य हैं, मनुष्यों की नाईं; हाँ और उनके योग्य भी, जीवते प्राण की नाईं, जो सब संयम में अपने आप को एक आदर्श के रूप में देता है; और उनके योग्य भी, उड़नेवाले जन्तुओं की नाईं, उनकी आशीषों के कारण जो पृथ्वी पर बढ़ जाती हैं, क्योंकि उनका स्वर सब देशों में गूँज गया।

अध्याय 26

परन्तु वे इन फलों से पलते हैं, जो उनसे प्रसन्न होते हैं; और वे उनसे प्रसन्न नहीं होते, जिनका परमेश्वर उनका पेट है। क्योंकि जो उन्हें देते हैं, उनमें भी दी हुई वस्तुएँ फल नहीं, परन्तु जिस मन से वे देते हैं। इसलिये जिस ने परमेश्वर की सेवा की, और अपने पेट की नहीं, मैं स्पष्ट देखता हूँ कि वह क्यों आनन्दित हुआ; मैं इसे देखता हूँ, और उसके साथ आनन्द करता हूँ। क्योंकि उस ने फिलिप्पियों से वह पाया था, जो उन्होंने इपफ्रुदीतुस के हाथ उसके पास भेजा था: और तौभी मैं समझता हूँ कि वह क्यों आनन्दित हुआ। क्योंकि जिस बात पर वह आनन्दित हुआ, उसी पर वह पला; क्योंकि सच बोलते हुए, मैं प्रभु में बहुत आनन्दित हुआ (वह कहता है), कि अब अन्त में मेरी चिन्ता में तुम फिर हरे हो गए, जिसमें तुम चिन्तित तो थे, परन्तु वह तुम्हें कठिन हो गई थी। तब ये फिलिप्पी अब एक लम्बी थकान से सूख गए थे, और इस भले काम का फल उपजाने के विषय में मानो कुम्हला गए थे; और वह उनके लिये आनन्दित होता है, कि वे फिर हरे हो गए, अपने लिये नहीं, कि उन्होंने उसकी घटी को पूरा किया। इसलिये वह और जोड़ता है, यह नहीं कि मैं घटी के कारण कहता हूँ; क्योंकि मैं ने यह सीखा है कि जिस दशा में हूँ, उसी में सन्तोष करूँ। मैं दीन होना भी जानता हूँ, और बढ़ना भी जानता हूँ; हर जगह और सब बातों में मैं ने सीखा है कि कैसे भरा रहूँ और कैसे भूखा रहूँ; कैसे बढ़ूँ, और कैसे घटी सहूँ। जो मुझे सामर्थ्य देता है, उसके द्वारा मैं सब कुछ कर सकता हूँ।

तब तू किस बात पर आनन्दित होता है, हे महान पौलुस? किस बात पर आनन्दित होता है? हे मनुष्य, तू किस बात पर पलता है, जो परमेश्वर के ज्ञान में, अपने सिरजनहार के स्वरूप के अनुसार नया किया गया, हे जीवते प्राण, इतने संयमवाले, हे उड़नेवाले पंछियों की सी जीभ, जो भेद बोलती है? (क्योंकि ऐसी सृष्टि के लिये यही भोजन उचित है;) वह क्या है जो तुझे पालता है? आनन्द। सुनें कि आगे क्या आता है: तौभी, तुम ने भला किया, कि तुम मेरे क्लेश में सहभागी हुए। इसी पर वह आनन्दित होता है, इसी पर पलता है; क्योंकि उन्होंने भला किया, इसलिये नहीं कि उसका संकट हल्का हुआ, जो तुझ से कहता है, तू ने मुझे संकट में विस्तार दिया; क्योंकि वह जानता था कि तुझ में, जो उसे सामर्थ्य देता है, कैसे बढ़ना और कैसे घटी सहना है। क्योंकि हे फिलिप्पियो, तुम भी जानते हो (वह कहता है), कि सुसमाचार के आरम्भ में, जब मैं मकिदुनिया से निकला, तो देने और लेने के विषय में एक भी कलीसिया मेरी सहभागी न हुई, केवल तुम ही। क्योंकि थिस्सलुनीके में भी तुम ने एक-दो बार मेरी घटी के लिये भेजा। इन भले कामों के लिये अब वह आनन्दित होता है कि वे फिर लौट आए; और इस पर आनन्दित है कि वे फिर हरे हो गए, जैसे कोई फलदाई खेत फिर अपनी हरियाली पा ले।

क्या यह उसकी अपनी आवश्यकताओं के लिये था, क्योंकि उस ने कहा, तुम ने मेरी घटी के लिये भेजा? क्या वह इसके लिये आनन्दित होता है? निश्चय इसके लिये नहीं। परन्तु हम यह कैसे जानते हैं? क्योंकि वह आप तुरन्त कहता है, यह नहीं कि मैं दान चाहता हूँ, परन्तु मैं फल चाहता हूँ। हे मेरे परमेश्वर, मैं ने तुझ से सीखा है कि दान और फल के बीच भेद करूँ। दान वह वस्तु ही है जो वह देता है, जो हमें ये आवश्यक वस्तुएँ पहुँचाता है; जैसे धन, भोजन, पेय, वस्त्र, आश्रय, सहायता: परन्तु फल, देनेवाले की भली और ठीक इच्छा है। क्योंकि उस भले गुरु ने केवल यह न कहा, जो किसी भविष्यद्वक्ता को ग्रहण करता है, परन्तु जोड़ा, भविष्यद्वक्ता के नाम पर: और न उस ने केवल यह कहा, जो किसी धर्मी को ग्रहण करता है, परन्तु जोड़ा, धर्मी के नाम पर। इसलिये निश्चय एक भविष्यद्वक्ता का प्रतिफल पाएगा, दूसरा धर्मी का प्रतिफल: और न वह केवल यह कहता है, जो मेरे इन छोटों में से किसी एक को एक कटोरा ठण्डा जल पिलाएगा; परन्तु जोड़ता है, चेले के नाम पर: और यों समाप्त करता है, मैं तुम से सच कहता हूँ, वह अपना प्रतिफल कभी न खोएगा। दान यह है, कि किसी भविष्यद्वक्ता को ग्रहण करना, किसी धर्मी को ग्रहण करना, किसी चेले को एक कटोरा ठण्डा जल देना: परन्तु फल यह है, कि यह भविष्यद्वक्ता के नाम पर, धर्मी के नाम पर, चेले के नाम पर करना। फल से एलिय्याह उस विधवा से पला जो जानती थी कि वह परमेश्वर के जन को खिला रही है, और इसलिये उसे खिलाया: परन्तु कौवे से वह एक दान से पला। और एलिय्याह का भीतरी मनुष्य यों न पला, परन्तु केवल बाहरी; जो उस भोजन की घटी से नष्ट भी हो सकता था।

अध्याय 27

तब हे प्रभु, मैं तेरी दृष्टि में जो सच है वही कहूँगा, कि जब शारीरिक मनुष्य और अविश्वासी (जिन्हें जीतने और आरम्भ कराने के लिये आरम्भिक भेद और आश्चर्यकर्मों के महान काम आवश्यक हैं, जिन्हें हम मछलियों और बड़ी मछलियों के नाम से सूचित मानते हैं) तेरे सेवक की शारीरिक ताज़गी का भार उठाते हैं, या अन्यथा इस वर्तमान जीवन के लिये किसी उपयोगी वस्तु से उसकी सहायता करते हैं; जब कि वे नहीं जानते कि यह क्यों किया जाना चाहिए, और किस उद्देश्य से; तो न तो वे इन्हें पालते हैं, और न ये उनसे पलते हैं; क्योंकि न तो एक इसे किसी पवित्र और ठीक अभिप्राय से करते हैं; और न दूसरे उनके दानों पर आनन्दित होते हैं, जिनका फल वे अभी तक नहीं देखते। क्योंकि मन उसी से पलता है, जिस पर वह प्रसन्न होता है। और इसलिये मछलियाँ और बड़ी मछलियाँ ऐसे भोजन नहीं खातीं, जिन्हें पृथ्वी तब तक नहीं उपजाती जब तक वह समुद्र की लहरों की कड़वाहट से अलग और विभाजित न कर दी जाए।

अध्याय 28

और तू ने, हे परमेश्वर, अपनी बनाई हुई हर एक वस्तु को देखा, और देख, वह बहुत ही अच्छी थी। हाँ, हम भी वही देखते हैं, और देख, सब वस्तुएँ बहुत ही अच्छी हैं। तेरे कामों की अलग-अलग जातियों में से, जब तू ने कहा “वे हो जाएँ,” और वे हो गईं, तब तू ने हर एक को देखा कि वह अच्छी है। सात बार मैं ने यह लिखा हुआ गिना है, कि तू ने अपनी बनाई हुई वस्तु को देखा कि वह अच्छी है: और यह आठवीं बार है, कि तू ने अपनी बनाई हुई हर एक वस्तु को देखा, और देख, वह केवल अच्छी ही नहीं, परन्तु बहुत ही अच्छी थी, अब सब मिलकर होने के कारण। क्योंकि अलग-अलग वे केवल अच्छी थीं; परन्तु सब मिलकर, अच्छी भी, और बहुत ही अच्छी। सब सुन्दर देह यही व्यक्त करती हैं; इस कारण कि एक देह जो सब सुन्दर अंगों से बनी है, उन्हीं अंगों से, जो अलग-अलग हैं, कहीं अधिक सुन्दर होती है, जिनके सुव्यवस्थित मेल से समूचा सिद्ध होता है; यद्यपि अंग अलग-अलग भी सुन्दर होते हैं।

अध्याय 29

और मैं ने बारीकी से खोजा, कि तू ने सात बार, या आठ बार अपने कामों को देखा कि वे अच्छे हैं, जब वे तुझे भाए; परन्तु तेरे देखने में मुझे कोई समय न मिला, जिससे मैं समझ सकूँ कि तू ने इतनी बार देखा जो तू ने बनाया। और मैं ने कहा, “हे प्रभु, क्या यह तेरा पवित्रशास्त्र सच नहीं, क्योंकि तू सच्चा है, और सत्य होकर तू ने इसे प्रगट किया है? तब तू मुझ से क्यों कहता है, ‘कि तेरे देखने में कोई समय नहीं’; जब कि यह तेरा पवित्रशास्त्र मुझ से कहता है, कि जो कुछ तू ने हर दिन बनाया, तू ने देखा कि वह अच्छा है: और जब मैं ने उन्हें गिना, तो मैं ने पाया कि कितनी बार।” इसका तू मुझे उत्तर देता है, क्योंकि तू मेरा परमेश्वर है, और एक दृढ़ वाणी से अपने दास के भीतरी कान में कहता है, मेरे बहरेपन को भेदते और पुकारते हुए, “हे मनुष्य, जो मेरा पवित्रशास्त्र कहता है, वह मैं कहता हूँ: और तौभी वह समय में बोलता है; परन्तु समय का मेरे वचन से कोई सम्बन्ध नहीं; क्योंकि मेरा वचन मेरे साथ बराबर अनन्तता में है। इसलिये जो कुछ तुम मेरी आत्मा के द्वारा देखते हो, वह मैं देखता हूँ; जैसे जो कुछ तुम मेरी आत्मा के द्वारा बोलते हो, वह मैं बोलता हूँ। और यों जब तुम उन बातों को समय में देखते हो, तब मैं उन्हें समय में नहीं देखता; जैसे जब तुम समय में बोलते हो, तब मैं उन्हें समय में नहीं बोलता।”

अध्याय 30

और मैं ने सुना, हे मेरे प्रभु परमेश्वर, और तेरे सत्य में से मिठास की एक बूँद पी ली, और समझा, कि कुछ ऐसे मनुष्य हैं जो तेरे कामों से घृणा करते हैं; और कहते हैं, कि उनमें से बहुत से तू ने आवश्यकता के वश में आकर बनाए; जैसे आकाशों की रचना, और तारों का सामंजस्य; और यह कि तू ने उन्हें अपनी वस्तु से नहीं बनाया, परन्तु वे कहीं और से और अन्य स्रोतों से रचे गए थे, कि तू उन्हें इकट्ठा करके गढ़े और जोड़े, जब तू ने अपने जीते हुए शत्रुओं में से विश्व की दीवारें खड़ी कीं; कि वे, उस रचना से बँधे रहकर, फिर तेरे विरुद्ध विद्रोह न कर सकें। परन्तु अन्य वस्तुओं के विषय में वे कहते हैं कि तू ने न तो उन्हें बनाया, और न उन्हें जोड़ा भी, जैसे सब शरीर, और सब अति सूक्ष्म प्राणी, और जो कुछ पृथ्वी में जड़ रखता है; परन्तु एक मन जो तुझ से बैर रखता है, और एक और प्रकृति जो तेरी बनाई हुई नहीं, और तेरे विरुद्ध है, उस ने संसार के इन निचले स्तरों में इन वस्तुओं को उत्पन्न और गढ़ा। जो ऐसा कहते हैं, वे उन्मत्त हैं, क्योंकि वे तेरे कामों को तेरी आत्मा के द्वारा नहीं देखते, और न उनमें तुझे पहचानते हैं।

अध्याय 31

परन्तु जो तेरी आत्मा के द्वारा इन वस्तुओं को देखते हैं, तू उन में देखता है। इसलिये जब वे देखते हैं कि ये वस्तुएँ अच्छी हैं, तब तू देखता है कि वे अच्छी हैं; और जो कुछ तेरे निमित्त भला लगता है, तू उन में उससे प्रसन्न होता है, और जो कुछ तेरी आत्मा के द्वारा हमें भला लगता है, वह हम में तुझे भला लगता है। क्योंकि मनुष्य की बातें मनुष्य में से कौन जानता है, केवल मनुष्य की आत्मा को छोड़, जो उसमें है? वैसे ही परमेश्वर की बातें कोई नहीं जानता, केवल परमेश्वर की आत्मा। अब हम ने (वह कहता है) इस संसार की आत्मा नहीं, परन्तु वह आत्मा पाई है जो परमेश्वर की ओर से है, कि हम उन बातों को जानें जो परमेश्वर ने हमें सेंत-मेंत दी हैं। और मुझे चिताया जाता है, “सचमुच परमेश्वर की बातें कोई नहीं जानता, केवल परमेश्वर की आत्मा: तब हम भी कैसे जानते हैं, कि परमेश्वर की ओर से हमें कौन-सी बातें दी गई हैं?” मुझे उत्तर मिलता है; “क्योंकि जो बातें हम उसकी आत्मा के द्वारा जानते हैं, उन्हें भी कोई नहीं जानता, केवल परमेश्वर की आत्मा। क्योंकि जैसे उन से जो परमेश्वर की आत्मा के द्वारा बोलनेवाले थे, ठीक ही कहा गया, बोलनेवाले तुम नहीं: वैसे ही उन से जो परमेश्वर की आत्मा के द्वारा जानते हैं, ठीक ही कहा गया, ‘जाननेवाले तुम नहीं।’ और उससे कम नहीं, उन से भी जो परमेश्वर की आत्मा के द्वारा देखते हैं, ठीक ही कहा गया, ‘देखनेवाले तुम नहीं’; इसलिये जो कुछ वे परमेश्वर की आत्मा के द्वारा देखते हैं कि अच्छा है, वह वे नहीं, परन्तु परमेश्वर देखता है कि वह अच्छा है।” तब यह एक बात है कि मनुष्य उसे बुरा समझे जो अच्छा है, जैसे पहले कहे हुए लोग करते हैं; दूसरी, कि जो अच्छा है, मनुष्य देखे कि वह अच्छा है (जैसे तेरी सृष्टि बहुतों को भाती है, क्योंकि वे अच्छी हैं, जिन में तौभी तू उन्हें नहीं भाता, जब वे तुझ से बढ़कर उनका आनन्द भोगना चाहते हैं); और एक और, कि जब मनुष्य किसी वस्तु को देखे कि वह अच्छी है, तब परमेश्वर उसमें देखे कि वह अच्छी है, अर्थात् ऐसा कि वह उसी में प्रेम किया जाए जो उस ने बनाया, जो प्रेम नहीं किया जा सकता, केवल उस पवित्र आत्मा के द्वारा जो उस ने दिया है। क्योंकि परमेश्वर का प्रेम हमारे हृदयों में उस पवित्र आत्मा के द्वारा उंडेला गया है, जो हमें दिया गया है: जिसके द्वारा हम देखते हैं कि जो कुछ किसी भी मात्रा में है, वह अच्छा है। क्योंकि वह उसी से है, जो आप मात्रा में नहीं है, परन्तु जो वह है, वही है।

अध्याय 32

हे प्रभु, तेरा धन्यवाद हो। हम आकाश और पृथ्वी को देखते हैं, चाहे शारीरिक भाग, ऊपरी और निचला, या आत्मिक और शारीरिक सृष्टि; और इन भागों के शृंगार में, जिनसे संसार का समूचा ढाँचा, या यों कहें कि समूची सृष्टि बनी है, हम ज्योति को बनी हुई, और अन्धकार से अलग की हुई देखते हैं। हम आकाश के आकाशमण्डल को देखते हैं, चाहे संसार का वह प्रधान शरीर, आत्मिक ऊपरी जलों और निचले शारीरिक जलों के बीच, या (क्योंकि यह भी आकाश कहलाता है) वायु का यह अवकाश जिसमें आकाश के पंछी घूमते हैं, उन जलों के बीच जो भाप में उनके ऊपर उठाए जाते हैं, और साफ रातों में ओस बनकर टपकते हैं; और उन भारी जलों के बीच जो पृथ्वी पर बहते हैं। हम समुद्र के मैदानों में इकट्ठे किए हुए जलों का एक चेहरा देखते हैं; और सूखी भूमि दोनों रीति से, रीती, और ऐसे बनी कि दिखाई दे और सामंजस्य में हो, हाँ और घास तथा वृक्षों की सामग्री। हम ऊपर से चमकती हुई ज्योतियों को देखते हैं, सूर्य को दिन के लिये पर्याप्त, चन्द्रमा और तारों को रात को आनन्दित करने के लिये; और यह कि इन सब से समय अंकित और सूचित हों। हम चारों ओर एक नम तत्व देखते हैं, जो मछलियों, पशुओं, और पंछियों से भरा है; क्योंकि वायु का घनापन, जो पंछियों की उड़ान को थामता है, जलों के वाष्प से आप ही सघन होता है। हम पृथ्वी के चेहरे को पार्थिव प्राणियों से सजा हुआ देखते हैं, और मनुष्य को, जो तेरे स्वरूप और समानता के अनुसार सृजा गया, हाँ तेरे उसी स्वरूप और समानता के द्वारा (अर्थात् बुद्धि और समझ की सामर्थ्य के द्वारा) सब निर्बुद्धि प्राणियों पर ठहराया गया। और जैसे उसके प्राण में एक सामर्थ्य है जो निर्देश देकर प्रभुता करती है, और दूसरी अधीन बनाई गई, कि वह आज्ञा माने; वैसे ही मनुष्य के लिये, शारीरिक रीति से भी, एक नारी बनाई गई, जो अपनी बुद्धिमान समझ के मन में स्वभाव की समानता रखे, परन्तु अपनी देह के लिंग में, वैसे ही अपने पति के लिंग के अधीन हो, जैसे करने की इच्छा मन की बुद्धि से ठीक करने का कौशल ग्रहण करने को उत्सुक रहती है। इन बातों को हम देखते हैं, और वे अलग-अलग अच्छी हैं, और सब मिलकर बहुत ही अच्छी।

अध्याय 33

तेरे काम तेरी स्तुति करें, कि हम तुझ से प्रेम करें; और हम तुझ से प्रेम करें, कि तेरे काम तेरी स्तुति करें, जो समय में आरम्भ और अन्त, उदय और अस्त, वृद्धि और क्षय, रूप और अभाव रखते हैं। तब उनका भोर और सांझ का क्रम है, कुछ गुप्त रीति से, कुछ प्रगट रीति से; क्योंकि वे तुझ से शून्य से बनाए गए, न कि तुझ से; न किसी ऐसी सामग्री से जो तेरी न थी, या पहले से थी, परन्तु उस सामग्री से जो साथ-साथ सृजी गई (अर्थात्, उसी समय तेरे द्वारा सृजी गई), क्योंकि उसकी बेडौल दशा को, तू ने बिना समय के किसी अन्तराल के, रूप दिया। क्योंकि यह देखते हुए कि आकाश और पृथ्वी की सामग्री एक बात है, और रूप दूसरी, तू ने सामग्री को शून्य से बनाया, परन्तु संसार का रूप उस बेडौल सामग्री से: तौभी दोनों को साथ-साथ, ऐसा कि रूप बिना विलम्ब के किसी अन्तराल के सामग्री का अनुसरण करे।

अध्याय 34

हम ने यह भी जाँचा है कि तू ने किसका प्रतिबिम्ब प्रगट करना चाहा, चाहे सृष्टि के द्वारा, या वस्तुओं के ऐसे क्रम में सम्बन्ध के द्वारा। और हम ने देखा है, कि वस्तुएँ अलग-अलग अच्छी हैं, और सब मिलकर बहुत ही अच्छी, तेरे वचन में, तेरे एकलौते में, आकाश और पृथ्वी दोनों, कलीसिया का सिर और देह, सब समयों से पहले तेरी पूर्वनियुक्ति में, बिना भोर और सांझ के। परन्तु जब तू ने पूर्वनियुक्त वस्तुओं को समय में पूरा करना आरम्भ किया, इसलिये कि तू छिपी हुई बातें प्रगट करे, और हमारी अव्यवस्था को सुधारे; क्योंकि हमारे पाप हमारे ऊपर लटके थे, और हम अन्धकारमय गहराई में डूब गए थे; और तेरी भली आत्मा हमारे ऊपर मँडराई, कि उचित समय पर हमारी सहायता करे; और तू ने अभक्त को धर्मी ठहराया, और उन्हें दुष्टों से अलग किया; और तू ने अपनी पुस्तक के अधिकार का वह आकाशमण्डल उनके बीच बनाया जो ऊपर रखे गए थे, जिन्हें तेरे प्रति सिखाने-योग्य होना था, और उनके बीच जो नीचे थे, जिन्हें उनके अधीन होना था: और तू ने अविश्वासियों के समाज को एक ही षड्यन्त्र में इकट्ठा किया, कि विश्वासियों की उत्सुकता प्रगट हो, और वे दया के काम उपजाएँ, अपना पार्थिव धन तक कंगालों में बाँटते हुए, कि स्वर्गिक धन पाएँ। और इसके बाद तू ने आकाशमण्डल में कुछ ज्योतियाँ, अपने पवित्र जनों को, जीवन का वचन थामे हुए, सुलगाया; और आत्मिक वरदानों के द्वारा एक श्रेष्ठ अधिकार से ऊँचे पर चमकते हुए; इसके बाद फिर, अविश्वासी अन्यजातियों की दीक्षा के लिये, तू ने शारीरिक सामग्री में से भेद, और दृश्य आश्चर्यकर्म, और वचनों के रूप, तेरी पुस्तक के आकाशमण्डल के अनुसार उत्पन्न किए, जिनके द्वारा विश्वासी आशीषित और बढ़ाए जाएँ। इसके बाद तू ने विश्वासियों के जीवते प्राण को, संयम के बल से सुव्यवस्थित किए हुए भावों के द्वारा गढ़ा: और उसके बाद, वह मन जो केवल तेरे अधीन है और किसी मानवी अधिकार का अनुकरण करने की आवश्यकता नहीं रखता, तू ने अपने स्वरूप और समानता के अनुसार नया किया; और उसके बुद्धिमान कर्मों को समझ की श्रेष्ठता के अधीन किया, जैसे नारी को पुरुष के; और अपनी सेवकाई के सब कार्यों के लिये, जो इस जीवन में विश्वासियों की सिद्धता के लिये आवश्यक हैं, तू ने चाहा, कि उनके क्षणिक उपयोगों के लिये, भली वस्तुएँ, जो आगे के समय में उन्हीं के लिये फलदाई हों, उन्हीं विश्वासियों के द्वारा दी जाएँ। इन सब को हम देखते हैं, और वे बहुत ही अच्छी हैं, क्योंकि तू उन्हें हम में देखता है, जिस ने हमें अपनी आत्मा दी है, जिसके द्वारा हम उन्हें देखें, और उन में तुझ से प्रेम करें।

अध्याय 35

हे प्रभु परमेश्वर, हमें शान्ति दे: (क्योंकि तू ने हमें सब वस्तुएँ दी हैं;) विश्राम की शान्ति, विश्रामदिन की शान्ति, जिसकी कोई सांझ नहीं। क्योंकि अति उत्तम वस्तुओं की यह सारी सुन्दर पंक्ति, अपने मार्ग पूरे करके, टल जाएगी, क्योंकि उन में भोर और सांझ थी।

अध्याय 36

परन्तु सातवें दिन की कोई सांझ नहीं, और न उसका कोई अस्त है; क्योंकि तू ने उसे एक अनन्त निरन्तरता के लिये पवित्र किया है; कि जो तू ने अपने उन कामों के बाद, जो बहुत ही अच्छे थे, सातवें दिन विश्राम करके किया, यद्यपि तू ने उन्हें अटूट विश्राम में ही बनाया, वह तेरी पुस्तक की वाणी हमें पहले से यह घोषणा करे, कि हम भी अपने कामों के बाद (जो इसलिये बहुत ही अच्छे हैं, क्योंकि तू ने वे हमें दिए हैं), अनन्त जीवन के विश्रामदिन में तुझ में भी विश्राम पाएँगे।

अध्याय 37

क्योंकि तब तू हम में विश्राम करेगा, जैसे अब तू हम में काम करता है; और यों वह तेरा विश्राम हमारे द्वारा होगा, जैसे ये तेरे काम हमारे द्वारा हैं। परन्तु तू, हे प्रभु, सदा काम करता है, और सदा विश्राम में है। और न तू समय में देखता है, न समय में हिलाया जाता है, न किसी समय में विश्राम करता है; और तौभी तू समय में देखी जानेवाली वस्तुएँ बनाता है, हाँ स्वयं समयों को, और उस विश्राम को जो समय से निकलता है।

अध्याय 38

इसलिये हम इन वस्तुओं को जो तू ने बनाईं, देखते हैं, क्योंकि वे हैं: परन्तु वे हैं, क्योंकि तू उन्हें देखता है। और हम बाहर से देखते हैं, कि वे हैं, और भीतर से, कि वे अच्छी हैं, परन्तु तू ने उन्हें वहाँ देखा, जब वे बनीं, जहाँ तू ने उन्हें देखा, अभी बनाई जानी थीं। और हम एक बाद के समय में भला करने को उभारे गए, इसके बाद कि हमारे हृदयों ने तेरी आत्मा से गर्भ धारण किया; परन्तु पहले के समय में हम बुरा करने को उभारे गए, तुझे त्यागते हुए; परन्तु तू, वह एक, वह भला परमेश्वर, कभी भला करने से न रुका। और हमारे पास भी कुछ भले काम हैं, तेरे वरदान से, परन्तु अनन्त नहीं; उनके बाद हम तेरे उस महान पवित्रीकरण में विश्राम पाने की आशा रखते हैं। परन्तु तू, वह भला होकर जिसे किसी भलाई की आवश्यकता नहीं, सदा विश्राम में है, क्योंकि तेरा विश्राम तू आप ही है। और कौन मनुष्य मनुष्य को यह समझा सकता है? या कौन स्वर्गदूत, किसी स्वर्गदूत को? या कौन स्वर्गदूत, किसी मनुष्य को? यह तुझ से माँगा जाए, तुझ में ढूँढ़ा जाए, तेरे यहाँ खटखटाया जाए; तब, तब यह पाया जाएगा, तब यह मिलेगा, तब यह खोला जाएगा। आमीन।

Gratias Tibi Domine

अध्याय 13 पूरा हुआ

तेरहवीं पुस्तक

पृष्ठ 1 / 1 · 69 मिनट अध्याय में शेष