अध्याय 8 · 28 मिनट का पठन
परमेश्वर की सामर्थ्य से सुरक्षित
जिन शब्दों पर मैं बोल रहा हूँ, वे तुम्हें 1 पतरस 1:5 में मिलेंगे। तीसरी, चौथी और पाँचवीं आयतें ये हैं: “हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद हो, जिसने यीशु मसीह को मरे हुओं में से जी उठने के द्वारा, . . . हमें जीवित आशा के लिये नया जन्म दिया, अर्थात् एक अविनाशी . . . विरासत के लिये जो तुम्हारे लिये स्वर्ग में रखी है, जिनकी रक्षा परमेश्वर की सामर्थ्य से, विश्वास के द्वारा उस उद्धार के लिये, जो आनेवाले समय में प्रगट होनेवाली है, की जाती है।” मेरे पाठ के शब्द ये हैं: “परमेश्वर की सामर्थ्य से, विश्वास के द्वारा रक्षा की जाती है।”
यहाँ हमें उस रक्षा के विषय में दो अद्भुत, धन्य सच्चाइयाँ मिलती हैं जिसके द्वारा उद्धार के लिये विश्वासी की रक्षा की जाती है। एक सच्चाई है, परमेश्वर की सामर्थ्य से रक्षा; और दूसरी सच्चाई है, विश्वास के द्वारा रक्षा। हमें दोनों पक्षों को देखना चाहिए—परमेश्वर के पक्ष को और उसकी सर्वशक्तिमान सामर्थ्य को, जो दिन के हर क्षण हमारा रक्षक होने के लिये हमें दी गई है; और मनुष्य के पक्ष को, जहाँ हमें और कुछ नहीं करना है, केवल विश्वास से परमेश्वर को अपनी रक्षा का काम करने देना है। हमें एक ऐसी विरासत के लिये नया जन्म मिला है जो स्वर्ग में हमारे लिये रखी है; और यहाँ पृथ्वी पर परमेश्वर की सामर्थ्य से हमारी रक्षा की जाती है। हम देखते हैं कि यह दोहरी रक्षा है—स्वर्ग में मेरे लिये रखी हुई विरासत, और पृथ्वी पर मैं, जिसे उस विरासत के लिये सुरक्षित रखा जाता है जो वहाँ है।
अब, इस रक्षा के पहले भाग के विषय में कोई सन्देह नहीं, कोई प्रश्न नहीं। परमेश्वर स्वर्ग में उस विरासत को बड़ी अद्भुत रीति से और पूरी तरह सुरक्षित रखता है, और वह वहाँ सुरक्षित प्रतीक्षा कर रही है। और वही परमेश्वर मुझे उस विरासत के लिये सुरक्षित रखता है। यही बात मैं समझना चाहता हूँ।
तुम जानते हो कि यदि कोई पिता अपने बच्चों के लिये विरासत जुटाने और उसे उनके लिये सँभालकर रखने में बड़ा परिश्रम करे, परन्तु बच्चों को उस विरासत के लिये न सँभाले, तो यह उसकी बड़ी मूर्खता है। तुम ऐसे मनुष्य के विषय में क्या सोचोगे जो धन बटोरने में अपना सारा समय लगा देता है और हर प्रकार का त्याग करता है; और जब उसके पास हज़ारों-हज़ार जमा हो जाते हैं, तब तुम उससे पूछते हो कि वह अपने आप को इस प्रकार क्यों खपा रहा है, और वह उत्तर देता है: “मैं अपने बच्चों के लिये बड़ी विरासत छोड़ जाना चाहता हूँ, और उसे उनके लिये सँभालकर रख रहा हूँ”—और फिर तुम सुनो कि वही मनुष्य अपने बच्चों को शिक्षा देने का कोई कष्ट नहीं उठाता, उन्हें गलियों में आवारा घूमने देता है, और पाप, अज्ञान और मूर्खता के मार्गों पर चलने देता है, तो तुम उसके विषय में क्या सोचोगे? क्या तुम यह न कहोगे: “बेचारा! वह अपने बच्चों के लिये विरासत तो सँभाल रहा है, परन्तु अपने बच्चों को उस विरासत के लिये न तो सँभाल रहा है और न तैयार कर रहा है”! और कितने ही मसीही हैं जो सोचते हैं: “मेरा परमेश्वर मेरे लिये विरासत सुरक्षित रख रहा है”; परन्तु वे यह विश्वास नहीं कर पाते: “मेरा परमेश्वर मुझे उस विरासत के लिये सुरक्षित रख रहा है।” वही सामर्थ्य, वही प्रेम, वही परमेश्वर, जो दोनों काम करता है।
अब मैं उस काम के विषय में बोलना चाहता हूँ जो परमेश्वर हम पर करता है—हमें उस विरासत के लिये सुरक्षित रखना। मैं कह चुका हूँ कि हमारे सामने दो बहुत सरल सच्चाइयाँ हैं: एक ईश्वरीय पक्ष—परमेश्वर की सामर्थ्य से हमारी रक्षा की जाती है; दूसरा, मानवीय पक्ष—विश्वास के द्वारा हमारी रक्षा की जाती है।
परमेश्वर की सामर्थ्य से सुरक्षित
ईश्वरीय पक्ष को देखो: परमेश्वर की सामर्थ्य से मसीहियों की रक्षा की जाती है।
यह रक्षा सब कुछ समेटे हुए है
सबसे पहले यह सोचो कि यह रक्षा सब कुछ समेटे हुए है।
किसकी रक्षा की जाती है? तुम्हारी रक्षा की जाती है। तुम्हारे कितने भाग की? तुम्हारे सम्पूर्ण अस्तित्व की। क्या परमेश्वर तुम्हारे एक भाग की रक्षा करता है और दूसरे की नहीं? नहीं। कुछ लोगों का विचार है कि यह एक प्रकार की धुँधली, सामान्य-सी रक्षा है, और परमेश्वर उनकी रक्षा इस प्रकार करेगा कि जब वे मरेंगे तो स्वर्ग पहुँच जाएँगे। परन्तु वे रक्षा के इस शब्द को अपने अस्तित्व और स्वभाव की हर बात पर लागू नहीं करते। फिर भी परमेश्वर यही चाहता है।
यह रही मेरी एक घड़ी। मान लो कि यह घड़ी मैंने किसी मित्र से उधार ली हो, और उसने मुझसे कहा हो:
“जब तुम यूरोप जाओ, तो मैं तुम्हें इसे साथ ले जाने दूँगा, परन्तु ध्यान रहे कि इसे सुरक्षित रखना और लौटा लाना।”
और मान लो कि मैंने घड़ी को बिगाड़ दिया, उसकी सुइयाँ तोड़ दीं, उसका डायल खराब कर दिया, और उसके कुछ पहिये और कमानियाँ नष्ट कर दीं, और उसे उसी दशा में लौटाकर अपने मित्र के हाथ में दे दिया; तो वह कहेगा:
“अरे, पर मैंने तुम्हें वह घड़ी इस शर्त पर दी थी कि तुम उसे सुरक्षित रखोगे।”
“क्या मैंने उसे सुरक्षित नहीं रखा? यह रही घड़ी।”
“परन्तु मैं यह नहीं चाहता था कि तुम उसे उस सामान्य ढंग से रखो कि मुझे केवल घड़ी का खोल, या उसके अवशेष लौटा लाओ। मुझे आशा थी कि तुम उसके हर भाग को सुरक्षित रखोगे।”
इसी प्रकार परमेश्वर हमें इस सामान्य ढंग से सुरक्षित नहीं रखना चाहता कि अन्त में किसी न किसी तरह हम जलते-जलते बच जाएँ, और बस किसी प्रकार स्वर्ग में पहुँच जाएँ। परमेश्वर की रक्षा करनेवाली सामर्थ्य और उसका प्रेम हमारे अस्तित्व की हर एक बात पर लागू होता है।
कुछ लोग ऐसे हैं जो सोचते हैं कि परमेश्वर आत्मिक बातों में तो उनकी रक्षा करेगा, पर सांसारिक बातों में नहीं। वे कहते हैं कि यह दूसरी बात उसके दायरे से बाहर है। पर देखो, परमेश्वर तुम्हें संसार में काम करने भेजता है, परन्तु उसने यह नहीं कहा: “अब मुझे तुम्हें छोड़ना होगा कि तुम जाकर अपना पैसा आप कमाओ, और अपनी जीविका आप चलाओ।” वह जानता है कि तुम अपनी रक्षा आप नहीं कर सकते। परन्तु परमेश्वर कहता है: “मेरे बच्चे, ऐसा कोई काम नहीं जो तुम्हें करना है, ऐसा कोई व्यापार नहीं जिसमें तुम लगे हो, ऐसा एक पैसा भी नहीं जो तुम्हें खर्च करना है, जिसे मैं, तुम्हारा पिता, अपनी रक्षा में न ले लूँ।” परमेश्वर केवल आत्मिक बातों की ही नहीं, सांसारिक बातों की भी चिन्ता करता है। बहुत से लोगों के जीवन का अधिकांश भाग, कभी-कभी दिन के आठ या नौ या दस घण्टे, व्यापार की परीक्षाओं और उलझनों के बीच बिताना पड़ता है; परन्तु परमेश्वर वहाँ भी तुम्हारी चिन्ता करेगा। परमेश्वर की रक्षा में सब कुछ सम्मिलित है।
कुछ और लोग हैं जो सोचते हैं: “हाँ! संकट के समय तो परमेश्वर मेरी रक्षा करता है, परन्तु समृद्धि के समय मुझे उसकी रक्षा की आवश्यकता नहीं; तब मैं उसे भूल जाता हूँ और उसे छोड़ देता हूँ।” फिर कुछ और लोग ठीक इसके विपरीत सोचते हैं। वे सोचते हैं: “समृद्धि के समय, जब सब कुछ सहज और शान्त रहता है, मैं परमेश्वर से लिपटा रह सकता हूँ, परन्तु जब भारी विपत्तियाँ आती हैं, तो न जाने क्यों मेरी इच्छा विद्रोह करने लगती है, और तब परमेश्वर मेरी रक्षा नहीं करता।”
अब मैं तुम्हारे लिये यह सन्देश लाया हूँ कि जैसे विपत्ति में, वैसे ही समृद्धि में, जैसे अन्धकार में, वैसे ही धूप में, तुम्हारा परमेश्वर हर समय तुम्हारी रक्षा करने को तैयार है।
फिर कुछ और लोग इस रक्षा के विषय में यों सोचते हैं: “परमेश्वर मुझे बहुत बड़ी दुष्टता करने से तो बचाए रखेगा, परन्तु कुछ छोटे पाप हैं जिनसे परमेश्वर मुझे बचाए रखेगा, ऐसी आशा मैं नहीं कर सकता। क्रोधी स्वभाव का पाप है। मैं यह आशा नहीं कर सकता कि परमेश्वर उस पर जय पाएगा।”
जब तुम किसी ऐसे मनुष्य के विषय में सुनते हो जो परीक्षा में पड़कर भटक गया, या पियक्कड़पन या हत्या में जा गिरा, तो तुम परमेश्वर की रक्षा करनेवाली सामर्थ्य के लिये उसका धन्यवाद करते हो।
“मैं भी उस मनुष्य के समान कर बैठता,” तुम कहते हो, “यदि परमेश्वर ने मेरी रक्षा न की होती।” और तुम विश्वास करते हो कि उसने तुम्हें पियक्कड़पन और हत्या से बचाए रखा।
तो फिर तुम यह विश्वास क्यों नहीं करते कि परमेश्वर तुम्हें क्रोध के विस्फोटों से भी बचाए रख सकता है? तुमने सोचा कि यह कम महत्त्व की बात है; तुम्हें यह स्मरण न रहा कि नये नियम की महान आज्ञा यह है—“एक दूसरे से प्रेम रखो जैसा मैंने तुम से प्रेम रखा है” (यूहन्ना 13:34)। और जब तुम्हारा क्रोध, तुम्हारा उतावला न्याय और तुम्हारे कड़वे शब्द बाहर निकले, तो तुमने सबसे ऊँची व्यवस्था—परमेश्वर के प्रेम की व्यवस्था—के विरुद्ध पाप किया। फिर भी तुम कहते हो: “परमेश्वर नहीं करेगा, परमेश्वर नहीं कर सकता”—नहीं, तुम यह नहीं कहोगे कि परमेश्वर नहीं कर सकता; परन्तु तुम कहते हो, “परमेश्वर मुझे उससे नहीं बचाता।” शायद तुम कहते हो: “वह कर सकता है; परन्तु मुझमें कुछ ऐसा है जो उस तक पहुँच नहीं पाता, और जिसे परमेश्वर दूर नहीं करता।”
मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ, क्या विश्वासी उससे अधिक पवित्र जीवन बिता सकते हैं जितना साधारणतः बिताया जाता है? क्या विश्वासी दिन भर परमेश्वर की रक्षा करनेवाली सामर्थ्य का अनुभव कर सकते हैं, जो उन्हें पाप से बचाए रखे? क्या विश्वासियों को परमेश्वर की संगति में सुरक्षित बनाए रखा जा सकता है? और मैं परमेश्वर के वचन से इन शब्दों में तुम्हारे लिये सन्देश लाया हूँ: परमेश्वर की सामर्थ्य से रक्षा की जाती है। इन शब्दों के साथ कोई शर्त जुड़ी हुई नहीं है। इनका अर्थ यह है कि यदि तुम अपने आप को पूरी तरह और पूर्ण रूप से परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता को सौंप दोगे, तो वह आनन्द से तुम्हारी रक्षा करेगा।
कुछ लोग सोचते हैं कि वे कभी इतनी दूर तक नहीं पहुँच सकते कि उनके मुँह का हर शब्द परमेश्वर की महिमा के लिये हो। परन्तु परमेश्वर उनसे यही चाहता है, परमेश्वर उनसे यही अपेक्षा रखता है। परमेश्वर उनके मुँह के द्वार पर पहरा बैठाने को तैयार है; और यदि परमेश्वर ऐसा करेगा, तो क्या वह उनकी जीभ और उनके होठों की रक्षा नहीं कर सकता? वह कर सकता है; और जो उस पर भरोसा रखते हैं उनके लिये परमेश्वर यही करने जा रहा है। परमेश्वर की रक्षा में सब कुछ सम्मिलित है; इसलिए हर वह व्यक्ति जो पवित्र जीवन बिताने की लालसा रखता है, अपनी सारी आवश्यकताओं, अपनी सारी दुर्बलताओं, अपनी सारी कमियों और अपने सारे पापों पर सोच-विचार करे, और सोच-समझकर कहे: “क्या कोई ऐसा पाप है जिससे मेरा परमेश्वर मुझे बचाए नहीं रख सकता?” और हृदय को उत्तर देना पड़ेगा: “नहीं; परमेश्वर मुझे हर पाप से बचाए रख सकता है।”
यह रक्षा सामर्थ्य माँगती है
दूसरी बात, यदि तुम इस रक्षा को समझना चाहते हो, तो स्मरण रखो कि यह केवल सब कुछ समेटनेवाली रक्षा ही नहीं, वरन् सर्वशक्तिमान रक्षा भी है।
मैं चाहता हूँ कि यह सच्चाई मेरे प्राण पर जलकर अंकित हो जाए; मैं परमेश्वर की आराधना तब तक करता रहना चाहता हूँ जब तक मेरा सारा हृदय उसकी सर्वशक्तिमत्ता के विचार से भर न जाए। परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर मेरे हृदय में काम करने के लिये, मेरी रक्षा का काम करने के लिये, अपने आप को अर्पित करता है; और मैं सर्वशक्तिमत्ता से जुड़ जाना चाहता हूँ, वरन् उस सर्वशक्तिमान से, जीवते परमेश्वर से जुड़ जाना चाहता हूँ, और उसके हाथ की आड़ में अपना स्थान पाना चाहता हूँ। तुम भजन संहिता पढ़ते हो, और दाऊद के बहुत से कथनों में जो अद्भुत विचार हैं उन पर मनन करते हो; जैसे, उदाहरण के लिये, जब वह परमेश्वर के विषय में कहता है कि वह हमारा परमेश्वर, हमारा गढ़, हमारा शरणस्थान, हमारा दृढ़ गुम्मट, हमारा बल और हमारा उद्धार है। दाऊद को इस बात की बड़ी अद्भुत समझ थी कि सनातन परमेश्वर स्वयं ही विश्वास करनेवाले प्राण का छिपने का स्थान है, और वह किस प्रकार विश्वासी को लेकर उसे अपने हाथ की आड़ में, अपने तम्बू के गुप्त स्थान में, अपने पंखों की छाया तले, वरन् अपने परों के नीचे सुरक्षित रखता है। और दाऊद वहीं रहता था। और आह, हम जो पिन्तेकुस्त की सन्तान हैं, हम जिन्होंने मसीह को और उसके लहू को और स्वर्ग से भेजे गए पवित्र आत्मा को जाना है, हम इतना कम क्यों जानते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर को अपना रक्षक मानकर कदम-कदम पर काँपते हुए उसके साथ चलना क्या होता है?
क्या तुमने कभी सोचा है कि तुम्हारे हृदय में अनुग्रह के हर कार्य में परमेश्वर की सम्पूर्ण सर्वशक्तिमत्ता तुम्हें आशीष देने में लगी होती है? जब मैं किसी मनुष्य के पास जाता हूँ और वह मुझे कुछ धन दान में देता है, तो मैं उसे लेकर चला जाता हूँ। उसने अपनी वस्तु में से कुछ मुझे दिया है; शेष वह अपने लिये रख लेता है। परन्तु परमेश्वर की सामर्थ्य के साथ ऐसा नहीं है। परमेश्वर अपनी सामर्थ्य में से कुछ भी अपने से अलग नहीं कर सकता, और इसलिए मैं परमेश्वर की सामर्थ्य और भलाई का अनुभव केवल उतना ही कर सकता हूँ जितना मैं स्वयं उसके सम्पर्क और संगति में हूँ; और जब मैं स्वयं उसके सम्पर्क और संगति में आता हूँ, तो मैं परमेश्वर की सम्पूर्ण सर्वशक्तिमत्ता के सम्पर्क और संगति में आ जाता हूँ, और हर दिन मेरी सहायता के लिये परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता मेरे पास रहती है।
मान लो किसी पुत्र का पिता बहुत धनी है, और जब पुत्र व्यापार आरम्भ करने को होता है, तो पिता कहता है: “अपने इस काम के लिये तुम जितना धन चाहो, ले सकते हो।” पिता का सब कुछ पुत्र के अधिकार में है। और तुम्हारे परमेश्वर, तुम्हारे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के साथ भी ऐसा ही है। तुम इसे कठिनाई से ग्रहण कर पाते हो; तुम अपने आप को ऐसा छोटा-सा कीड़ा समझते हो। एक छोटे-से कीड़े की रक्षा के लिये उसकी सर्वशक्तिमत्ता की आवश्यकता! हाँ, धूल में रहनेवाले हर छोटे-से कीड़े की रक्षा के लिये भी उसकी सर्वशक्तिमत्ता की आवश्यकता है, और सारे विश्व की रक्षा के लिये भी; इसलिए तुम्हारे और मेरे प्राण को पाप की शक्ति से बचाए रखने के लिये तो उसकी सर्वशक्तिमत्ता की और भी अधिक आवश्यकता है।
आह, यदि तुम अनुग्रह में बढ़ना चाहते हो, तो यहीं से आरम्भ करना सीखो। अपने सारे निर्णयों और मननों और विचारों और कामों और प्रश्नों और अध्ययनों और प्रार्थनाओं में, अपने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के द्वारा सुरक्षित रखे जाना सीखो। जो सन्तान उस पर भरोसा रखती है, उसके लिये सर्वशक्तिमान परमेश्वर क्या नहीं करेगा? बाइबल कहती है: “हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक” (इफिसियों 3:20)। तुम्हें सर्वशक्तिमत्ता को जानना और उस पर भरोसा रखना सीखना होगा, और तब तुम वैसा जीवन बिताओगे जैसा एक मसीही को बिताना चाहिए। हमने परमेश्वर का अध्ययन करना कितना कम सीखा है, और यह समझना कितना कम सीखा है कि भक्तिपूर्ण जीवन परमेश्वर से भरा हुआ जीवन है, ऐसा जीवन जो परमेश्वर से प्रेम रखता है और उसकी बाट जोहता है, और उस पर भरोसा रखता है, और उसे अपने ऊपर आशीष देने देता है! हम परमेश्वर की सामर्थ्य के बिना परमेश्वर की इच्छा पूरी नहीं कर सकते। परमेश्वर हमें अपनी सामर्थ्य का पहला अनुभव इसलिए देता है कि हम और अधिक की लालसा करने को तैयार हों, और आकर वह सब कुछ माँगें जो वह कर सकता है। परमेश्वर हमारी सहायता करे कि हम हर दिन उस पर भरोसा रखें।
यह रक्षा निरन्तर है
एक और विचार। यह रक्षा केवल सब कुछ समेटनेवाली और सर्वशक्तिमान ही नहीं, वरन् निरन्तर और अटूट भी है।
लोग कभी-कभी कहते हैं: “एक सप्ताह या एक महीने तक परमेश्वर ने बड़ी अद्भुत रीति से मेरी रक्षा की: मैं उसके मुख के प्रकाश में जीता रहा, और मैं बता नहीं सकता कि उसकी संगति में मैंने कौन-सा आनन्द नहीं पाया। उसने दूसरों के लिये किए गए मेरे काम पर आशीष दी। उसने मुझे आत्माएँ दीं, और कभी-कभी मुझे ऐसा लगता था मानो मैं उकाब के पंखों पर स्वर्ग की ओर उठाया जा रहा हूँ। परन्तु यह बना न रहा। यह बहुत ही अच्छा था; यह टिक नहीं सकता था।” और कुछ कहते हैं: “मुझे दीन बनाए रखने के लिये मेरा गिरना आवश्यक था।” और कुछ और कहते हैं: “मैं जानता हूँ कि यह मेरा ही दोष था; परन्तु न जाने क्यों, कोई सदा ऊँचाइयों पर नहीं रह सकता।”
आह, प्रियो, ऐसा क्यों है? क्या कोई कारण हो सकता है कि परमेश्वर की रक्षा निरन्तर और अटूट न हो? ज़रा सोचो। सारा जीवन एक अटूट निरन्तरता है। यदि मेरा जीवन आधे घण्टे के लिये भी रुक जाए, तो मैं मर जाऊँगा, और मेरा जीवन चला जाएगा। जीवन एक निरन्तर चलनेवाली वस्तु है, और परमेश्वर का जीवन उसकी कलीसिया का जीवन है, और परमेश्वर का जीवन उसकी सर्वशक्तिमान सामर्थ्य है जो हम में काम करती है। और परमेश्वर सर्वशक्तिमान होकर हमारे पास आता है, और बिना किसी शर्त के मेरा रक्षक होने का प्रस्ताव रखता है, और उसकी रक्षा का अर्थ यह है कि दिन-प्रतिदिन, क्षण-क्षण, परमेश्वर हमारी रक्षा करता रहेगा।
यदि मैं तुमसे यह प्रश्न पूछूँ: “क्या तुम सोचते हो कि परमेश्वर तुम्हें एक दिन तक प्रत्यक्ष अपराध से बचाए रख सकता है?” तो तुम उत्तर दोगे: “मैं केवल यही नहीं जानता कि वह ऐसा कर सकता है, वरन् मैं सोचता हूँ कि उसने ऐसा किया भी है। ऐसे दिन आए हैं जिनमें उसने मेरे हृदय को अपनी पवित्र उपस्थिति में बनाए रखा, जब, यद्यपि मेरे भीतर सदा एक पापमय स्वभाव रहा है, उसने मुझे जान-बूझकर किए जानेवाले प्रत्यक्ष अपराध से बचाए रखा।”
अब, यदि वह एक घण्टे या एक दिन के लिये ऐसा कर सकता है, तो दो दिन के लिये क्यों नहीं? आह! आओ, हम परमेश्वर की उस सर्वशक्तिमत्ता को, जो उसके वचन में प्रगट हुई है, अपनी आशाओं का माप बना लें। क्या परमेश्वर ने अपने वचन में यह नहीं कहा: “मैं यहोवा उसकी रक्षा करता हूँ; मैं क्षण-क्षण उसको सींचता रहूँगा” (यशायाह 27:3)? इसका क्या अर्थ हो सकता है? क्या “क्षण-क्षण” का अर्थ सचमुच क्षण-क्षण है? क्या परमेश्वर ने लाल दाखमधु की उस दाख की बारी के विषय में यह प्रतिज्ञा की कि वह उसे क्षण-क्षण सींचता रहेगा, जिससे सूर्य की तपन और झुलसानेवाली हवा उसे कभी सुखा न सके? हाँ। दक्षिण अफ्रीका में लोग कभी-कभी कलम बाँधते हैं, और उसके ऊपर पानी की एक बोतल बाँध देते हैं, ताकि बीच-बीच में एक बूँद टपकती रहे और जो कुछ उन्होंने उसके चारों ओर लपेटा है उसे भिगोती रहे। और इस प्रकार वहाँ नमी निरन्तर बनी रहती है, जब तक कलम को जड़ पकड़ने और सूर्य की तपन सहने का समय न मिल जाए।
क्या हमारा परमेश्वर, हमारे प्रति अपने कोमल प्रेम में, हर क्षण हमारी रक्षा नहीं करेगा, जबकि उसने ऐसा करने की प्रतिज्ञा की है? आह! यदि हम एक बार इस विचार को पकड़ लें: हमारा सारा आत्मिक जीवन परमेश्वर का ही काम होना है—“परमेश्वर ही है, जिसने अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है” (फिलिप्पियों 2:13)—जब एक बार हम परमेश्वर से यह आशा रखने का विश्वास पा लें, तो परमेश्वर हमारे लिये सब कुछ करेगा।
यह रक्षा निरन्तर होनी है। हर सुबह जब तुम जागोगे, परमेश्वर तुमसे मिलेगा। प्रश्न यह नहीं है: यदि मैं सुबह उसके विचार के साथ जागना भूल जाऊँ, तो क्या होगा? यदि तुम अपना जागना परमेश्वर को सौंप दो, तो सुबह जब तुम जागोगे, परमेश्वर अपनी ईश्वरीय धूप और प्रेम के साथ तुमसे मिलेगा, और वह तुम्हें यह चेतना देगा कि दिन भर परमेश्वर अपनी सर्वशक्तिमान सामर्थ्य से निरन्तर तुम्हारी देखभाल कर रहा है। और परमेश्वर अगले दिन और हर दिन तुमसे मिलेगा; और यदि संगति के अभ्यास में कभी-कभी विफलता आ भी जाए, तो कोई बात नहीं। यदि तुम अपनी स्थिति पर दृढ़ रहो और कहो: “हे प्रभु, मैं आशा रखूँगा कि तू मेरे लिये अपनी ओर से सब कुछ करेगा, और मैं दिन-प्रतिदिन तुझ पर भरोसा रखूँगा कि तू पूरी तरह मेरी रक्षा करे,” तो तुम्हारा विश्वास दृढ़ से दृढ़तर होता जाएगा, और तुम परमेश्वर की रक्षा करनेवाली सामर्थ्य को उसकी अटूटता में जान लोगे।
विश्वास के द्वारा सुरक्षित
और अब दूसरा पक्ष—विश्वास करना। “परमेश्वर की सामर्थ्य से रक्षा की जाती है, विश्वास के द्वारा।” हमें इस विश्वास को किस दृष्टि से देखना चाहिए?
विश्वास में असहायता निहित है
सबसे पहले मैं यह कहूँ कि इस विश्वास का अर्थ है परमेश्वर के सामने पूर्ण असमर्थता और असहायता।
हर विश्वास की जड़ में असहायता का एक भाव होता है। यदि मुझे कोई कारोबार निपटाना हो, मान लो एक घर खरीदना हो, तो वकील को ही सम्पत्ति को मेरे नाम पर हस्तान्तरित कराने और सारी व्यवस्था करने का काम करना होगा। मैं वह काम नहीं कर सकता, और उस प्रतिनिधि पर भरोसा रखकर मैं मान लेता हूँ कि मैं उसे नहीं कर सकता। इसलिए विश्वास का अर्थ सदा असहायता है। बहुत सी दशाओं में इसका अर्थ यह होता है: मैं इसे बड़ी कठिनाई से कर तो सकता हूँ, परन्तु कोई दूसरा इसे अधिक अच्छी तरह कर सकता है। परन्तु अधिकांश दशाओं में यह पूर्ण असहायता है; किसी दूसरे को ही मेरे लिये यह करना होगा। और यही आत्मिक जीवन का रहस्य है। मनुष्य को यह कहना सीखना होगा: “मैं सब कुछ छोड़ देता हूँ; मैंने प्रयत्न किया, लालसा की, सोचा और प्रार्थना की, परन्तु विफलता ही हाथ लगी। परमेश्वर ने मुझे आशीष दी और मेरी सहायता की, फिर भी अन्ततः इतना अधिक पाप और इतनी अधिक उदासी रही।” जब मनुष्य इस प्रकार टूटकर पूर्ण असहायता और अपने विषय में निराशा की दशा में पहुँचता है, और कहता है: “मैं कुछ नहीं कर सकता!” तब कैसा परिवर्तन आता है!
पौलुस को स्मरण करो। वह एक धन्य जीवन बिता रहा था, और वह तीसरे स्वर्ग तक उठा लिया गया था, और तब शरीर में वह काँटा आया, “शैतान का एक दूत कि मुझे घूँसे मारे।” और क्या हुआ? पौलुस इसे समझ न सका, और उसने प्रभु से तीन बार प्रार्थना की कि वह उसे दूर कर दे; परन्तु प्रभु ने मानो यह कहा:
“नहीं; सम्भव है कि तू अपने आप को बड़ा समझने लगे, इसलिए मैंने तुझे निर्बल और दीन बनाए रखने के लिये यह क्लेश भेजा है।”
और तब पौलुस ने एक ऐसा पाठ सीखा जिसे वह कभी नहीं भूला, और वह था—अपनी निर्बलताओं में आनन्दित होना। उसने कहा कि वह जितना निर्बल होता, उसके लिये उतना ही अच्छा था, क्योंकि जब वह निर्बल होता, तब अपने प्रभु मसीह में बलवन्त होता।
क्या तुम उसमें प्रवेश करना चाहते हो जिसे लोग “उच्चतर जीवन” कहते हैं? तो एक सीढ़ी और नीचे उतरो। मुझे स्मरण है कि डॉ. बोर्डमैन बताया करते थे कि एक बार किसी सज्जन ने उन्हें एक कारखाना देखने बुलाया जहाँ बारीक छर्रे बनाए जाते थे, और मेरा विचार है कि कारीगर यह काम बड़ी ऊँचाई से पिघला हुआ सीसा नीचे उँडेलकर करते थे। ये सज्जन डॉ. बोर्डमैन को मीनार की चोटी पर ले जाना चाहते थे ताकि वे देखें कि काम कैसे होता है। डॉक्टर मीनार पर आए, द्वार से भीतर गए, और सीढ़ियाँ चढ़ने लगे; परन्तु जब वे कुछ ही सीढ़ियाँ चढ़े थे, तो उन सज्जन ने पुकारकर कहा:
“यह गलत रास्ता है। आपको इस ओर से नीचे आना होगा; वह सीढ़ी बन्द है।”
वे सज्जन उन्हें बहुत सी सीढ़ियाँ नीचे ले गए, और वहाँ उन्हें चोटी तक ले जाने के लिये एक लिफ़्ट तैयार थी; और उन्होंने कहा:
“मैंने एक पाठ सीखा है कि नीचे जाना प्रायः ऊपर पहुँचने का सबसे अच्छा मार्ग होता है।”
हाँ, परमेश्वर को हमें बहुत नीचे लाना पड़ेगा; हम पर खालीपन, निराशा और शून्यता का बोध आना पड़ेगा। जब हम पूर्ण असहायता में नीचे धँस जाते हैं, तभी सनातन परमेश्वर अपनी सामर्थ्य में अपने आप को प्रगट करेगा, और तभी हमारे हृदय केवल परमेश्वर पर भरोसा रखना सीखेंगे।
वह क्या है जो हमें उस पर पूरी तरह भरोसा रखने से रोकता है?
बहुत से लोग कहते हैं: “जो आप कहते हैं उस पर मैं विश्वास करता हूँ, परन्तु एक कठिनाई है। यदि मेरा भरोसा सिद्ध और सदा बना रहनेवाला होता, तो सब ठीक हो जाता, क्योंकि मैं जानता हूँ कि परमेश्वर भरोसे का आदर करेगा। परन्तु मैं वह भरोसा पाऊँ कैसे?”
मेरा उत्तर है: “स्वयं की मृत्यु के द्वारा। भरोसे की सबसे बड़ी बाधा अपना ही प्रयत्न है। जब तक तुम्हारे पास तुम्हारी अपनी बुद्धि, अपने विचार और अपनी शक्ति है, तब तक तुम परमेश्वर पर पूरा भरोसा नहीं रख सकते। परन्तु जब परमेश्वर तुम्हें तोड़ देता है, जब तुम्हारी आँखों के सामने सब कुछ धुँधला पड़ने लगता है, और तुम देखते हो कि तुम कुछ नहीं समझते, तब परमेश्वर निकट आ रहा होता है; और यदि तुम अपनी शून्यता में झुककर परमेश्वर की बाट जोहोगे, तो वह तुम्हारे लिये सब कुछ बन जाएगा।”
जब तक हम कुछ हैं, परमेश्वर सब कुछ नहीं हो सकता, और उसकी सर्वशक्तिमत्ता अपना पूरा काम नहीं कर सकती। विश्वास का आरम्भ यही है—अपने आप से पूर्ण निराशा, मनुष्य से और पृथ्वी की हर वस्तु से परे रहना, और केवल परमेश्वर में अपनी आशा पाना।
विश्वास विश्राम है
और फिर, इसके बाद, हमें समझना होगा कि विश्वास विश्राम है।
विश्वास-जीवन के आरम्भ में विश्वास संघर्ष करता है; परन्तु जब तक विश्वास संघर्ष कर रहा है, तब तक उसने अपनी पूरी शक्ति नहीं पाई। परन्तु जब संघर्ष करते-करते विश्वास अपने अन्त तक पहुँच जाता है, और बस अपने आप को परमेश्वर पर डाल देता है और उस पर विश्राम करता है, तब आनन्द और विजय आती है।
यदि मैं यह कहानी सुनाऊँ कि केज़िक सम्मेलन कैसे आरम्भ हुआ, तो शायद मैं इसे और स्पष्ट कर सकूँ। कैनन बैटर्सबी बीस वर्ष से अधिक समय तक चर्च ऑफ़ इंग्लैंड के एक सुसमाचारवादी पादरी रहे, गहरी और कोमल भक्ति वाले व्यक्ति, परन्तु उन्हें विश्राम और पाप पर विजय का बोध नहीं था, और ठोकर, विफलता और पाप के विचार से वे प्रायः गहरे उदास हो जाते थे। जब उन्होंने विजय की सम्भावना के विषय में सुना, तो उन्हें लगा कि यह वांछनीय है, परन्तु मानो वे उसे प्राप्त नहीं कर पा रहे थे। एक अवसर पर उन्होंने उस राजकर्मचारी की कहानी पर “विश्राम और विश्वास” विषय पर एक प्रवचन सुना, जो कफरनहूम से काना आया था कि मसीह से अपने बच्चे को चंगा करने की विनती करे। उस प्रवचन में यह दिखाया गया कि वह राजकर्मचारी सामान्य रूप से तो विश्वास करता था कि मसीह उसकी सहायता कर सकता है, परन्तु वह यीशु के पास बहुत कुछ एक प्रयोग के रूप में आया था। उसे आशा थी कि मसीह उसकी सहायता करेगा, परन्तु उस सहायता का उसे कोई निश्चय न था। परन्तु हुआ क्या? जब मसीह ने उससे कहा: “जा, तेरा पुत्र जीवित है,” तो उस मनुष्य ने यीशु की कही हुई बात पर विश्वास किया; वह उस वचन पर विश्राम करने लगा। उसके पास कोई प्रमाण न था कि उसका बच्चा फिर से अच्छा हो गया है, और उसे सात घण्टे की यात्रा करके कफरनहूम लौटना था। वह लौट चला, और मार्ग में उसे अपना दास मिला, और उसे पहला समाचार मिला कि बच्चा अच्छा हो गया है, कि पिछले दिन दोपहर एक बजे, ठीक उसी समय जब यीशु ने उससे बात की थी, बच्चे का ज्वर उतर गया था। वह पिता यीशु के वचन और उसके काम पर विश्राम करता रहा, और वह कफरनहूम पहुँचा और अपने बच्चे को अच्छा पाया; और उसने परमेश्वर की स्तुति की, और अपने सारे घराने समेत यीशु का विश्वासी और चेला बन गया।
आह, मित्रो, यही विश्वास है! जब परमेश्वर अपनी रक्षा की प्रतिज्ञा लेकर मेरे पास आता है, और पृथ्वी पर मेरे पास भरोसा रखने को कुछ नहीं होता, तब मैं परमेश्वर से कहता हूँ: “तेरा वचन पर्याप्त है; परमेश्वर की सामर्थ्य से रक्षा की जाती है।” यही विश्वास है, यही विश्राम है।
जब कैनन बैटर्सबी ने वह प्रवचन सुना, तो वे उस रात घर गए, और रात के अन्धकार में उन्होंने विश्राम पाया। उन्होंने यीशु के वचन पर विश्राम किया। और अगली सुबह ऑक्सफ़र्ड की सड़कों पर उन्होंने एक मित्र से कहा: “मुझे वह मिल गया है!” फिर उन्होंने जाकर दूसरों को बताया, और आग्रह किया कि केज़िक सम्मेलन आरम्भ किया जाए, और सम्मेलन में उनके साथ जो लोग हों वे सीधे-सादे ढंग से गवाही दें कि परमेश्वर ने क्या किया है।
यह बड़ी बात है जब कोई मनुष्य अपने जीवन के हर क्षण के लिये, क्रोध और उतावलेपन और रोष और प्रेमहीनता और घमण्ड और पाप की आनेवाली परीक्षाओं को ध्यान में रखते हुए, परमेश्वर की सर्वशक्तिमान सामर्थ्य पर विश्राम करने लगता है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए सर्वशक्तिमान यहोवा के साथ वाचा बाँधना बड़ी बात है—किसी मनुष्य की कही किसी बात के कारण नहीं, न मेरे हृदय की किसी अनुभूति के कारण, वरन् परमेश्वर के वचन के बल पर: “परमेश्वर की सामर्थ्य से, विश्वास के द्वारा रक्षा की जाती है।”
आह, आओ, हम परमेश्वर से कहें कि हम उसे पूरी सीमा तक परखेंगे। आओ, हम कहें: हम तुझसे उससे अधिक कुछ नहीं माँगते जितना तू दे सकता है, परन्तु उससे कम हम कुछ नहीं चाहते। आओ, हम कहें: हे मेरे परमेश्वर, मेरा जीवन इस बात का प्रमाण हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर क्या कर सकता है। हर दिन हमारे प्राणों की ये दो दशाएँ हों—गहरी असहायता, और सरल, बालक-सा विश्राम।
विश्वास को संगति चाहिए
यह मुझे विश्वास के विषय में केवल एक और विचार पर ले आता है—विश्वास में परमेश्वर के साथ संगति निहित है।
बहुत से लोग वचन को लेकर उस पर विश्वास करना चाहते हैं, और पाते हैं कि वे उस पर विश्वास नहीं कर पाते। आह, नहीं! तुम परमेश्वर को उसके वचन से अलग नहीं कर सकते। कोई भलाई या सामर्थ्य परमेश्वर से अलग होकर ग्रहण नहीं की जा सकती; और यदि तुम भक्ति के इस जीवन में प्रवेश करना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के साथ संगति के लिये समय अवश्य निकालना होगा।
लोग कभी-कभी मुझसे कहते हैं: “मेरा जीवन ऐसी भाग-दौड़ और हलचल का है कि मेरे पास परमेश्वर के साथ संगति के लिये समय ही नहीं।” एक प्रिय मिशनरी ने मुझसे कहा: “लोग नहीं जानते कि हम मिशनरियों की कैसी परीक्षा होती है। मैं सुबह पाँच बजे उठता हूँ, और वहाँ स्थानीय लोग काम के लिये अपने निर्देशों की प्रतीक्षा करते खड़े होते हैं। फिर मुझे पाठशाला जाकर वहाँ घण्टों बिताने पड़ते हैं; और फिर दूसरे काम होते हैं, और सोलह घण्टे दौड़ते हुए बीत जाते हैं, और मुझे परमेश्वर के साथ अकेले रहने का समय कठिनाई से ही मिल पाता है।”
आह! यही तो कमी है। मैं तुमसे विनती करता हूँ, दो बातें स्मरण रखो। मैंने तुमसे यह नहीं कहा कि परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता पर किसी वस्तु की तरह भरोसा रखो, और मैंने तुमसे यह नहीं कहा कि परमेश्वर के वचन पर एक लिखी हुई पुस्तक की तरह भरोसा रखो; वरन् मैंने तुमसे कहा है कि सर्वशक्तिमत्ता के परमेश्वर के पास और वचन के परमेश्वर के पास जाओ। परमेश्वर से वैसा ही व्यवहार करो जैसा उस राजकर्मचारी ने जीवते मसीह से किया। वह उस वचन पर विश्वास क्यों कर सका जो मसीह ने उससे कहा? क्योंकि परमेश्वर के पुत्र यीशु की आँखों में, उसके स्वर और उसकी वाणी में, उसने कुछ ऐसा देखा और सुना जिससे उसे लगा कि वह उस पर भरोसा रख सकता है। और मसीह तुम्हारे और मेरे लिये यही कर सकता है। विश्वास को भीतर से उभारने और जगाने का प्रयत्न मत करो। कितनी बार मैंने ऐसा करने का प्रयत्न किया है, और अपने आप को मूर्ख बनाया है! तुम अपने हृदय की गहराइयों से विश्वास नहीं उभार सकते। अपने हृदय को छोड़ो, और मसीह के मुख की ओर देखो, और सुनो कि वह तुम्हें क्या बताता है कि वह तुम्हारी रक्षा कैसे करेगा। अपने प्रेमी पिता के मुख की ओर ऊपर देखो, और हर दिन उसके साथ समय बिताओ, और एक नया जीवन आरम्भ करो—उस मनुष्य के गहरे खालीपन और दरिद्रता के साथ जिसके पास कुछ नहीं है और जो सब कुछ उसी से पाना चाहता है—उस मनुष्य के गहरे विश्राम के साथ जो जीवते परमेश्वर, सर्वशक्तिमान यहोवा पर विश्राम करता है—और परमेश्वर को परखो कि वह आकाश के झरोखे तुम्हारे लिये खोलकर तुम्हारे ऊपर अपरम्पार आशीष की वर्षा करता है कि नहीं।
अन्त में मैं यह पूछता हूँ कि क्या तुम स्वर्गीय विरासत के लिये स्वर्गीय रक्षा का पूरा-पूरा अनुभव करने को तैयार हो? रॉबर्ट मरे मैकशेन कहीं कहते हैं: “हे परमेश्वर, मुझे उतना पवित्र बना जितना एक क्षमा पाया हुआ पापी बनाया जा सकता है।” और यदि यह प्रार्थना तुम्हारे हृदय में है, तो अब आओ, हम सनातन और सर्वशक्तिमान यहोवा के साथ नये सिरे से वाचा बाँधें, और बड़ी असहायता में, परन्तु बड़े विश्राम में, अपने आप को उसके हाथों में सौंप दें। और फिर जब हम अपनी वाचा में प्रवेश करें, तो हमारी एक ही प्रार्थना हो—कि हम पूरी तरह विश्वास करें कि सनातन परमेश्वर हमारा साथी होगा, जो दिन के हर क्षण हमारा हाथ थामे रहेगा; हमारा रक्षक, जो एक क्षण का भी अन्तराल दिए बिना हम पर दृष्टि रखेगा; हमारा पिता, जो सदा हमारे प्राणों में अपने आप को प्रगट करने में आनन्दित होता है। उसमें यह सामर्थ्य है कि वह अपने प्रेम की धूप को दिन भर हमारे साथ रहने दे। इस कारण मत डरो कि तुम्हारे पास तुम्हारा कारोबार है, और इसलिए तुम परमेश्वर को सदा अपने साथ नहीं रख सकते। यह पाठ सीखो कि प्राकृतिक सूर्य दिन भर तुम पर चमकता है, और तुम उसके प्रकाश का आनन्द लेते हो, और तुम जहाँ कहीं भी हो, सूर्य तुम्हारे पास होता है; परमेश्वर ध्यान रखता है कि वह तुम पर चमके। और परमेश्वर ध्यान रखेगा कि उसकी अपनी ईश्वरीय ज्योति तुम पर चमके, और तुम उस ज्योति में बने रहो, यदि तुम केवल इसके लिये उस पर भरोसा रखो। आओ, हम बड़े और पूर्ण भरोसे के साथ परमेश्वर पर भरोसा रखें कि वह ऐसा ही करेगा।
यह रही परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता, और यह रहा विश्वास जो उस सर्वशक्तिमत्ता के माप तक हाथ बढ़ाता है। क्या हम यह न कहें: “वह सर्वशक्तिमत्ता जो कुछ कर सकती है, उस सब के लिये मैं अपने परमेश्वर पर भरोसा रखूँगा”? क्या इस स्वर्गीय जीवन के ये दोनों पक्ष अद्भुत नहीं हैं? परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता मुझे ढाँप लेती है, और मेरी इच्छा अपनी तुच्छता में उस सर्वशक्तिमत्ता में विश्राम करती है, और उसमें आनन्दित होती है!
क्षण-क्षण मैं उसके प्रेम में सुरक्षित हूँ;
क्षण-क्षण ऊपर से मुझे जीवन मिलता है;
यीशु की ओर ताकते हुए, महिमा चमकती है;
क्षण-क्षण, हे प्रभु, मैं तेरा हूँ!
अध्याय 8 पूरा हुआ
परमेश्वर की सामर्थ्य से सुरक्षित