अध्याय 6 · 16 मिनट का पठन
मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ!
“मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा? हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद हो” (रोमियों 7:24, 25)।
तुम जानते हो कि रोमियों की उस अद्भुत पत्री में इस पद का कैसा अद्भुत स्थान है। यह यहाँ सातवें अध्याय के अन्त में, आठवें अध्याय के प्रवेश-द्वार के रूप में खड़ा है। आठवें अध्याय के पहले सोलह पदों में पवित्र आत्मा का नाम सोलह बार आता है; वहाँ तुम्हें उस जीवन का वर्णन और उसकी प्रतिज्ञा मिलती है जिसे परमेश्वर की सन्तान पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में जी सकती है। यह दूसरे पद से आरम्भ होता है: “जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की, और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया” (रोमियों 8:2)। वहाँ से पौलुस परमेश्वर की उस सन्तान के बड़े विशेषाधिकारों की चर्चा करता है, जिसे परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलना है। इस सब का प्रवेश-द्वार सातवें अध्याय के चौबीसवें पद में है:
“मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ!”
यहाँ तुम्हारे सामने उस मनुष्य के शब्द हैं जो अपने आप के अन्त तक पहुँच गया है। पिछले पदों में वह वर्णन कर चुका है कि उसने किस प्रकार परमेश्वर की पवित्र व्यवस्था का पालन करने के लिये अपनी ही सामर्थ्य में संघर्ष और मल्लयुद्ध किया, और असफल रहा। परन्तु अपने ही प्रश्न के उत्तर में अब वह सच्चा उत्तर पा लेता है और पुकार उठता है: “हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद हो।” वहाँ से वह आगे बताता है कि वह छुटकारा क्या है जो उसने पाया है।
मैं इन शब्दों के द्वारा उस मार्ग का वर्णन करना चाहता हूँ जिससे मनुष्य दासत्व की आत्मा से निकालकर स्वतंत्रता की आत्मा में लाया जा सकता है। तुम जानते हो कि कितने स्पष्ट रूप से यह कहा गया है: “तुम को दासत्व की आत्मा नहीं मिली, कि फिर भयभीत हो।” हमें निरन्तर चेतावनी दी जाती है कि फिर से दासत्व में चले जाना ही मसीही जीवन का बड़ा खतरा है; और मैं उस मार्ग का वर्णन करना चाहता हूँ जिससे मनुष्य दासत्व से निकलकर परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता में पहुँच सकता है। बल्कि, मैं स्वयं उस मनुष्य का वर्णन करना चाहता हूँ।
पहला, ये शब्द एक नया जन्म पाए हुए मनुष्य की भाषा हैं; दूसरा, एक असमर्थ मनुष्य की; तीसरा, एक अभागे मनुष्य की; और चौथा, एक ऐसे मनुष्य की जो पूर्ण स्वतंत्रता की सीमा पर खड़ा है।
नया जन्म पाया हुआ मनुष्य
इस अध्याय के चौदहवें पद से लेकर तेईसवें पद तक नये जन्म के बहुत से प्रमाण हैं। “उसका करनेवाला मैं नहीं, वरन् पाप है जो मुझ में बसा हुआ है” (रोमियों 7:17): यह नया जन्म पाए हुए मनुष्य की भाषा है, ऐसे मनुष्य की जो जानता है कि उसका हृदय और स्वभाव नया किया गया है, और कि पाप अब उसमें एक ऐसी शक्ति है जो वह स्वयं नहीं है। “मैं भीतरी मनुष्यत्व से तो परमेश्वर की व्यवस्था से बहुत प्रसन्न रहता हूँ” (रोमियों 7:22): यह भी नया जन्म पाए हुए मनुष्य की भाषा है। जब वह बुराई करता है, तब वह यह कहने का साहस करता है: “उसका करनेवाला मैं नहीं, वरन् पाप है जो मुझ में बसा हुआ है।” इस बात को समझना बहुत महत्त्वपूर्ण है।
इस पत्री के पहले दो बड़े भागों में पौलुस धर्मी ठहराए जाने और पवित्रीकरण का विषय उठाता है। धर्मी ठहराए जाने की चर्चा करते हुए वह इस शिक्षा की नींव पाप के विषय में उपदेश पर रखता है, एकवचन पाप के रूप में नहीं, वरन् बहुवचन पापों के रूप में—अर्थात् वास्तविक अपराध। पाँचवें अध्याय के दूसरे भाग में वह पाप की चर्चा वास्तविक अपराध के रूप में नहीं, वरन् एक शक्ति के रूप में करने लगता है। ज़रा सोचो कि यदि रोमियों की पत्री के सातवें अध्याय का यह दूसरा आधा भाग हमारे पास न होता, यदि पौलुस अपनी शिक्षा में विश्वासी की पापमयता का यह अत्यन्त आवश्यक प्रश्न छोड़ देता, तो हमारी कितनी बड़ी हानि होती। तब हम उस प्रश्न से वंचित रह जाते जिसका उत्तर हम सब विश्वासी में पाप के विषय में जानना चाहते हैं। उसका उत्तर क्या है? नया जन्म पाया हुआ मनुष्य वह है जिसकी इच्छा नई की गई है, और जो कह सकता है: “मैं भीतरी मनुष्यत्व से तो परमेश्वर की व्यवस्था से बहुत प्रसन्न रहता हूँ।”
असमर्थ मनुष्य
यहीं बहुत से मसीही लोग बड़ी भूल करते हैं: वे सोचते हैं कि जब इच्छा नई हो गई, तो इतना ही बहुत है; परन्तु ऐसा नहीं है। यह नया जन्म पाया हुआ मनुष्य हमें बताता है: “भलाई करने की इच्छा तो मुझ में है, परन्तु उसे करने की सामर्थ्य मैं नहीं पाता।” लोग कितनी बार हमसे कहते हैं कि यदि तुम दृढ़ निश्चय कर लो, तो जो चाहो वह कर सकते हो! परन्तु यह मनुष्य उतना ही दृढ़ निश्चयी था जितना कोई मनुष्य हो सकता है, तौभी उसने यह अंगीकार किया: “इच्छा तो मुझ में है, परन्तु भले काम मुझसे बन नहीं पड़ते” (रोमियों 7:18)।
परन्तु तुम पूछते हो: “यह कैसे है कि परमेश्वर एक नया जन्म पाए हुए मनुष्य से ऐसा अंगीकार करवाता है, जिसकी इच्छा ठीक है, जिसका हृदय भलाई करने को तरसता है, और परमेश्वर से प्रेम करने के लिये अपना भरसक सब कुछ करने को तरसता है?”
आओ, इस प्रश्न पर विचार करें। परमेश्वर ने हमें इच्छा किस लिये दी है? जो स्वर्गदूत गिर गए, क्या उनकी अपनी इच्छा में स्थिर रहने की शक्ति थी? निश्चय ही नहीं। सृजे हुए प्राणी की इच्छा एक खाली पात्र के सिवा और कुछ नहीं, जिसमें परमेश्वर की सामर्थ्य प्रगट होनी है। प्राणी को जो कुछ होना है, वह सब उसे परमेश्वर में ही खोजना है। यह बात तुम्हें फिलिप्पियों की पत्री के दूसरे अध्याय में मिलती है, और यहाँ भी मिलती है, कि परमेश्वर का काम यह है कि वह अपनी सुइच्छा निमित्त हम में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाले। यहाँ एक मनुष्य है जो मानो कहता है: “परमेश्वर ने मुझ में काम करने का प्रभाव नहीं डाला।” परन्तु हमें सिखाया गया है कि परमेश्वर इच्छा और काम, दोनों का प्रभाव डालता है। इस प्रतीत होनेवाले विरोधाभास का मेल कैसे बैठाया जाए?
तुम पाओगे कि इस खण्ड में (रोमियों 7:6-25) पवित्र आत्मा का नाम एक बार भी नहीं आता, और न मसीह का नाम आता है। वह मनुष्य परमेश्वर की व्यवस्था को पूरा करने के लिये मल्लयुद्ध और संघर्ष कर रहा है। पवित्र आत्मा और मसीह के स्थान पर व्यवस्था का उल्लेख लगभग बीस बार हुआ है। इस अध्याय में एक विश्वासी दिखाया गया है जो अपनी नई की गई इच्छा से परमेश्वर की व्यवस्था का पालन करने का भरसक यत्न कर रहा है। इतना ही नहीं; तुम पाओगे कि छोटे-छोटे शब्द मैं, मुझे, मेरा चालीस से अधिक बार आते हैं। यह नया जन्म पाया हुआ मैं है, जो अपनी असमर्थता में आत्मा से भरे बिना व्यवस्था का पालन करना चाहता है। यह लगभग हर पवित्र जन का अनुभव है। मन-फिराव के बाद मनुष्य अपना भरसक करने लगता है, और असफल होता है; परन्तु यदि हम पूरे प्रकाश में लाए जाएँ, तो हमें फिर असफल होने की आवश्यकता नहीं। और यदि मन-फिराव के समय ही हमने आत्मा को उसकी परिपूर्णता में पा लिया हो, तो हमें कभी असफल होने की आवश्यकता ही नहीं।
परमेश्वर उस असफलता को होने देता है, ताकि नया जन्म पाया हुआ मनुष्य अपनी पूरी असमर्थता सीख ले। इसी संघर्ष के बीच हमें अपनी पूरी पापमयता का यह बोध होता है। हमारे साथ व्यवहार करने का परमेश्वर का यही तरीका है। वह उस मनुष्य को व्यवस्था पूरी करने का यत्न करने देता है, ताकि जब वह यत्न और मल्लयुद्ध करे, तो इस बात तक पहुँचाया जाए: “मैं परमेश्वर की नया जन्म पाई हुई सन्तान हूँ, परन्तु उसकी व्यवस्था का पालन करने में मैं पूरी तरह असहाय हूँ।” देखो, इस दशा का वर्णन करने के लिये सारे अध्याय में कैसे कड़े शब्दों का प्रयोग किया गया है: “मैं शारीरिक हूँ और पाप के हाथ बिका हुआ हूँ” (रोमियों 7:14); “मुझे अपने अंगों में दूसरे प्रकार की व्यवस्था दिखाई पड़ती है, जो मुझे बन्धन में डालती है” (रोमियों 7:23); और सबसे अन्त में, “मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?” (रोमियों 7:24)। यह विश्वासी, जो यहाँ गहरे पश्चाताप में झुका है, परमेश्वर की व्यवस्था का पालन करने में पूरी तरह असमर्थ है।
अभागा मनुष्य
जो मनुष्य यह अंगीकार करता है, वह केवल नया जन्म पाया हुआ और असमर्थ मनुष्य ही नहीं, वरन् अभागा मनुष्य भी है। वह पूरी तरह दुःखी और व्याकुल है; और वह क्या है जो उसे इतना व्याकुल करता है? यह इसलिए है कि परमेश्वर ने उसे ऐसा स्वभाव दिया है जो परमेश्वर से प्रेम करता है। वह गहरे दुःख में है, क्योंकि उसे लगता है कि वह अपने परमेश्वर की आज्ञा नहीं मान रहा। वह टूटे मन से कहता है: “यह करनेवाला मैं नहीं, परन्तु मैं पाप की उस भयानक शक्ति के अधीन हूँ, जो मुझे दबाए हुए है। यह मैं हूँ, और फिर भी मैं नहीं: हाय! हाय! यह मैं ही हूँ; मैं उससे इतनी घनिष्ठता से बँधा हूँ, और वह मेरे स्वभाव ही में इतनी घनिष्ठता से गुँथा हुआ है।” धन्य है परमेश्वर, जब कोई मनुष्य अपने हृदय की गहराई से यह कहना सीखता है: “मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ!” वह रोमियों के आठवें अध्याय की ओर बढ़ रहा है।
बहुत से लोग हैं जो इस अंगीकार को पाप का तकिया बना लेते हैं। वे कहते हैं कि यदि पौलुस को इस प्रकार अपनी निर्बलता और असहायता का अंगीकार करना पड़ा, तो वे क्या हैं कि उससे अच्छा करने का यत्न करें? इस प्रकार पवित्रता की बुलाहट चुपचाप एक ओर रख दी जाती है। भला होता कि हम में से हर एक ने ये शब्द उसी आत्मा में कहना सीखा होता जिसमें वे यहाँ लिखे गए हैं! जब हम सुनते हैं कि पाप वह घृणित काम है जिससे परमेश्वर घृणा रखता है, तो क्या हम में से बहुत से उस शब्द से सिकुड़ नहीं जाते? भला होता कि सब मसीही, जो पाप पर पाप करते चले जाते हैं, इस पद को मन में उतार लेते। यदि कभी तुम्हारे मुँह से कोई कटु वचन निकले, तो कहो: “मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ!” और हर बार जब तुम्हें क्रोध आ जाए, तो घुटने टेको और समझो कि परमेश्वर का कभी यह अभिप्राय नहीं था कि उसकी सन्तान इसी दशा में बनी रहे। भला होता कि हम इस वचन को अपने दैनिक जीवन में ले आते, और हर बार इसे कहते जब हमारे अपने सम्मान को ठेस लगती है, और हर बार जब हम कटु बातें कहते हैं, और हर बार जब हम प्रभु परमेश्वर के विरुद्ध, और प्रभु यीशु मसीह के विरुद्ध, उसकी दीनता, उसकी आज्ञाकारिता और उसके आत्म-बलिदान के विरुद्ध, पाप करते हैं! भला होता कि तुम और सब कुछ भूल सकते, और पुकार उठते: “मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?”
जब भी तुम पाप करो, तब तुम्हें यह क्यों कहना चाहिए? क्योंकि जब मनुष्य इस अंगीकार तक पहुँचाया जाता है, तभी छुटकारा निकट होता है।
और स्मरण रखो कि केवल असमर्थ और बन्दी होने का बोध ही उसे अभागा नहीं बना रहा था, वरन् सबसे बढ़कर अपने परमेश्वर के विरुद्ध पाप करने का बोध। व्यवस्था अपना काम कर रही थी, और उसकी दृष्टि में पाप को बहुत ही पापमय ठहरा रही थी। परमेश्वर को निरन्तर दुःखी करने का विचार पूरी तरह असहनीय हो गया—इसी ने यह भेदनेवाली पुकार निकलवाई: “कैसा अभागा मनुष्य!” जब तक हम अपनी असमर्थता और अपनी असफलता के विषय में बातें और तर्क करते रहते हैं, और केवल यह जानने का यत्न करते हैं कि रोमियों 7 का अर्थ क्या है, तब तक उससे हमें बहुत थोड़ा लाभ होगा; परन्तु जब एक बार हर एक पाप हमारी अभागी दशा के बोध को नई तीव्रता देने लगे, और हम अपनी सारी दशा को केवल असहायता की ही नहीं, वरन् वास्तविक और अत्यधिक पापमयता की दशा अनुभव करें, तब हम केवल यह पूछने को ही नहीं, “हमें कौन छुड़ाएगा?” वरन् यह पुकारने को भी विवश होंगे: “मेरे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद हो।”
लगभग छुटकारा पाया हुआ मनुष्य
उस मनुष्य ने परमेश्वर की सुन्दर व्यवस्था का पालन करने का यत्न किया है। उसने उससे प्रेम किया है, वह अपने पाप पर रोया है, उसने जय पाने का यत्न किया है, उसने एक के बाद एक दोष पर विजय पाने का यत्न किया है, परन्तु हर बार उसका अन्त असफलता में हुआ है।
“इस मृत्यु की देह” से उसका क्या अर्थ था? क्या उसका अर्थ था, मेरी देह, जब मैं मरूँ? निश्चय ही नहीं। आठवें अध्याय में तुम्हें इस प्रश्न का उत्तर इन शब्दों में मिलता है: “यदि आत्मा से देह की क्रियाओं को मारोगे, तो जीवित रहोगे।” यही वह मृत्यु की देह है जिससे वह छुटकारा ढूँढ़ रहा है।
और अब वह छुटकारे की देहली पर है! सातवें अध्याय के तेईसवें पद में हमें ये शब्द मिलते हैं: “मुझे अपने अंगों में दूसरे प्रकार की व्यवस्था दिखाई पड़ती है, जो मेरी बुद्धि की व्यवस्था से लड़ती है और मुझे पाप की व्यवस्था के बन्धन में डालती है जो मेरे अंगों में है।” यह एक बन्दी है जो पुकारता है: “मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?” वह ऐसा मनुष्य है जो अपने आपको बँधा हुआ अनुभव करता है। परन्तु आठवें अध्याय के दूसरे पद में इसके विपरीत बात देखो: “जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की, और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया।” यही हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा मिलनेवाला छुटकारा है; बन्दी के लिये वह स्वतंत्रता जो आत्मा लाता है। क्या तुम उस मनुष्य को, जिसे “मसीह यीशु में जीवन की आत्मा की व्यवस्था” ने स्वतंत्र कर दिया है, अब भी बन्दी रख सकते हो?
परन्तु तुम कहते हो, क्या उस नया जन्म पाए हुए मनुष्य के पास, जब उसने छठवें अध्याय में बात की, यीशु का आत्मा नहीं था? हाँ, था, परन्तु वह नहीं जानता था कि पवित्र आत्मा उसके लिये क्या कर सकता है।
परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा उस प्रकार काम नहीं करता जैसे वह प्रकृति में किसी अन्धी शक्ति के द्वारा करता है। वह अपने लोगों को विवेकशील, समझदार प्राणियों के रूप में आगे ले चलता है, और इसलिए जब वह हमें वह पवित्र आत्मा देना चाहता है जिसकी उसने प्रतिज्ञा की है, तो पहले वह हमें अपने आप के अन्त तक ले आता है, इस निश्चय तक कि यद्यपि हम व्यवस्था का पालन करने का यत्न करते रहे हैं, तौभी हम असफल हुए हैं। जब हम उसके अन्त तक पहुँच जाते हैं, तब वह हमें दिखाता है कि पवित्र आत्मा में हमारे पास आज्ञाकारिता की सामर्थ्य, विजय की सामर्थ्य, और सच्ची पवित्रता की सामर्थ्य है।
परमेश्वर इच्छा का प्रभाव डालता है, और वह काम का प्रभाव डालने को भी तैयार है, परन्तु हाय! बहुत से मसीही इसे गलत समझते हैं। वे सोचते हैं कि क्योंकि उनमें इच्छा है, इसलिए इतना ही बहुत है, और अब वे कर सकते हैं। ऐसा नहीं है। नई इच्छा एक स्थायी वरदान है, नये स्वभाव का एक गुण। करने की सामर्थ्य स्थायी वरदान नहीं है, वरन् उसे हर क्षण पवित्र आत्मा से प्राप्त करना पड़ता है। जो मनुष्य विश्वासी होते हुए भी अपनी असमर्थता के प्रति सचेत है, वही सीखेगा कि पवित्र आत्मा के द्वारा वह पवित्र जीवन जी सकता है। यह मनुष्य उस बड़े छुटकारे की देहली पर है; उस महिमामय आठवें अध्याय के लिये मार्ग तैयार हो चुका है। अब मैं यह गम्भीर प्रश्न पूछता हूँ: तुम कहाँ जी रहे हो? क्या तुम्हारी दशा यह है, “मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे कौन छुड़ाएगा?” और बीच-बीच में कभी-कभार पवित्र आत्मा की सामर्थ्य का थोड़ा-सा अनुभव? या यह है, “यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद हो! आत्मा की व्यवस्था ने मुझे पाप की, और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया”?
पवित्र आत्मा जो करता है, वह यह है कि वह विजय देता है। “यदि आत्मा से देह की क्रियाओं को मारोगे, तो जीवित रहोगे” (रोमियों 8:13)। यह पवित्र आत्मा ही है जो यह करता है—परमेश्वरत्व का तीसरा व्यक्ति। वही है जो, जब हृदय उसे ग्रहण करने के लिये पूरा खोल दिया जाता है, भीतर आकर वहाँ राज्य करता है, और दिन प्रतिदिन, घड़ी-घड़ी, और क्षण-क्षण देह की क्रियाओं को मारता है।
मैं इस बात को एक निष्कर्ष पर लाना चाहता हूँ। प्रिय मित्र, स्मरण रखो, हमें जिस बात की आवश्यकता है वह है निर्णय और कार्य तक पहुँचना। पवित्रशास्त्र में दो बहुत भिन्न प्रकार के मसीही हैं। बाइबल रोमियों, कुरिन्थियों और गलातियों में शरीर के आगे झुक जाने की बात करती है; और यही हज़ारों-हज़ार विश्वासियों का जीवन है। पवित्र आत्मा में उनके आनन्द की सारी कमी, और उस स्वतंत्रता की कमी जो वह देता है, केवल शरीर के कारण है। आत्मा उनके भीतर है, परन्तु जीवन पर शरीर का शासन है। उन्हें जिस बात की आवश्यकता है वह है परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलना। भला होता कि मैं उसकी हर एक सन्तान को यह समझा पाता कि इसका क्या अर्थ है कि सनातन परमेश्वर ने अपना प्रिय पुत्र, मसीह यीशु, दिया है कि वह हर दिन तुम्हारी रखवाली करे, और तुम्हें केवल भरोसा करना है; और कि पवित्र आत्मा का काम यह है कि वह तुम्हें हर क्षण यीशु को स्मरण रखने और उस पर भरोसा करने के योग्य बनाए! आत्मा इसलिए आया है कि उसके साथ का सम्बन्ध हर क्षण अटूट बना रहे। पवित्र आत्मा के लिये परमेश्वर की स्तुति हो! हम पवित्र आत्मा को एक विलासिता की वस्तु समझने के इतने आदी हो गए हैं, मानो वह विशेष अवसरों के लिये, या विशेष सेवकों और लोगों के लिये हो। परन्तु पवित्र आत्मा हर एक विश्वासी के लिये, दिन के हर एक क्षण, आवश्यक है। परमेश्वर की स्तुति हो कि वह तुम्हारे पास है, और कि वह तुम्हें मसीह में छुटकारे का पूरा अनुभव देता है, क्योंकि वह तुम्हें पाप की शक्ति से स्वतंत्र करता है।
कौन पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और स्वतंत्रता पाने को तरसता है? ओह, भाई, निराशा की एक अन्तिम पुकार के साथ परमेश्वर के आगे झुको:
“हे परमेश्वर, क्या मैं सदा इसी प्रकार पाप करता रहूँ? मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा? मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ!”
क्या तुम उस पुकार के साथ परमेश्वर के आगे गिर पड़ने और यीशु की सामर्थ्य को खोजने के लिये तैयार हो, कि वह तुम में वास करे और काम करे? क्या तुम यह कहने को तैयार हो: “यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद हो”?
यदि हमारा जीवन पवित्र आत्मा से भरा न हो, तो हमारे कलीसिया जाने या सम्मेलनों में भाग लेने से, अपनी बाइबल पढ़ने और प्रार्थना करने से क्या लाभ? परमेश्वर यही चाहता है; और कोई दूसरी वस्तु हमें सामर्थ्य और शान्ति का जीवन जीने के योग्य नहीं बनाएगी। तुम जानते हो कि जब कोई पादरी या माता-पिता प्रश्नोत्तरी का प्रयोग करते हैं, तो जब प्रश्न पूछा जाता है, तब उत्तर की अपेक्षा की जाती है। हाय! कितने मसीही यहाँ रखे गए प्रश्न से ही सन्तुष्ट हैं: “मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?” परन्तु कभी उत्तर नहीं देते। उत्तर देने के बदले वे चुप रहते हैं। यह कहने के बदले: “हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद हो,” वे उत्तर के बिना सदा प्रश्न को ही दोहराते रहते हैं। यदि तुम मसीह के पूर्ण छुटकारे का, और आत्मा की स्वतंत्रता का, परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता का मार्ग चाहते हो, तो उसे रोमियों के सातवें अध्याय से होकर पकड़ो; और फिर कहो: “हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद हो।” सदा कराहते रहने से सन्तुष्ट न रहो, वरन् कहो: “मैं, एक अभागा मनुष्य, यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ। चाहे मैं यह सब न भी देख पाऊँ, तौभी मैं परमेश्वर की स्तुति करूँगा।”
छुटकारा है, पवित्र आत्मा की स्वतंत्रता है। परमेश्वर का राज्य “वह आनन्द है जो पवित्र आत्मा से होता है” (रोमियों 14:17)।
अध्याय 6 पूरा हुआ
मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ!