अध्याय 5 · 18 मिनट का पठन
जो मनुष्य से नहीं हो सकता, वह परमेश्वर से हो सकता है
“उसने कहा, जो मनुष्य से नहीं हो सकता, वह परमेश्वर से हो सकता है” (लूका 18:27)।
मसीह ने उस धनी जवान सरदार से कहा था, “अपना सब कुछ बेचकर . . . और आकर मेरे पीछे हो ले।” वह जवान उदास होकर चला गया। तब मसीह ने चेलों की ओर मुड़कर कहा: “धनवानों का परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना कितना कठिन है!” हम पढ़ते हैं कि चेले बहुत चकित हुए, और उन्होंने उत्तर दिया: “यदि राज्य में प्रवेश करना इतना कठिन है, तो फिर किसका उद्धार हो सकता है?” और मसीह ने यह धन्य उत्तर दिया:
“जो मनुष्य से नहीं हो सकता, वह परमेश्वर से हो सकता है।”
इस पद में दो विचार हैं—एक यह कि धर्म में, उद्धार के प्रश्न में और पवित्र जीवन के द्वारा मसीह के पीछे चलने में, मनुष्य के लिये यह करना असम्भव है। और फिर उसके साथ-साथ यह विचार है—जो मनुष्य से नहीं हो सकता, वह परमेश्वर से हो सकता है।
ये दो विचार उन दो बड़े पाठों को दर्शाते हैं जो मनुष्य को धार्मिक जीवन में सीखने पड़ते हैं। पहला पाठ सीखने में अक्सर बहुत समय लगता है—कि धर्म में मनुष्य कुछ नहीं कर सकता, कि उद्धार मनुष्य के लिये असम्भव है। और अक्सर मनुष्य यह तो सीख लेता है, फिर भी दूसरा पाठ नहीं सीखता—कि जो उसके लिये असम्भव रहा है, वह परमेश्वर से हो सकता है। धन्य है वह मनुष्य जो दोनों पाठ सीख लेता है! इन्हें सीखना मसीही के जीवन की अवस्थाओं को चिह्नित करता है।
मनुष्य नहीं कर सकता
एक अवस्था वह है जब मनुष्य अपना भरसक प्रयत्न करता है और असफल होता है, जब वह और अच्छा करने का यत्न करता है और फिर असफल होता है, जब वह और भी अधिक यत्न करता है और सदा असफल ही होता है। फिर भी बहुत बार वह तब भी यह पाठ नहीं सीखता: मनुष्य के लिये परमेश्वर और मसीह की सेवा करना असम्भव है। पतरस ने तीन वर्ष मसीह की पाठशाला में बिताए, और उसने यह कभी नहीं सीखा कि यह असम्भव है, जब तक उसने अपने प्रभु का इन्कार नहीं किया और बाहर जाकर फूट फूटकर नहीं रोया। तब उसने यह सीखा।
ज़रा एक क्षण के लिये उस मनुष्य को देखो जो यह पाठ सीख रहा है। पहले तो वह इसके विरुद्ध लड़ता है; फिर वह इसके आगे झुक जाता है, परन्तु अनिच्छा से और निराश होकर; अन्त में वह इसे स्वेच्छा से स्वीकार करता है और इसमें आनन्दित होता है। मसीही जीवन के आरम्भ में नये विश्वासी को इस सत्य की कोई धारणा नहीं होती। उसका मन-फिराव हो चुका है, उसके हृदय में प्रभु का आनन्द है, वह दौड़ दौड़ने और लड़ाई लड़ने लगता है; उसे निश्चय है कि वह जय पा सकता है, क्योंकि वह उत्साही और सच्चा है, और परमेश्वर उसकी सहायता करेगा। फिर भी, न जाने कैसे, बहुत जल्द वह वहाँ असफल हो जाता है जहाँ उसे इसकी आशा न थी, और पाप उस पर हावी हो जाता है। वह निराश होता है; परन्तु सोचता है: “मैं पर्याप्त चौकस नहीं था, मैंने अपने संकल्प पर्याप्त दृढ़ नहीं किए।” और वह फिर से प्रण करता है, और फिर से प्रार्थना करता है, और फिर भी असफल होता है। उसने सोचा था: “क्या मैं नया जन्म पाया हुआ मनुष्य नहीं हूँ? क्या मेरे भीतर परमेश्वर का जीवन नहीं है?” और वह फिर सोचता है: “हाँ, और मेरी सहायता के लिये मसीह है, मैं पवित्र जीवन जी सकता हूँ।”
आगे चलकर वह मन की एक दूसरी दशा में पहुँचता है। वह देखने लगता है कि ऐसा जीवन असम्भव है, परन्तु वह इसे स्वीकार नहीं करता। बहुत से मसीही इस बिन्दु तक आते हैं: “मैं नहीं कर सकता”; और फिर सोचते हैं कि परमेश्वर ने उनसे कभी यह आशा ही नहीं रखी कि वे वह करें जो वे नहीं कर सकते। यदि तुम उनसे कहो कि परमेश्वर सचमुच इसकी आशा रखता है, तो यह उन्हें एक रहस्य-सा लगता है। बहुत से मसीही विश्राम और विजय के बदले एक निम्न जीवन, असफलता और पाप का जीवन जी रहे हैं, क्योंकि वे यह देखने लगे: “मैं नहीं कर सकता, यह असम्भव है।” और फिर भी वे इसे पूरी तरह नहीं समझते, और इसलिए, इस धारणा के अधीन कि मैं नहीं कर सकता, वे निराशा के वश में हो जाते हैं। वे अपना भरसक करेंगे, परन्तु वे कभी आशा नहीं रखते कि बहुत आगे बढ़ पाएँगे।
परन्तु परमेश्वर अपनी सन्तानों को एक तीसरी अवस्था तक ले जाता है, जब मनुष्य उस बात को, कि यह असम्भव है, उसकी पूरी सच्चाई में ग्रहण कर लेता है, और फिर भी साथ ही कहता है: “मुझे यह करना ही है, और मैं यह करूँगा—यह मनुष्य के लिये असम्भव है, फिर भी मुझे यह करना ही है”; जब नई की हुई इच्छा अपनी सारी शक्ति लगाने लगती है, और तीव्र लालसा और प्रार्थना में परमेश्वर को पुकारने लगती है: “हे प्रभु, इसका क्या अर्थ है?—मैं पाप की सामर्थ्य से कैसे छुड़ाया जाऊँ?”
यह रोमियों 7 में नया जन्म पाए हुए मनुष्य की दशा है। वहाँ तुम मसीही मनुष्य को पवित्र जीवन जीने के लिये अपना पूरा-पूरा यत्न करते हुए पाओगे। परमेश्वर की व्यवस्था उस पर ऐसी प्रगट हुई है कि वह हृदय की अभिलाषाओं की गहराई तक पहुँचती है, और वह मनुष्य साहस के साथ कह सकता है:
“मैं भीतरी मनुष्यत्व से तो परमेश्वर की व्यवस्था से बहुत प्रसन्न रहता हूँ। भलाई की इच्छा तो मुझ में है। मेरा हृदय परमेश्वर की व्यवस्था से प्रेम करता है, और मेरी इच्छा ने उस व्यवस्था को चुन लिया है।”
क्या ऐसा मनुष्य असफल हो सकता है, जिसका हृदय परमेश्वर की व्यवस्था के आनन्द से भरा है और जिसकी इच्छा ठीक काम करने को दृढ़ है? हाँ। रोमियों 7 हमें यही सिखाता है। किसी और बात की आवश्यकता है। केवल इतना ही नहीं कि मैं भीतरी मनुष्यत्व से परमेश्वर की व्यवस्था से प्रसन्न रहूँ, और वही चाहूँ जो परमेश्वर चाहता है, परन्तु मुझे एक ईश्वरीय सर्वसामर्थ्य की आवश्यकता है जो उसे मुझ में पूरा करे। और यही प्रेरित पौलुस फिलिप्पियों 2:13 में सिखाता है:
“परमेश्वर ही है, जिसने अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है।”
इस अन्तर पर ध्यान दो। रोमियों 7 में नया जन्म पाया हुआ मनुष्य कहता है: “इच्छा तो मुझ में है, परन्तु करना—मैं पाता हूँ कि मुझसे हो नहीं पाता। मैं चाहता तो हूँ, पर पूरा नहीं कर पाता।” परन्तु फिलिप्पियों 2 में तुम्हारे सामने ऐसा मनुष्य है जो और आगे ले जाया गया है, ऐसा मनुष्य जो समझता है कि जब परमेश्वर ने नई की हुई इच्छा उत्पन्न कर दी है, तो परमेश्वर वह सामर्थ्य भी देगा जिससे वह पूरा हो सके जो वह इच्छा चाहती है। आओ, हम इसे आत्मिक जीवन के पहले बड़े पाठ के रूप में ग्रहण करें: “हे मेरे परमेश्वर, यह मेरे लिये असम्भव है; शरीर और उसकी सारी शक्तियों का अन्त हो जाए, स्वयं का अन्त हो जाए, और असहाय होना ही मेरी महिमा हो।”
उस ईश्वरीय शिक्षा के लिये परमेश्वर की स्तुति हो जो हमें असहाय बनाती है!
जब तुमने परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण के विषय में सोचा, तो क्या तुम अपने आप के अन्त तक नहीं पहुँचाए गए, और क्या तुम्हें यह अनुभव नहीं हुआ कि तुम कैसे सचमुच दिन के हर क्षण—अपनी मेज़ पर, अपने घर में, अपने कारोबार में, परीक्षाओं और प्रलोभनों के बीच—परमेश्वर के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित मनुष्य के समान जी सकते हो? मैं तुमसे विनती करता हूँ, यह पाठ अभी सीख लो। यदि तुम्हें अनुभव हुआ कि तुम यह नहीं कर सकते, तो तुम सही मार्ग पर हो, यदि तुम अपने आप को ले चले जाने दो। उस स्थिति को स्वीकार करो, और परमेश्वर के सामने उस पर स्थिर रहो: “हे परमेश्वर, मेरे हृदय की अभिलाषा और आनन्द पूर्ण समर्पण है, परन्तु मैं इसे पूरा नहीं कर सकता। वह जीवन जीना मेरे लिये असम्भव है। यह मेरे बस के बाहर है।” गिर पड़ो और यह सीखो कि जब तुम पूरी रीति से असहाय हो, तब परमेश्वर तुम में न केवल इच्छा का, परन्तु काम का भी प्रभाव डालने आएगा।
परमेश्वर कर सकता है
अब दूसरा पाठ आता है। “जो मनुष्य से नहीं हो सकता, वह परमेश्वर से हो सकता है।”
मैंने थोड़ी देर पहले कहा था कि ऐसा मनुष्य अक्सर मिलता है जिसने यह पाठ सीख लिया है, मनुष्य से नहीं हो सकता, और फिर वह असहाय निराशा में हार मान लेता है, और आनन्द, बल या विजय के बिना एक दयनीय मसीही जीवन जीता है। और क्यों? क्योंकि वह अपने आप को दीन करके वह दूसरा पाठ नहीं सीखता: परमेश्वर से सब कुछ हो सकता है।
तुम्हारा धार्मिक जीवन प्रतिदिन इस बात का प्रमाण होना चाहिए कि परमेश्वर असम्भव काम करता है; तुम्हारा धार्मिक जीवन असम्भव बातों की एक शृंखला होना चाहिए, जो परमेश्वर की सर्वशक्तिमान सामर्थ्य से सम्भव और वास्तविक बना दी गई हों। मसीही को इसी की आवश्यकता है। वह एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आराधना करता है, और उसे यह समझना सीखना चाहिए कि उसे परमेश्वर की थोड़ी-सी सामर्थ्य की आवश्यकता नहीं, परन्तु उसे—श्रद्धा के साथ यह कहा जाए—परमेश्वर की सम्पूर्ण सर्वसामर्थ्य की आवश्यकता है, ताकि वह उसे ठीक बनाए रखे, और वह मसीही के समान जी सके।
सारी मसीहियत परमेश्वर की सर्वसामर्थ्य का काम है। मसीह यीशु के जन्म को देखो। वह ईश्वरीय सामर्थ्य का एक आश्चर्यकर्म था, और मरियम से कहा गया था: “परमेश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।” यह परमेश्वर की सर्वसामर्थ्य थी। मसीह के पुनरुत्थान को देखो। हमें सिखाया गया है कि परमेश्वर ने अपनी सामर्थ्य की अत्यन्त महानता के अनुसार मसीह को मरे हुओं में से जिलाया।
हर वृक्ष को उसी जड़ पर बढ़ना होता है जिससे वह निकलता है। तीन सौ वर्ष पुराना बांज का वृक्ष सारे समय उसी एक जड़ पर बढ़ता है जिससे उसका आरम्भ हुआ था। मसीहियत का आरम्भ परमेश्वर की सर्वसामर्थ्य में हुआ, और हर प्राण में उसे उसी सर्वसामर्थ्य में बने रहना है। उच्चतर मसीही जीवन की सारी सम्भावनाओं का उद्गम मसीह की उस सामर्थ्य की एक नई समझ में है, जो हम में परमेश्वर की सारी इच्छा पूरी करती है।
मैं अब तुम्हें बुलाना चाहता हूँ कि आओ और एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आराधना करो। क्या तुमने यह करना सीखा है? क्या तुमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के साथ इतनी निकटता से व्यवहार करना सीखा है कि तुम जानते हो कि सर्वसामर्थ्य तुम में काम कर रही है? बाहरी रूप में अक्सर उसका बहुत कम चिह्न दिखाई देता है। प्रेरित पौलुस ने कहा: “मैं निर्बलता और भय के साथ, और बहुत थरथराता हुआ तुम्हारे साथ रहा, और . . . मेरे प्रचार में . . . आत्मा और सामर्थ्य का प्रमाण था।” मानवीय ओर से दुर्बलता थी, ईश्वरीय ओर से ईश्वरीय सर्वसामर्थ्य थी। और यह हर भक्तिपूर्ण जीवन के विषय में सच है; और यदि हम केवल यह पाठ और अच्छी तरह सीख लें, और उसके प्रति सम्पूर्ण हृदय से, अविभाजित समर्पण कर दें, तो हम सीखेंगे कि हर घड़ी और हर क्षण सर्वशक्तिमान परमेश्वर के साथ निवास करने में कैसी धन्यता है। क्या तुमने कभी बाइबल में परमेश्वर की सर्वसामर्थ्य के गुण का अध्ययन किया है? तुम जानते हो कि परमेश्वर की सर्वसामर्थ्य ही ने संसार को रचा, और अन्धकार में से ज्योति को रचा, और मनुष्य को रचा। परन्तु क्या तुमने छुटकारे के कामों में परमेश्वर की सर्वसामर्थ्य का अध्ययन किया है?
अब्राहम को देखो। जब परमेश्वर ने उसे उस प्रजा का पिता होने के लिये बुलाया जिसमें से मसीह को जन्म लेना था, तो परमेश्वर ने उससे कहा: “मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ; मेरी उपस्थिति में चल और सिद्ध होता जा।” और परमेश्वर ने अब्राहम को सिखाया कि वह सर्वशक्तिमान जानकर उस पर भरोसा रखे; और चाहे वह उसका ऐसे देश को निकल जाना हो जिसे वह न जानता था, या कनानियों के हज़ारों के बीच एक परदेशी के रूप में उसका विश्वास—उसके विश्वास ने कहा: यह मेरा देश है—या चाहे वह अपने बुढ़ापे में, सारी आशा के विरुद्ध, पच्चीस वर्ष तक एक पुत्र की बाट जोहने में उसका विश्वास हो, या चाहे वह मोरिय्याह पर्वत पर इसहाक को मरे हुओं में से फिर पाना हो, जब वह उसे बलि करने जा रहा था—अब्राहम ने परमेश्वर पर विश्वास किया। वह विश्वास में दृढ़ होकर परमेश्वर की महिमा की, क्योंकि उसने प्रतिज्ञा करनेवाले को उसे पूरा करने में सामर्थी जाना।
तुम्हारे मसीही जीवन की दुर्बलता का कारण यह है कि तुम उसे कुछ हद तक स्वयं पूरा करना चाहते हो, और परमेश्वर से सहायता लेना चाहते हो। और ऐसा नहीं हो सकता। तुम्हें पूरी रीति से असहाय बन जाना चाहिए, ताकि परमेश्वर काम करे, और परमेश्वर महिमामय रीति से काम करेगा। यदि हमें सचमुच परमेश्वर के लिये काम करनेवाले बनना है, तो हमें इसी की आवश्यकता है। मैं पवित्रशास्त्र में से होकर तुम्हें प्रमाणित कर सकता हूँ कि कैसे मूसा ने, जब वह इस्राएल को मिस्र से निकाल लाया; कैसे यहोशू ने, जब वह उन्हें कनान देश में ले आया; कैसे पुराने नियम में परमेश्वर के सब दासों ने असम्भव काम करनेवाली परमेश्वर की सर्वसामर्थ्य पर भरोसा रखा। और यही परमेश्वर आज जीवित है, और यही परमेश्वर अपनी हर एक सन्तान का परमेश्वर है। और फिर भी हम में से कुछ चाहते हैं कि जब हम अपना भरसक करें, तब परमेश्वर हमें थोड़ी-सी सहायता दे दे, बजाय इसके कि हम यह समझें कि परमेश्वर क्या चाहता है, और यह कहें: “मैं कुछ नहीं कर सकता। परमेश्वर को ही सब कुछ करना है, और वह करेगा।” क्या तुमने कहा है: “आराधना में, काम में, पवित्रीकरण में, परमेश्वर की आज्ञाकारिता में, मैं अपने आप से कुछ नहीं कर सकता, और इसलिए मेरा स्थान यह है कि मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आराधना करूँ, और विश्वास करूँ कि वह हर क्षण मुझ में काम करेगा”? ओह, परमेश्वर हमें यह सिखाए! ओह, कि परमेश्वर अपने अनुग्रह से तुम्हें दिखाए कि तुम्हारा परमेश्वर कैसा है, और तुमने अपने आप को कैसे परमेश्वर को सौंपा है—एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर, जो अपनी सम्पूर्ण सर्वसामर्थ्य के साथ अपने आप को अपनी हर एक सन्तान के लिये उपलब्ध करने को तैयार है! क्या हम प्रभु यीशु का यह पाठ ग्रहण करके न कहें: “आमीन; जो मनुष्य से नहीं हो सकता, वह परमेश्वर से हो सकता है”?
याद करो कि हमने पतरस के विषय में, उसके आत्म-भरोसे, उसकी अपनी शक्ति, उसकी अपनी इच्छा के विषय में क्या कहा था, और कैसे वह अपने प्रभु का इन्कार कर बैठा। तुम अनुभव करते हो, “आह! यही तो स्व-जीवन है, यही शरीर का जीवन है जो मुझ पर राज्य करता है!” और अब, क्या तुमने विश्वास किया है कि उससे छुटकारा है? क्या तुमने विश्वास किया है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर तुम्हारे हृदय में मसीह को ऐसा प्रगट कर सकता है, पवित्र आत्मा को तुम में ऐसा राज्य करने दे सकता है, कि स्व-जीवन की तुम पर न सामर्थ्य होगी, न प्रभुता? क्या तुमने इन दोनों को एक साथ जोड़ा है, और पश्चाताप के आँसुओं के साथ, और गहरी दीनता और दुर्बलता के साथ पुकारा है: “हे परमेश्वर, यह मेरे लिये असम्भव है; मनुष्य यह नहीं कर सकता, परन्तु तेरे नाम की महिमा हो, वह परमेश्वर से हो सकता है”? क्या तुमने छुटकारे का दावा किया है? अभी करो। अपने आप को नये सिरे से पूर्ण समर्पण में असीम प्रेम के परमेश्वर के हाथों में सौंप दो; और जितना असीम उसका प्रेम है, उतनी ही असीम यह करने की उसकी सामर्थ्य है।
परमेश्वर मनुष्य में काम करता है
परन्तु फिर, हम पूर्ण समर्पण के प्रश्न पर आए, और हमने अनुभव किया कि मसीह की कलीसिया में इसी की घटी है, और इसी कारण पवित्र आत्मा हमें भर नहीं सकता, और इसी कारण हम पूरी रीति से पवित्र आत्मा के लिये अलग किए गए लोगों के समान नहीं जी सकते; इसी कारण शरीर और स्व-जीवन पर जय नहीं पाई जा सकती। हमने कभी नहीं समझा कि यीशु के समान परमेश्वर के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होना क्या है। मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग पूरे मन से और सच्चाई से कहते हैं: “आमीन, मैं परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का सन्देश स्वीकार करता हूँ”; और फिर भी सोचते हैं: “क्या यह कभी मेरा होगा? क्या मैं परमेश्वर पर भरोसा रख सकता हूँ कि वह मुझे ऐसा बनाए जिसके विषय में स्वर्ग में और पृथ्वी पर और नरक में कहा जाए, वह परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण में जीता है?” भाई, बहन, “जो मनुष्य से नहीं हो सकता, वह परमेश्वर से हो सकता है।” विश्वास करो कि जब वह मसीह में तुम्हें अपनी देखरेख में ले लेता है, तो परमेश्वर के लिये यह सम्भव है कि वह तुम्हें पूर्ण समर्पण का मनुष्य बनाए। और परमेश्वर उसे बनाए रखने में समर्थ है। वह तुम्हें सप्ताह की हर सुबह इस धन्य विचार के साथ—प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से—बिस्तर से उठने दे सकता है: “मैं परमेश्वर की देखरेख में हूँ। मेरा परमेश्वर मेरे लिये मेरा जीवन पूरा कर रहा है।”
कुछ लोग पवित्रीकरण के विषय में सोचते-सोचते थक गए हैं। तुम प्रार्थना करते हो, तुमने उसके लिये लालसा की और पुकारा है, और फिर भी वह इतना दूर दिखाई दिया! यीशु की पवित्रता और दीनता—तुम्हें कितना बोध है कि वह कितनी दूर है। प्रिय मित्रो, पवित्रीकरण का एकमात्र सिद्धान्त जो पवित्रशास्त्र के अनुसार, वास्तविक और प्रभावकारी है, वह यह है: “जो मनुष्य से नहीं हो सकता, वह परमेश्वर से हो सकता है।” परमेश्वर मनुष्यों को पवित्र कर सकता है, और अपनी सर्वशक्तिमान और पवित्र करनेवाली सामर्थ्य से परमेश्वर उन्हें हर क्षण सुरक्षित रख सकता है। ओह, कि हम अभी अपने परमेश्वर के एक कदम और निकट आ जाएँ! ओह, कि परमेश्वर की ज्योति चमके, और हम अपने परमेश्वर को और अच्छी तरह जानें!
मैं हम में मसीह के जीवन के विषय में आगे कह सकता हूँ—मसीह के समान जीना, मसीह को पाप से अपने उद्धारकर्ता के रूप में, और अपने जीवन और बल के रूप में ग्रहण करना। स्वर्ग में का परमेश्वर ही है जो इसे तुम में प्रगट कर सकता है। प्रेरित पौलुस की वह प्रार्थना क्या कहती है: “कि वह अपनी महिमा के धन के अनुसार तुम्हें यह दान दे”—यह निश्चय ही कोई बहुत अद्भुत बात होगी, यदि यह उसकी महिमा के धन के अनुसार है—“कि तुम उसके आत्मा से अपने भीतरी मनुष्यत्व में सामर्थ्य पाकर बलवन्त होते जाओ”? क्या तुम नहीं देखते कि यह सर्वशक्तिमान परमेश्वर है जो अपनी विश्वासी सन्तानों के हृदय में अपनी सर्वसामर्थ्य से काम करता है, ताकि मसीह भीतर वास करनेवाला उद्धारकर्ता बन सके? तुमने इसे पकड़ने और थामने का यत्न किया है, और तुमने इस पर विश्वास करने का यत्न किया है, और यह नहीं आया। इसका कारण यह था कि तुम इस विश्वास तक नहीं लाए गए थे कि “जो मनुष्य से नहीं हो सकता, वह परमेश्वर से हो सकता है।”
और इसलिए, मुझे भरोसा है कि प्रेम के विषय में कहे गए वचन ने बहुतों को यह देखने तक पहुँचाया होगा कि हम में प्रेम का एक बिलकुल नये रूप में भीतर प्रवाह होना चाहिए; यदि हमारे हृदय को दिन भर उमड़ते रहना है, तो उसे ऊपर से, अनन्त प्रेम के सोते से, जीवन से भरा जाना चाहिए; तब हमारे लिये अपने संगी मनुष्यों से प्रेम करना उतना ही स्वाभाविक होगा जितना मेम्ने के लिये कोमल होना और भेड़िये के लिये क्रूर होना स्वाभाविक है। जब तक मैं ऐसी दशा में नहीं लाया जाता कि कोई मनुष्य जितना अधिक मुझसे बैर करे और मेरी बुराई करे, जितना अधिक वह अप्रिय और प्रेम के अयोग्य हो, मैं उससे उतना ही अधिक प्रेम करूँगा; जब तक मैं ऐसी दशा में नहीं लाया जाता कि जितनी अधिक बाधाएँ और बैर और कृतघ्नता हों, उतना ही अधिक प्रेम की सामर्थ्य मुझ में जय पा सके—जब तक मैं यह देखने तक नहीं लाया जाता, तब तक मैं यह नहीं कह रहा हूँ: “मनुष्य से नहीं हो सकता।” परन्तु यदि तुम यह कहने तक पहुँचाए गए हो: “इस सन्देश ने मुझसे ऐसे प्रेम के विषय में बात की है जो पूरी तरह मेरी शक्ति से परे है; यह बिलकुल असम्भव है”—तो हम परमेश्वर के पास आकर कह सकते हैं: “तुझ से यह हो सकता है।”
कुछ लोग एक बड़े जागरण के लिये परमेश्वर को पुकार रहे हैं। मैं कह सकता हूँ कि यह निरन्तर मेरे हृदय की प्रार्थना है। ओह, काश परमेश्वर अपने विश्वासी लोगों को फिर से जागृत कर दे! मैं पहले कलीसिया के उन औपचारिक लोगों के विषय में जिनका मन-फिराव नहीं हुआ, या अविश्वासियों और संशयवादियों के विषय में, या अपने चारों ओर के सब दुखियों और नाश होनेवालों के विषय में नहीं सोच सकता; मेरा हृदय पहले यही प्रार्थना करता है: “हे मेरे परमेश्वर, अपनी कलीसिया और अपनी प्रजा को फिर से जागृत कर।” यह व्यर्थ नहीं कि हज़ारों हृदयों में पवित्रता और समर्पण की लालसाएँ हैं: यह परमेश्वर की सामर्थ्य का अग्रदूत है। परमेश्वर इच्छा का प्रभाव डालता है और फिर वह काम का प्रभाव डालता है। ये लालसाएँ इस बात की गवाही और प्रमाण हैं कि परमेश्वर ने इच्छा का प्रभाव डाला है। ओह, आओ, हम विश्वास से मानें कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपने लोगों के बीच हमारी विनती से कहीं अधिक काम का प्रभाव डालेगा। “अब जो ऐसा सामर्थी है,” पौलुस ने कहा, “कि हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक काम कर सकता है . . . उसकी महिमा हो।” हमारे हृदय यही कहें। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की महिमा हो, जो उससे भी बढ़कर कर सकता है जो हम माँगने या सोचने का साहस करते हैं!
“जो मनुष्य से नहीं हो सकता, वह परमेश्वर से हो सकता है।” तुम्हारे चारों ओर पाप और दुःख का संसार है, और शैतान वहाँ है। परन्तु याद रखो, मसीह सिंहासन पर है, मसीह अधिक बलवन्त है, मसीह ने जय पाई है, और मसीह जय पाएगा। परन्तु परमेश्वर की बाट जोहो। मेरा पद हमें नीचे गिराता है: “जो मनुष्य से नहीं हो सकता”; परन्तु अन्त में वह हमें ऊँचा उठाता है—“वह परमेश्वर से हो सकता है।” परमेश्वर से जुड़ जाओ। सर्वशक्तिमान जानकर उसकी आराधना करो और उस पर भरोसा रखो, न केवल अपने जीवन के लिये, परन्तु उन सब प्राणों के लिये भी जो तुम्हें सौंपे गए हैं। उसकी सर्वसामर्थ्य की आराधना किए बिना कभी प्रार्थना मत करो, यह कहते हुए: “हे पराक्रमी परमेश्वर, मैं तेरी सर्वशक्तिमत्ता का दावा करता हूँ।” और प्रार्थना का उत्तर आएगा, और अब्राहम के समान तुम विश्वास में दृढ़ होकर परमेश्वर की महिमा करोगे, क्योंकि तुम प्रतिज्ञा करनेवाले को उसे पूरा करने में सामर्थी जानते हो।
अध्याय 5 पूरा हुआ
जो मनुष्य से नहीं हो सकता, वह परमेश्वर से हो सकता है