सच्ची दाखलता
सच्चे चेले

अध्याय 19 · 4 मिनट का पठन

सच्चे चेले

मेरे पिता की महिमा इसी से होती है, कि तुम बहुत सा फल लाओ, तब ही तुम मेरे चेले ठहरोगे—यूहन्ना 15:8

तो क्या वे लोग जो बहुत फल नहीं लाते, चेले नहीं हैं? हो सकते हैं, परन्तु पिछड़ी हुई और अपरिपक्व अवस्था में। जो बहुत फल लाते हैं, उनके विषय में मसीह कहता है: “ये मेरे चेले हैं, वैसे ही जैसा मैं चाहता हूँ कि वे हों—ये सच्चे चेले हैं।” जैसे हम किसी ऐसे व्यक्ति के विषय में, जिसमें पौरुष का आदर्श साकार हुआ हो, कहते हैं: यह है मनुष्य! वैसे ही हमारा प्रभु बताता है कि उसके मन के अनुसार, उस नाम के योग्य चेले कौन हैं: वे जो बहुत फल लाते हैं। सुसमाचार में हम चेला शब्द का यह दोहरा अर्थ पाते हैं। कभी-कभी यह उन सब पर लागू होता है जिन्होंने मसीह की शिक्षा को ग्रहण किया। अन्य अवसरों पर इसमें केवल उन लोगों का भीतरी घेरा आता है जो पूरी रीति से मसीह के पीछे चले, और जिन्होंने सेवा के लिये अपने आप को उसके प्रशिक्षण में सौंप दिया। यह अन्तर सब युगों में बना रहा है। परमेश्वर के लोगों में सदा एक छोटी संख्या रही है जिसने अपने सारे मन से उसकी सेवा करनी चाही, जबकि अधिकांश लोग उसके अनुग्रह और उसकी इच्छा के ज्ञान के बहुत थोड़े से भाग से ही सन्तुष्ट रहे हैं।

और इस छोटे भीतरी घेरे में और उन बहुतों में, जो उसमें प्रवेश पाना नहीं चाहते, अन्तर क्या है? हम उसे इन शब्दों में पाते हैं: बहुत फल। बहुत से मसीहियों के लिये व्यक्तिगत सुरक्षा का विचार, जो उनके पहले जागरण के समय उचित था, अन्त तक उनके धर्म का एकमात्र लक्ष्य बना रहता है। सेवा और फल का विचार सदा दूसरे दर्जे का और बहुत ही गौण रहता है। बहुत फल की सच्ची लालसा उन्हें कभी व्याकुल नहीं करती। परन्तु जिन प्राणों ने यह पुकार सुनी है कि वे पूरी रीति से अपने प्रभु के लिये जीएँ, और उसके लिये अपना जीवन दें जैसे उसने अपना जीवन उनके लिये दिया, वे इससे कभी सन्तुष्ट नहीं हो सकते। उनकी दोहाई यह है कि वे जितना अधिक से अधिक हो सके उतना फल लाएँ, उतना जितना उनका प्रभु कभी चाह सकता है या उनमें दे सकता है।

बहुत सा फल लाओ, तब ही तुम मेरे चेले ठहरोगे—मैं हर पाठक से विनती करता हूँ कि वह इन शब्दों पर बड़ी गम्भीरता से विचार करे। धीरे-धीरे थोड़ा अधिक या थोड़ा अच्छा काम करने के विचार से सन्तुष्ट मत हो। इस रीति से वह शायद कभी न आए। बहुत फल, इन शब्दों को अपनी स्वर्गीय दाखलता की ओर से इस बात का प्रकाशन मानो कि तुम्हें क्या होना है, और तुम क्या हो सकते हो। इसे अपनी शक्ति से करने के प्रयत्न की असम्भवता को, उसकी निरी मूर्खता को, पूरी तरह स्वीकार कर लो। ये शब्द तुम्हें फिर से उस दाखलता की ओर देखने को बुलाएँ, जो अपनी स्वर्गीय परिपूर्णता को तुम में जी दिखाने का बीड़ा उठाती है। वे तुम में एक बार फिर यह विश्वास और यह अंगीकार जगाएँ: “मैं सच्ची दाखलता की डाली हूँ; मैं उसकी महिमा और पिता की महिमा के लिये बहुत फल ला सकता हूँ।”

हमें दूसरों का न्याय करने की आवश्यकता नहीं। परन्तु हम परमेश्वर के वचन में हर जगह चेलों के दो वर्ग देखते हैं। इसमें कोई हिचकिचाहट न हो कि हम अपना स्थान कहाँ लेते हैं। आओ, हम उससे माँगें कि वह हम पर प्रगट करे कि वह किस प्रकार पूरी रीति से उसे सौंपा हुआ जीवन माँगता है और उस पर अपना दावा रखता है, ऐसा जीवन जो उसके आत्मा से उतना भरा हो जितना वह हमें भर सकता है। हमारी अभिलाषा सिद्ध शुद्धता, अटूट बने रहने, निकटतम संगति और भरपूर फलवन्तता से कम किसी बात की न हो—सच्ची दाखलता की सच्ची डालियाँ।

संसार नाश हो रहा है, कलीसिया असफल हो रही है, मसीह का कार्य हानि उठा रहा है, मसीह शोकित है, क्योंकि ऐसे पूरे मन वाले मसीहियों की कमी है जो बहुत फल लाते हों। चाहे तुम ठीक से न भी देख पाओ कि इसमें क्या-क्या सम्मिलित है या यह कैसे होगा, तौभी उससे कह दो कि तुम उसकी डाली हो कि बहुत फल लाओ; कि तुम उसके अपने अर्थ में उसका चेला होने को तैयार हो।

मेरे चेले। धन्य प्रभु, बहुत फल इस बात का प्रमाण है कि तुझ सच्ची दाखलता के पास मुझ में एक सच्ची डाली है, एक ऐसा चेला जो पूरी रीति से तेरे अधिकार में है। मैं तुझ से विनती करता हूँ, मुझे बालक का सा यह बोध दे कि मेरा फल तुझे भाता है, वही जिसे तू बहुत फल गिनता है।

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