उकाब के समान ऊँचे उड़ो
ऊँची उड़ान

अध्याय 1 · 15 मिनट का पठन

ऊँची उड़ान

परमेश्वर यशायाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा हमें कैसा अद्भुत चित्र देता है, जैसा अध्याय 40 पद 28-31 में लिखा है: क्या तुम नहीं जानते? क्या तुम ने नहीं सुना? यहोवा जो सनातन परमेश्वर और पृथ्वी भर का सृजनहार है, वह न थकता, न श्रमित होता है, उसकी बुद्धि अगम है। वह थके हुए को बल देता है और शक्तिहीन को बहुत सामर्थ्य देता है। तरूण तो थकते और श्रमित हो जाते हैं, और जवान ठोकर खाकर गिरते हैं; परन्तु जो यहोवा की बाट जोहते हैं, वे नया बल प्राप्त करते जाएँगे, वे उकाबों के समान उड़ेंगे, वे दौड़ेंगे और श्रमित न होंगे, चलेंगे और थकित न होंगे।

[अन्तिम पद के ‘बाट जोहते’ शब्दों का बेहतर अनुवाद ‘बने रहना’ (‘लिपटे रहना’) होगा, क्योंकि इब्रानी शब्द qavah का मूल अर्थ यही है। (देखें स्ट्रॉन्ग्स #6960)] भजनकार दाऊद भजन संहिता 103:1-5 में लिखता है: हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह; और जो कुछ मुझ में है, वह उसके पवित्र नाम को धन्य कहे! हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह, और उसके किसी उपकार को न भूलना। वही तो तेरे सब अधर्म को क्षमा करता, और तेरे सब रोगों को चंगा करता है, वही तो तेरे प्राण को नाश होने से बचा लेता है, और तेरे सिर पर करुणा और दया का मुकुट बाँधता है, वही तो तेरी लालसा को उत्तम पदार्थों से तृप्त करता है, जिससे तेरी जवानी उकाब के समान नई हो जाती है।

मैंने कनाडा हंसों के एक दल को अपने ऊपर से कतार बाँधकर उड़ते देखा है; मैंने एक उफनती झील के पानी से पेलिकन पक्षियों के एक झुंड को उठते देखा है; मैंने गिद्धों की एक पूरी सेना को एक सड़ती हुई लोथ पर उतरते देखा है, परन्तु मैंने कभी भी ऐसा प्रभावशाली कुछ नहीं देखा जैसा एक परिपक्व उकाब, जो बाकी सब पक्षियों से बहुत ऊपर, ऊँचाई पर उड़ता है और जो कुछ उसकी दृष्टि में आता है, उस सब का शासक है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि प्राचीन काल के रोमियों ने और आज के अमेरिकियों ने उसे अपने महान राष्ट्रों का प्रतीक बनाया।

मेरे जीवन के सबसे अद्भुत दिनों में से एक कनाडा के पश्चिमी तट से कुछ ही दूर सैटर्ना द्वीप पर बीता, जहाँ वेल्स से मुझसे मिलने आए तीन मित्रों के साथ मैं एक ऊँची पहाड़ी की चोटी पर छह-सात उकाबों के बीच खड़ा था। वे झपट्टा मारते हुए हमारे नीचे की घाटी में उतरते और फिर ऊपर आकाश में ऊँचे उड़ जाते, और हमारे फैले हुए हाथों से कुछ ही फुट की दूरी से होकर निकल जाते। उन्हें मानो बहुत कम परिश्रम करना पड़ रहा था; खड़ी ढलानों से उस ऊँची भूमि की ओर उठती वायु-धाराओं पर सवार होते हुए उनका कोई पंख तेज़ी से फड़फड़ा नहीं रहा था।

परमेश्वर की इच्छा है कि उसके लोग वह सब बनें जो उन्हें बनना चाहिए — उकाबों के समान उसके साथ स्वर्गीय स्थानों में ऊँचे उड़ते हुए। फिर भी, हम में से बहुतों ने कभी उड़ना सीखा ही नहीं; इसके बदले हम अपने घोंसलों के आराम में पड़े रहने से ही सन्तुष्ट हैं, और रविवार सुबह मंच से परोसे गए ताज़ा भोजन को पचाते रहते हैं।

कुछ लोगों ने अपने पंख फड़फड़ाने का, रोज़मर्रा की साधारणता से ऊपर उठने का प्रयास किया है, क्योंकि उन्होंने दूसरे विश्वासियों को ऊँचाई पर उड़ते देखा या उनके बारे में सुना है, जो आत्मा की हवा पर उठते हुए अपने प्रभु की भरपूर आशीषों का आनन्द ले रहे हैं।

उन्होंने ‘विश्वास में कदम बढ़ाया’ है या कोई जोखिम उठाया है, और अक्सर इसका परिणाम निराशा और चोट ही रहा, जब वे धड़ाम से धरती पर वापस आ गिरे।

हमारी कलीसियाएँ ऐसे लोगों से भरी हैं जो स्वयं को ऊँचे उड़ते उकाब की अपेक्षा आँगन की मुर्गी के समान अधिक पाते हैं! वे उन्हीं के लाभ के लिये बनाए गए कलीसियाई कार्यक्रमों की भरी-पूरी थाली के बीच आशीषों के दाने चुगते हुए कुड़-कुड़ करते रहने से सन्तुष्ट हैं। यदि उकाब के समान उड़ना हमारे लिये परमेश्वर की इच्छा और हमारे हृदयों की लालसा है, तो यह इतना कठिन क्यों प्रतीत होता है? किसी ने व्यंग्य से कहा है कि ‘जब आप चारों ओर टर्की पक्षियों से घिरे हों, तो उकाब के समान उड़ना कठिन है!’ परन्तु मेरा सुझाव है कि इसके और भी मूलभूत कारण हैं।

कुछ कारण जिनसे बहुत से लोग उड़ नहीं पाते

1. वे ‘घायल’ ही जन्म लेते हैं।

जब हम परमेश्वर के आत्मा से नये सिरे से जन्मे, तो हमारी आत्माएँ परमेश्वर के प्रति जीवित हो उठीं; हम अंधकार के राज्य से ज्योति के राज्य में पहुँचा दिए गए, मृत्यु से जीवन में ले आए गए। हम नये प्राणी बनाए गए, ‘पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, वे सब नई हो गईं’। धर्मविज्ञानी इसे धर्मी ठहराया जाना कहते हैं — आत्मा का उद्धार — पवित्र आत्मा का एक बीता हुआ कार्य, जिसके द्वारा हम पाप के दण्ड से बचाए गए।

परन्तु हमारी देह अचानक नहीं बदली — वह अब भी एक-एक दिन करके मर रही है, और पाप के शारीरिक परिणाम हमारी देह में बने हुए हैं। पुराने घावों के निशान रह जाते हैं, पढ़ने के लिये हमें अब भी चश्मे की आवश्यकता होती है, हमारे बाल झड़ते ही जाते हैं और हमारे दाँतों के बीच की खाली जगहें चमचमाते नये इनैमल से नहीं भर रहीं। स्पष्ट है कि हमारी देह ‘नई सृष्टि’ नहीं बनी! परमेश्वर की स्तुति हो, एक दिन वह भी नई बना दी जाएगी, जब यह नाशवान अविनाश को पहन लेगा, और यह मरनहार अमरता को पहन लेगा।

हम इसे महिमान्वित किया जाना कहते हैं — देह का उद्धार — पवित्र आत्मा का एक भविष्य का कार्य, जिसके द्वारा हम पाप की उपस्थिति से बचाए जाएँगे।

इसी प्रकार, हमारे प्राण भी उन घावों से तुरन्त चंगे नहीं हुए जो उन्होंने सहे थे; ऐसे घाव जैसे तिरस्कार, त्याग दिया जाना, मौखिक और शारीरिक आघात, जो हीनभावना, असुरक्षा और भय को जन्म देते हैं; ऐसे घाव जो अक्सर अवचेतन मन की गहराई में छिपे रहते हैं। यदि आप तलाक़ लेनेवाले माता-पिता की सन्तान हैं, तो आप घाव ढो रहे हैं। यदि विवाह के बन्धन के बाहर शारीरिक सम्बन्ध हुआ है, तो आप घाव ढो रहे हैं। यदि आपके माता-पिता आपमें वह प्रेम नहीं उँडेल पाए जो सुरक्षा, आत्म-सम्मान और भावनात्मक कुशलता में दिखाई देता है, तो आप घाव ढो रहे हैं। शैतान उन अनेक घावों को जानता है जिन्हें हम ढोते हैं, और जब भी हम परमेश्वर के लिये बड़े काम करने का प्रयास करते हैं, वह उन्हें भड़काने में देर नहीं करता।

शुभ समाचार यह है कि क्रूस के प्रायश्चित्त के कार्य में इन घावों के लिये भी चंगाई और सम्पूर्णता मिलती है। हम इसे पवित्रीकरण कहते हैं — प्राण का उद्धार — पवित्र आत्मा का एक वर्तमान, निरन्तर चलनेवाला कार्य, जिसके द्वारा हम पाप की शक्ति से बचाए जा रहे हैं। जब तक इन घावों से — आत्मिक रीति से — निपटा नहीं जाता, तब तक हमारी ‘उड़ान’ सीमित रहेगी। (मेरी दूसरी पुस्तक मेरे हाथ में कुँजी देखें।)

“शान्ति का परमेश्वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे; तुम्हारी आत्मा, प्राण और देह हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने तक पूरे और निर्दोष सुरक्षित रहें।”

2. हमने परमेश्वर के जीवन-सिद्धान्तों के विरुद्ध निर्णय लिए हैं।

उनमें से बहुत से निर्णयों के परिणाम जीवन भर रहते हैं। उदाहरण के लिये, हमें सिखाया गया है कि ‘अविश्वासियों के साथ असमान जूए में न जुतो’, फिर भी बहुत से विश्वासी हैं जिन्होंने अविश्वासी जीवनसाथी से विवाह कर लिया है। चाहे प्रभु ने उन्हें अपनी सेवा में किसी महान नियति के लिये बुलाया हो, अब उनकी पहली ज़िम्मेदारी अपने अविश्वासी साथी के सामने गवाह बनना है। निस्सन्देह, प्रभु उस अविश्वासी साथी को अपने पास ला सकता है, यद्यपि ऐसा प्रायः नहीं होता, और तब दोनों उड़ना सीख सकते हैं। यदि साथी प्रभु को समर्पित न भी हो, तब भी प्रभु ऐसे लोगों का उपयोग कर सकता है, परन्तु ‘उड़ान’ बहुत सीमित रहती है और वह निर्णय पलटा नहीं जा सकता।

परन्तु दूसरे निर्णय पलटे जा सकते हैं, और यदि कोई उकाब के समान उड़ना चाहता है, तो उन्हें पलटना ही होगा। बहुत से लोग क़र्ज़ में जी रहे हैं, जो परमेश्वर के वचन के बिलकुल विपरीत है, और उन्हें यह एहसास ही नहीं कि वे अब मामोन की, एक पराए देवता की, सेवा कर रहे हैं! जब मैं देखता हूँ कि कितने ही मसीही अगुवे और कलीसियाएँ अपने ऊपर क़र्ज़ का भारी बोझ ले लेते हैं, तो मैं पूरी तरह चकित रह जाता हूँ; जब वे अपने लेनदारों की माँगें पूरी करने में असमर्थ हो जाते हैं, तो यह क़र्ज़ उन्हें एक ऐसे बन्धन में डाल देता है जो प्रभु ने उनके लिये कभी नहीं ठहराया था। जब तक वे अपने लेनदारों की माँगों के अधीन आ सकते हैं, तब तक प्रभु उन्हें अपनी सेवा में महानता के लिये मुक्त नहीं कर सकता।

बहुत से लोग अपने हृदयों में दूसरों के प्रति क्षमा न करने का भाव लिये हुए हैं, और इस प्रकार शैतान को अवसर दे रहे हैं, जबकि इनसे भी अधिक लोग ठेस और पूर्वाग्रह ढो रहे हैं। ये सब ऐसे निर्णय हैं जो उन्होंने स्वयं लिए हैं, यद्यपि वे दोष किसी और पर डालना अधिक पसन्द करेंगे। जब किसी ने आपके साथ अन्याय किया हो, तो प्रभु ने प्रतिज्ञा की है कि वह उस अन्याय को सहने और क्षमा करने के लिये आपको पर्याप्त अनुग्रह देगा।

जब कोई अपने कामों, अपने स्वभाव या अपने शब्दों से आपको ठेस पहुँचाता है, तो आप यह चुन सकते हैं कि उस बन्दर को अपने कन्धों पर बैठने न दें!

यदि वह बना रहता है, तो वह ठेस आपकी अपनी है! पूर्वाग्रह वे नकारात्मक दृष्टिकोण हैं जो हम दूसरों के प्रति रखते हैं, और जो प्रायः अज्ञानता पर आधारित होते हैं। स्मरण रखें, जब तक आप किसी दूसरे व्यक्ति के जूतों में कुछ मील चल न लें, तब तक आप कभी नहीं जान पाएँगे कि उस पर क्या बीतती है!

प्रभु अब भी इन सब लोगों का सेवकाई में उपयोग कर सकता है, परन्तु ‘उड़ान’ सीमित रहती है।

“आओ, हर एक रोकनेवाली वस्तु, और उलझानेवाले पाप को दूर करके, वह दौड़ जिसमें हमें दौड़ना है, धीरज से दौड़ें।”

3. हमने कभी समझा ही नहीं कि हमें उड़ना चाहिए!

हम अपने मसीही जीवन की साधारणता से इतने सन्तुष्ट हो गए हैं कि हमने कभी यह प्रश्न ही नहीं किया कि क्या इससे बढ़कर भी कुछ है। हम इसी से सन्तुष्ट हैं कि हर रविवार मंच के सन्देश से हमारा पोषण हो जाए, और साथ में कार के रेडियो पर कुछ अच्छा-सा ‘आराधना’ संगीत और किसी नवीनतम मसीही हस्ती की कोई मन बहलानेवाली पुस्तक मिल जाए। निश्चय ही यह असामान्य है — बल्कि उस भरपूर जीवन से बहुत नीचे है, जो प्रभु ने हमारे लिये ठहराया था!

पश्चिमी संसार के बड़े भाग की दुर्बल, भौतिकवादी मसीहियत ने हमें इतना संवेदनहीन बना दिया है कि अब हम अपने दूल्हे को यह कहते हुए नहीं सुन पाते, हे मेरी प्रिय, उठकर चली आ। उसकी आवाज़ किसी पराए की आवाज़ बन गई है, और दुल्हन उसके मधुर स्वर को भूल गई है। उसने इस संसार से बहुत अधिक प्रेम किया है, और इसकी चिन्ताओं और मैल ने उसे दबा दिया है।

यदि कोई प्रभु की आवाज़ सुनने, उसके निकट आने का प्रयत्न करे, तो उसे उपहास में ‘रहस्यवादी’ कहा जाता है (जैसा एक बार एक वरिष्ठ पासबान ने मुझे कहा था!) अब हमें न तो चरवाहे की आवाज़ सुनने की परवाह है, न ही उसकी आशा।

हमारी बहुत सी कलीसियाएँ ऐसे स्थान बन गई हैं जहाँ हम इसलिए जाते हैं कि हमें अच्छा महसूस हो, न कि परमेश्वर की आराधना करने और यह सीखने के लिये कि हमारे जीवनों से उसकी क्या माँगें हैं। हम उसकी आवाज़ सुनना पसन्द नहीं करते, कहीं ऐसा न हो कि उससे हमें अपने पाप का बोध हो जाए। जब भी कोई मुझे किसी ‘महान’ कलीसिया के बारे में बताता है जहाँ वह जाता है, तो मैं बिना उकसाए यह जानने का प्रयत्न करता हूँ कि ‘महान’ से उसका क्या अर्थ है। अक्सर उनका अर्थ यह होता है कि संख्या बढ़ रही है, यीशु को ऊँचा उठाया जा रहा है, हाथ हवा में ऊपर उठे हुए हैं, गीत जोशीले हैं, और उपदेश ज़्यादा से ज़्यादा पच्चीस मिनट के होते हैं, किसी ऐसे विषय पर जो कोई चुनौती नहीं देता! हम ऐसी कलीसिया में रहना चाहते हैं जो ऊपर ही ऊपर बढ़ती जा रही हो! मुझे यह बात गहराई से छूती है कि 1904 की महान वेल्श जागृति में परमेश्वर के साधन, इवान रॉबर्ट्स ने यह प्रार्थना करते हुए उकाब के समान उड़ना सीखा, “हे प्रभु, मुझे झुका दे, मुझे और नीचे झुका दे!”

मुझे आगे यह भी लगता है कि हमारी बहुत सी ‘महान’ कलीसियाएँ अगुवे के करिश्मे के कारण ऐसी हैं, न कि पवित्र आत्मा के वरदानों के कारण। वह अगुवा व्यापार का साम्राज्य खड़ा करने में भी उतना ही सफल होता जितना वह अपनी निजी कलीसिया का साम्राज्य खड़ा करने में हुआ है। उसने अपने अधीन काम करनेवालों को नियंत्रित करने की व्यापार-जगत की सारी तकनीकें सीख ली हैं, और अधिकार और ज़िम्मेदारी का एक पक्का ‘फ़्लो चार्ट’ बना रखा है। इसी प्रकार, दूसरे छोर पर, हमारी बहुत सी छोटी कलीसियाएँ अपने अगुवे की असुरक्षा और नियंत्रण के कारण छोटी ही रह जाती हैं।

मुझ पर बहुत ज़ोर मत डालो! मैं तो यहीं अपने घोंसले में आराम करके खुश हूँ!

4. हमारे पंख कतर दिए गए हैं ताकि हम बहुत ऊँचा न उड़ें!

हमारे बहुत से अगुवों ने यह नहीं समझा है कि अपने लोगों को उड़ना सिखाना उनकी ज़िम्मेदारी है। इसके बदले, बहुत सी कलीसियाएँ और पैराचर्च संस्थाएँ संसार की व्यवस्थाओं की तरह चलाई जाती हैं, जहाँ संगठन का ढाँचा पिरामिड जैसा होता है, शक्ति ऊपर से नीचे की ओर बहती है और मुख्य शब्द होता है नियंत्रण। यीशु ने कहा, “तुम ऐसे न होना!” एक पासबान के रूप में मेरे लिये यह बड़ी चुनौती है कि मेरा काम यह है कि “पवित्र लोग सिद्ध हो जाएँ और सेवा का काम किया जाए।” अर्थात् उन्हें उड़ना सिखाना! मैं चेले बनाने के लिये बुलाया गया हूँ, बड़े घोंसले बनाने के लिये नहीं! — और चेलों को वैसे ही उड़ना चाहिए जैसा परमेश्वर ने उनके लिये ठहराया है।

उकाब तब तक विश्राम नहीं करता जब तक वह अपने बच्चों को आकाश के विशाल विस्तार में बाकी सब पक्षियों से ऊपर उठकर ऊँचा उड़ते हुए नहीं देख लेता। काश, पासबानों में भी यही लालसा होती — अपने लोगों को खिलाना, सिखाना और मुक्त करना, ताकि हर एक मसीह में अपनी सर्वोच्च नियति तक पहुँच सके। इसके बदले, हम अक्सर उन्हें अपने लोगों के पंख कतरते देखते हैं, ताकि वे ‘उनकी’ कलीसिया के आराम में खलल न डालें।

आख़िर यह कलीसिया है किसकी?

मैं ऑस्ट्रेलिया में एक पासबान के घर पर था, जहाँ मेरे मेज़बान ने अपने कनाडाई अतिथि के साथ संगति की एक शाम के लिये अपने कई मित्रों को बुलाया था। उन्होंने संक्षेप में मेरा परिचय दिया और मुझसे कहा कि प्रभु ने मेरे हृदय में जो कुछ डाला हो, वह मैं उनके अतिथियों के साथ बाँटूँ। मैंने उनके दिए परिचय को थोड़ा और विस्तार देकर आरम्भ किया। “मैं एक पासबान हूँ; इस समय किसी कलीसिया का प्रभारी नहीं हूँ, फिर भी इफिसियों 4:11 के अनुसार पासबान हूँ, और अपनी बुलाहट और उस सेवकाई को जानता हूँ जो प्रभु ने मेरे सामने रखी है।” तुरन्त वहाँ उपस्थित एक अधेड़ उम्र की स्त्री ने इतनी ऊँची आवाज़ में कि सब सुन लें, कहा, “लगता है, अब फिर से हमारे पंख कतरे जाएँगे!” मैं केवल यही अनुमान लगा सका कि पासबानों के साथ उसका अनुभव यह रहा था कि वे उसे लगातार उस काम में रोकते रहे, जिसे वह अपने जीवन पर परमेश्वर की बुलाहट समझती थी।

मुझे यह कहते हुए खुशी है कि शाम के अन्त तक वह और मैं ‘पक्के दोस्त’ बन गए थे! जब मैंने अपनी बात समाप्त की, तो उसने ज़ोरदार “आमीन” भी कहा।

मुझे यह भी जोड़ना होगा कि उसी सभा में मेरी भेंट सबसे अप्रिय प्रकार के मसीहियों में से एक से हुई — स्वयं-नियुक्त “शहरपनाह पर का पहरुआ”, जिसके जीवन का काम यह है कि पासबान या अतिथि वक्ता जो कुछ भी कहे, उसकी हर उस बात की आलोचना करे जिसका अर्थ (पहरुए के अनुसार) पवित्र लोगों के लिये कुछ ख़तरनाक निकाला जा सके — अक्सर ऐसी बात, जिसका वक्ता ने कभी इरादा भी नहीं किया था। एक अच्छे पासबान को निश्चय ही ऐसे पंख कतरने ही पड़ेंगे!

हमारी कलीसियाओं में बहुत से ऐसे जवान हैं जिन्हें अभी तक वह आलस्य का रोग नहीं लगा जो बड़ी उम्र के सदस्यों में इतना आम है, और जिनके मन में प्रभु की सेवा करने के सपने और विचार हैं।

“क्यों न हम एक कॉफ़ी शॉप शुरू करें? क्या किसी रविवार जवान लोग आराधना की अगुवाई कर सकते हैं? क्या हम खुले में एक सभा रख सकते हैं? मैं यूथ विद अ मिशन या कैम्पस क्रूसेड के साथ किसी मिशन-यात्रा पर जाना चाहता हूँ। क्या हम रंगे हुए बालों और नाक में छल्लेवाले सड़क के बच्चों के लिये एक बारबेक्यू रख सकते हैं? क्या हम रग्बी टी-शर्ट और नीली जीन्स पहने एक युवा गायक-मण्डली बना सकते हैं?” हम उनके उत्साह की सराहना तो करते हैं, परन्तु एक सौ एक बहाने बनाकर उन्हें तुरन्त हतोत्साहित कर देते हैं।

हम नहीं चाहते कि हमारी ‘नाव डगमगाए।’ आख़िरकार, हमारी कलीसिया एक प्रतिष्ठित कलीसिया है और हमने सब कुछ ‘नियंत्रण में’ रखा है। हमें सचमुच और कार्यक्रमों की आवश्यकता नहीं, विशेषकर ऐसे कार्यक्रमों की तो बिलकुल नहीं जिन पर संसार का ध्यान जाए, जैसे ऊपर सुझाए गए।

आख़िरकार, यह जानना तो पासबान का काम है कि परमेश्वर अपनी कलीसिया में कौन-से कार्यक्रम चाहता है, है न? है न???

यदि ऊपर व्यक्त किए गए मेरे विचार सच हैं, तो कोई आश्चर्य नहीं कि इतने सारे विश्वासी मोहभंग, कुण्ठा और घावों के कारण अब किसी स्थानीय कलीसिया के साथ अच्छी संगति में नहीं हैं।

मेरे हृदय पर बोझ उस दुखी कलीसिया के लिये है, विशेषकर उन पासबानों और मिशनरियों के लिये जो ‘मोर्चे की अग्रिम पंक्ति’ पर हैं और अपने विरुद्ध किए गए अन्यायों और घावों से पीड़ित हैं — जो प्रायः, और दुःख की बात है, मसीह की देह के ही दूसरे सदस्यों द्वारा दिए गए हैं। फिर भी, अपनी यात्राओं में मुझे अधिकाधिक ऐसे निराश विश्वासी मिल रहे हैं, पादरी वर्ग और साधारण विश्वासी दोनों, जिन्होंने प्रभु की सेवा करने का अपना आनन्द और उद्देश्य खो दिया है। बहुत से लोग ऐसी सेवकाइयों का बोझ उठाते-उठाते थककर चूर हो गए हैं, जिन्हें उठाने का परमेश्वर ने उनके लिये कभी इरादा ही नहीं किया था।

अध्याय 1 पूरा हुआ

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