अध्याय 32 · 10 मिनट का पठन
प्रार्थना का जीवन
“सदा आनन्दित रहो। निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो। हर बात में धन्यवाद करो।”—1 थिस्सलुनीकियों 5:16,17,18।
हमारे प्रभु ने विधवा और अन्यायी न्यायी का दृष्टान्त हमें यह सिखाने के लिये कहा कि मनुष्यों को सदा प्रार्थना करनी चाहिए और साहस न छोड़ना चाहिए। जैसे विधवा एक ही निश्चित वस्तु को खोजने में लगी रही, वैसे ही यह दृष्टान्त किसी एक आशीष के लिये लगातार प्रार्थना की ओर संकेत करता प्रतीत होता है, जब परमेश्वर विलम्ब करता या इन्कार करता जान पड़ता है। पत्रियों के वे शब्द, जो प्रार्थना में तत्पर बने रहने, प्रार्थना में लगे रहने और उसमें जागते रहने, आत्मा में सदा प्रार्थना करने की बात करते हैं, वे अधिक तो समस्त जीवन के प्रार्थनामय होने की ओर संकेत करते प्रतीत होते हैं। जैसे-जैसे प्राण इस लालसा से भरता जाता है कि परमेश्वर की महिमा हम पर और हम में, हमारे द्वारा और हमारे चारों ओर प्रगट हो, और इस भरोसे से कि वह अपने बालकों की प्रार्थनाएँ सुनता है; वैसे-वैसे प्राण का अन्तरतम जीवन निर्भरता और विश्वास में, लालसामय अभिलाषा और भरोसेमन्द आशा में निरन्तर ऊपर की ओर उठता जाता है।
अपने मनन के अन्त में यह कहना कठिन न होगा कि ऐसा प्रार्थना का जीवन जीने के लिये किस बात की आवश्यकता है। पहली बात निःसन्देह जीवन का परमेश्वर के राज्य और महिमा के लिये सम्पूर्ण बलिदान है। जो निरन्तर प्रार्थना करना इसलिये खोजता है कि वह बहुत भक्त और भला बनना चाहता है, वह उस तक कभी न पहुँचेगा। अपने आप को भूल जाना और अपने आप को परमेश्वर तथा उसके आदर के लिये जीने को सौंप देना ही हृदय को विशाल करता है, हमें सिखाता है कि हर बात को परमेश्वर और उसकी इच्छा के प्रकाश में देखें, और सहज ही अपने चारों ओर हर बात में परमेश्वर की सहायता और आशीष की आवश्यकता को, उसके महिमान्वित होने का एक अवसर पहचान ले। क्योंकि हर बात उस एक ही वस्तु से तौली और परखी जाती है जो हृदय को भरती है—परमेश्वर की महिमा, और क्योंकि प्राण ने यह सीख लिया है कि केवल जो परमेश्वर का है वही सचमुच उसके और उसकी महिमा के लिये हो सकता है, इसलिये समस्त जीवन ऊपर की ओर एक ताकना बन जाता है, अन्तरतम हृदय से एक पुकार, कि परमेश्वर अपना सामर्थ्य और प्रेम प्रमाणित करे और इस प्रकार अपनी महिमा प्रगट करे। विश्वासी इस चेतना के प्रति जाग उठता है कि वह सिय्योन की शहरपनाहों के पहरुओं में से एक है, प्रभु की स्मरण दिलानेवालों में से एक, जिसकी पुकार सचमुच स्वर्ग में राजा को छूकर वह करने को प्रेरित करती है जो अन्यथा न होता। वह समझ जाता है कि पौलुस की यह प्रेरणा कितनी वास्तविक थी, “सब पवित्र लोगों के लिये, और मेरे लिये, हर समय और हर प्रकार से आत्मा में प्रार्थना और बिनती करते रहो,” और “प्रार्थना में लगे रहो, और हमारे लिये भी प्रार्थना करते रहो।” अपने आप को भूल जाना, परमेश्वर और मनुष्यों के बीच उसके राज्य के लिये जीना, यही निरन्तर प्रार्थना करना सीखने का मार्ग है।
परमेश्वर को समर्पित इस जीवन के साथ यह गहरा भरोसा भी होना चाहिए कि हमारी प्रार्थना प्रभावशाली है। हमने देखा है कि हमारे धन्य प्रभु ने अपने प्रार्थना के पाठों में किसी बात पर इतना जोर नहीं दिया जितना पिता में इस विश्वास पर कि वह ऐसा परमेश्वर है जो जो कुछ हम माँगते हैं वह निश्चय ही करता है। “माँगो, तो तुम पाओगे;” भरोसे के साथ उत्तर की आस रखो—यही उसकी शिक्षा का आदि और अन्त है (मत्ती 7:8 और यूहन्ना 16:24 की तुलना करें)। जिस अनुपात में यह आश्वासन हम पर अधिकार कर लेता है, और यह एक ठहरी हुई बात बन जाती है कि हमारी प्रार्थनाओं से सचमुच कुछ होता है और परमेश्वर वही करता है जो हम माँगते हैं, उसी अनुपात में हम इस अद्भुत सामर्थ्य के प्रयोग की उपेक्षा करने का साहस नहीं करते: प्राण पूर्णतः परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है, और हमारा जीवन प्रार्थना बन जाता है। हम देखते हैं कि प्रभु को समय की आवश्यकता है और वह समय लेता है, क्योंकि हम और हमारे चारों ओर सब समय के प्राणी हैं, वृद्धि के नियम के अधीन; परन्तु यह जानते हुए कि विश्वास की एक भी प्रार्थना नष्ट नहीं हो सकती, कि कभी-कभी प्रार्थना को संचित और इकट्ठा किए जाने की आवश्यकता होती है, कि लगातार की गई प्रार्थना अजेय है, प्रार्थना अपने परमेश्वर की उपस्थिति में अभिलाषा और विश्वास के हमारे जीवन का शान्त, दृढ़ जीना बन जाती है। हे, आओ हम अपने तर्क-वितर्कों से जीवित परमेश्वर की ऐसी मुक्त और निश्चित प्रतिज्ञाओं को और अधिक सीमित और निर्बल न करें, उन्हें उनके सामर्थ्य से, और अपने आप को उस अद्भुत भरोसे से वंचित न करें जो जगाने को वे अभिप्रेत हैं। बाधा परमेश्वर में नहीं, उसकी गुप्त इच्छा में नहीं, उसकी प्रतिज्ञाओं की सीमाओं में नहीं, वरन् हम में, स्वयं हम में है; हम वैसे नहीं जैसे प्रतिज्ञा पाने के लिये हमें होना चाहिए। आओ हम अपना सारा हृदय परमेश्वर की प्रतिज्ञा के शब्दों के लिये उनकी सारी सरलता और सत्य में खोल दें: वे हमें टटोलेंगे और नम्र करेंगे; वे हमें ऊपर उठाएँगे और हमें आनन्दित और बलवन्त करेंगे। और उस विश्वास के लिये जो जानता है कि जो वह माँगता है वह पाता है, प्रार्थना कोई काम या बोझ नहीं, वरन् एक आनन्द और एक विजय है; वह एक आवश्यकता और एक दूसरा स्वभाव बन जाती है।
प्रबल अभिलाषा और दृढ़ भरोसे की यह एकता फिर हम में पवित्र आत्मा के जीवन के सिवा और कुछ नहीं है। पवित्र आत्मा हम में वास करता है, हमारी सत्ता की गहराइयों में अपने आप को छिपा लेता है, और अनदेखे और ईश्वरीय के पीछे, स्वयं परमेश्वर के पीछे अभिलाषा को उभारता है। कभी ऐसी आहों में जो कही नहीं जा सकतीं, तो कभी स्पष्ट और सचेत आश्वासन में; कभी अपने पास मसीह के गहरे प्रकाशन के लिये विशेष स्पष्ट विनतियों में, तो कभी किसी प्राण, किसी काम, कलीसिया या संसार के लिये दुहाई में, यह सदा और केवल पवित्र आत्मा ही है जो हृदय को खींचकर परमेश्वर के लिये प्यासा करता है, कि वह जाना और महिमान्वित हो, इसके लिये तरसाता है। जहाँ परमेश्वर की सन्तान सचमुच आत्मा में जीती और चलती है, जहाँ वह शारीरिक बने रहने से सन्तुष्ट नहीं, वरन् आत्मिक होने का यत्न करती है, हर बात में ईश्वरीय आत्मा के लिये एक योग्य साधन कि वह मसीह के जीवन और स्वयं मसीह को प्रगट करे, वहाँ धन्य पुत्र का वह कभी न रुकनेवाला मध्यस्थता का जीवन हमारे अनुभव में प्रगट हुए और दोहराए बिना नहीं रह सकता। क्योंकि यह मसीह का आत्मा है जो हम में प्रार्थना करता है, इसलिये हमारी प्रार्थना अवश्य सुनी जाएगी; क्योंकि यह हम हैं जो आत्मा में प्रार्थना करते हैं, इसलिये समय, और धैर्य, और प्रार्थना को निरन्तर दोहराते रहने की आवश्यकता है, जब तक हर बाधा जीत न ली जाए, और परमेश्वर के आत्मा तथा हमारे बीच का मेल सिद्ध न हो जाए।
परन्तु ऐसे निरन्तर प्रार्थना के जीवन के लिये हमें जिस मुख्य बात की आवश्यकता है, वह यह जानना है कि यीशु हमें प्रार्थना करना सिखाता है। हम कुछ-कुछ समझने लगे हैं कि उसकी शिक्षा क्या है। न तो नये विचारों या दृष्टिकोणों का सिखाया जाना, न किसी चूक या भूल का पता चलना, न अभिलाषा और विश्वास का उभारा जाना, चाहे यह सब कितने ही महत्त्व का क्यों न हो, वरन् हमें पिता के सामने अपने ही प्रार्थना-जीवन की संगति में उठा लेना—यीशु सचमुच इसी के द्वारा सिखाता है। यह प्रार्थना करते यीशु का दर्शन ही था जिसने चेलों में यह लालसा और यह विनती जगाई कि उन्हें प्रार्थना करना सिखाया जाए। यह उस सदा प्रार्थना करते यीशु में विश्वास ही है, जिसके पास ही प्रार्थना करने का सामर्थ्य है, जो हमें सचमुच प्रार्थना करना सिखाता है। हम जानते हैं क्यों: जो प्रार्थना करता है वह हमारा सिर और हमारा जीवन है। जो कुछ उसके पास है वह सब हमारा है और हमें दिया जाता है जब हम अपने आप को पूरी तरह उसे दे देते हैं। अपने लहू के द्वारा वह हमें सीधे परमेश्वर की उपस्थिति में ले चलता है। भीतरी पवित्रस्थान हमारा घर है, हम वहीं वास करते हैं। और जो परमेश्वर के इतने निकट जीता है, और जानता है कि उसे उन्हें आशीष देने के लिये निकट लाया गया है जो दूर हैं, वह प्रार्थना किए बिना रह ही नहीं सकता। मसीह हमें अपने प्रार्थना-सामर्थ्य और प्रार्थना-जीवन का अपने साथ भागी बनाता है। तब हम समझते हैं कि हमारा सच्चा लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि बहुत काम करें और इतनी प्रार्थना करें कि काम ठीक बना रहे, वरन् यह कि बहुत प्रार्थना करें और फिर इतना काम करें कि प्रार्थना में प्राप्त सामर्थ्य और आशीष हमारे द्वारा मनुष्यों तक पहुँच पाए। यह मसीह ही है जो प्रार्थना करने को सर्वदा जीवित है, जो बचाता और राज्य करता है। वह अपना प्रार्थना-जीवन हम में संचारित करता है: यदि हम उस पर भरोसा रखें तो वह उसे हम में बनाए रखता है। वह हमारे निरन्तर प्रार्थना करने का जमानतदार है। हाँ, मसीह प्रार्थना करना सिखाता है, यह दिखाकर कि वह उसे कैसे करता है, हम में उसे करके, हमें उसमें और उसके समान उसे करने की ओर ले चलकर। मसीह ही सब कुछ है, कभी न रुकनेवाले प्रार्थना-जीवन के लिये जीवन और बल भी।
यही, इस बात का दर्शन, इस सदा प्रार्थना करते मसीह का हमारे जीवन के रूप में दर्शन ही, हमें निरन्तर प्रार्थना करने के योग्य बनाता है। क्योंकि उसका याजकपन एक अनन्त जीवन का सामर्थ्य है, वह पुनरुत्थान का जीवन जो कभी नहीं मुरझाता और कभी नहीं चुकता, और क्योंकि उसका जीवन ही हमारा जीवन है, इसलिये निरन्तर प्रार्थना करना हमारे लिये स्वर्ग के जीवन-आनन्द से कम कुछ नहीं बन सकता। इसलिये प्रेरित कहता है: “सदा आनन्दित रहो; निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो; हर बात में धन्यवाद करो।” कभी न रुकनेवाले आनन्द और कभी न रुकनेवाली स्तुति के बीच थमी हुई, कभी न रुकनेवाली प्रार्थना उस अनन्त जीवन के सामर्थ्य का प्रकटीकरण है, जहाँ यीशु सदा प्रार्थना करता है। दाखलता और डाली के बीच की एकता सचमुच एक प्रार्थना-एकता है। मसीह के सबसे ऊँचे अनुरूप होना, उसके स्वर्गीय जीवन की महिमा में सबसे धन्य सहभागिता, यही है कि हम उसके मध्यस्थता के कार्य में भाग लें: वह और हम प्रार्थना करने को सदा जीते हैं। उसके साथ अपनी एकता के अनुभव में, निरन्तर प्रार्थना करना एक सम्भावना, एक वास्तविकता बन जाता है, परमेश्वर के साथ हमारी पवित्र और धन्य संगति का सबसे पवित्र और सबसे धन्य अंश। हमारा निवास परदे के भीतर, पिता की उपस्थिति में है। जो पिता कहता है, वह हम करते हैं; जो पुत्र कहता है, वह पिता करता है। निरन्तर प्रार्थना करना स्वर्ग के हम पर उतर आने का पृथ्वी पर का प्रकटीकरण है, उस जीवन की पूर्व-रसास्वादना जहाँ वे उपासना और आराधना के गीत में न दिन विश्राम करते हैं न रात।
“हे प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखा।”
हे मेरे पिता, अपने सारे हृदय से मैं इस अद्भुत जीवन के लिये तेरी स्तुति करता हूँ, कभी न रुकनेवाली प्रार्थना, कभी न रुकनेवाली संगति, कभी न रुकनेवाले उत्तरों, और उसके साथ अपनी एकता के कभी न रुकनेवाले अनुभव के लिये जो प्रार्थना करने को सर्वदा जीवित है। हे मेरे परमेश्वर! मुझे सदा तेरी महिमा की उपस्थिति में ऐसा वास और ऐसा चलना दे, कि प्रार्थना तेरे साथ मेरे जीवन की सहज अभिव्यक्ति हो।
हे धन्य उद्धारकर्ता! अपने सारे हृदय से मैं तेरी स्तुति करता हूँ कि तू स्वर्ग से आया कि मेरी आवश्यकताओं और पुकारों में मेरा भागी हो, ताकि मैं तेरी सर्व-प्रबल मध्यस्थता में तेरा भागी होऊँ। और मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि तू ने मुझे प्रार्थना की पाठशाला में ले लिया है, कि उस जीवन की धन्यता और सामर्थ्य सिखाए जो पूरा प्रार्थना है। और सबसे बढ़कर, कि तू ने मुझे अपनी मध्यस्थता के जीवन की संगति में उठा लिया है, कि मेरे द्वारा भी तेरी आशीषें मेरे चारों ओर के लोगों को बाँटी जाएँ।
हे पवित्र आत्मा! गहरी श्रद्धा के साथ मैं तेरे इस काम के लिये तेरा धन्यवाद करता हूँ जो तू मुझ में करता है। यह तेरे ही द्वारा है कि मैं पुत्र और पिता के बीच के व्यवहार में एक हिस्से तक ऊपर उठाया जाता हूँ, और इस प्रकार पवित्र त्रित्व के जीवन और प्रेम की संगति में प्रवेश करता हूँ। हे परमेश्वर के आत्मा! मुझ में अपना काम सिद्ध कर; मुझे मसीह मेरे मध्यस्थ के साथ पूर्ण एकता में ले आ। तेरा अनवरत भीतर वास मेरे जीवन को अनवरत मध्यस्थता का जीवन बना दे। और मेरा जीवन ऐसा बन जाए जो अनवरत रूप से पिता की महिमा और मेरे चारों ओर के लोगों की आशीष के लिये हो। आमीन।
अध्याय 32 पूरा हुआ
प्रार्थना का जीवन