प्रार्थना की पाठशाला में मसीह के साथ
प्रार्थना में हमारा हियाव

अध्याय 30 · 16 मिनट का पठन

प्रार्थना में हमारा हियाव

“और उसके सामने हमारा जो हियाव है, वह यह है, कि यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगें, तो वह हमारी सुनता है। और जब हम जानते हैं कि जो कुछ हम माँगते हैं वह हमारी सुनता है, तो जो कुछ हम माँगते हैं, हम यह भी जानते हैं कि हमने वे बिनतियाँ पा ली हैं जो हमने उससे माँगी थीं।”—1 यूहन्ना 5:14-15।

विश्वासयुक्त प्रार्थना में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बहुतों के साथ निःसन्देह यही है: वे नहीं जानते कि जो वे माँगते हैं वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है या नहीं। जब तक वे इस विषय में सन्देह में हैं, तब तक उनमें इस आश्वासन के साथ माँगने का हियाव नहीं हो सकता कि वे निश्चय ही पाएँगे। और वे शीघ्र ही यह सोचने लगते हैं कि, यदि एक बार उन्होंने अपनी विनतियाँ बता दीं, और कोई उत्तर न मिले, तो सबसे अच्छा यही है कि इसे परमेश्वर पर छोड़ दें कि वह अपनी भली इच्छा के अनुसार करे। यूहन्ना के शब्द, “यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगें, तो वह हमारी सुनता है,” जैसा वे उन्हें समझते हैं, प्रार्थना के उत्तर के विषय में निश्चय को असम्भव बना देते हैं, क्योंकि वे इस विषय में निश्चित नहीं हो सकते कि वास्तव में परमेश्वर की इच्छा क्या हो सकती है। वे परमेश्वर की इच्छा को उसकी गुप्त मन्त्रणा मानकर सोचते हैं—मनुष्य कैसे यह थाह पा सकेगा कि सर्व-बुद्धिमान परमेश्वर का प्रयोजन वास्तव में क्या हो सकता है।

यह ठीक उसके विपरीत है जो यूहन्ना का इस प्रकार लिखने में लक्ष्य था। वह हमें हियाव के लिये, भरोसे के लिये, प्रार्थना में विश्वास के पूर्ण आश्वासन के लिये जगाना चाहता था। वह कहता है, “उसके सामने हमारा जो हियाव है, वह यह है,” कि हम कह सकते हैं: हे पिता! तू जानता है और मैं जानता हूँ कि मैं तेरी इच्छा के अनुसार माँगता हूँ: मैं जानता हूँ कि तू मेरी सुनता है। “हमारा हियाव यह है, कि यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगें, तो वह हमारी सुनता है।” इसी कारण वह तुरन्त जोड़ता है: “और जब हम जानते हैं कि जो कुछ हम माँगते हैं वह हमारी सुनता है, तो हम इस विश्वास के द्वारा यह जानते हैं कि हमने पा लिया है,” कि हम अब प्रार्थना करते ही उस “बिनती,” उन विशेष वस्तुओं को “पा लेते हैं जो हमने उससे माँगी थीं।” यूहन्ना मानकर चलता है कि जब हम प्रार्थना करें, तो हम पहले यह जान लें कि हमारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हैं या नहीं। वे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हो सकती हैं, और फिर भी तुरन्त न आएँ, या विश्वास की धीरजपूर्ण प्रार्थना के बिना न आएँ। हमें इस प्रकार धीरज धरने और विश्वास में बलवन्त होने का साहस देने के लिये ही, वह हमें बताता है: यह हमें प्रार्थना में हियाव या भरोसा देता है, कि यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगें, तो वह हमारी सुनता है। यह स्पष्ट है कि यदि हमारे लिये यह अनिश्चितता का विषय हो कि हमारी विनतियाँ उसकी इच्छा के अनुसार हैं या नहीं, तो हमें उस बात की सान्त्वना नहीं मिल सकती जो वह कहता है, “हम जानते हैं कि हमने वे बिनतियाँ पा ली हैं जो हमने उससे माँगी थीं।”

परन्तु ठीक यही कठिनाई है। एक से अधिक विश्वासी कहते हैं: “मैं नहीं जानता कि जो मैं चाहता हूँ वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है या नहीं। परमेश्वर की इच्छा उसकी अनन्त बुद्धि का प्रयोजन है: मेरे लिये यह जानना असम्भव है कि कहीं वह मेरे लिये किसी और वस्तु को उससे अच्छा तो नहीं समझता जो मैं चाहता हूँ, या जो मैं माँगता हूँ उसे रोक रखने के उसके पास कोई कारण तो नहीं।” हर कोई अनुभव करता है कि ऐसे विचारों के साथ विश्वास की वह प्रार्थना, जिसके विषय में यीशु ने कहा, “जो कोई विश्वास करेगा कि जो बातें वह कहता है वे हो जाएँगी, तो उसके लिये जो कुछ वह कहे वही हो जाएगा,” असम्भव बन जाती है। समर्पण की प्रार्थना, और परमेश्वर की बुद्धि में भरोसे की प्रार्थना तो हो सकती है; विश्वास की प्रार्थना नहीं हो सकती। यहाँ बड़ी भूल यह है कि परमेश्वर की सन्तान सचमुच यह विश्वास नहीं करती कि परमेश्वर की इच्छा जानना सम्भव है। या यदि वे यह विश्वास करते भी हैं, तो वे उसे जान लेने के लिये समय और परिश्रम नहीं लगाते। हमें जिस बात की आवश्यकता है वह यह स्पष्ट देखना है कि पिता किस रीति से अपनी बाट जोहती, सिखाई जाने योग्य सन्तान को इस जानने की ओर ले चलता है कि उसकी विनती उसकी इच्छा के अनुसार है। यह परमेश्वर के पवित्र वचन के द्वारा है, जो हृदय, जीवन, इच्छा में ग्रहण किया और रखा जाए; और परमेश्वर के पवित्र आत्मा के द्वारा, जो उसके भीतर वास करने और अगुवाई में स्वीकार किया जाए, कि हम यह जानना सीखेंगे कि हमारी विनतियाँ उसकी इच्छा के अनुसार हैं।

वचन के द्वारा। परमेश्वर की एक गुप्त इच्छा है, जिसके विषय में हम प्रायः डरते हैं कि हमारी प्रार्थनाएँ कहीं उसके विरुद्ध न हों। प्रार्थना में हमारा वास्ता परमेश्वर की इस इच्छा से नहीं, वरन् उसकी उस इच्छा से है जो उसके वचन में प्रगट है। हमारी यह धारणाएँ कि गुप्त इच्छा ने क्या ठान रखा होगा, और वह कैसे हमारी प्रार्थनाओं के उत्तरों को असम्भव बना सकती है, अधिकतर बहुत ही भ्रान्त होती हैं। बालक के समान विश्वास, कि वह अपने बालकों के लिये क्या करने को तैयार है, बस पिता के इस आश्वासन को थामे रहता है, कि प्रार्थना सुनना और वह करना जो उसके वचन में विश्वास चाहता और ग्रहण करता है, उसकी इच्छा है। वचन में पिता ने सामान्य प्रतिज्ञाओं के रूप में अपने लोगों के साथ अपनी इच्छा के महान सिद्धान्त प्रगट किए हैं। बालक को उस प्रतिज्ञा को लेकर अपने जीवन की उन विशेष परिस्थितियों पर लागू करना है जिनसे उसका सम्बन्ध है। उस प्रगट की गई इच्छा की सीमाओं के भीतर वह जो कुछ माँगता है, उसे वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार जान सकता है, और वह भरोसे के साथ उसकी आशा कर सकता है। अपने वचन में, परमेश्वर ने हमारे साथ, अपने लोगों के साथ, और संसार के साथ अपनी इच्छा और योजनाओं का प्रकाशन हमें दिया है, अनुग्रह और सामर्थ्य की सबसे बहुमूल्य प्रतिज्ञाओं के साथ जिनके द्वारा वह अपने लोगों के माध्यम से अपनी योजनाओं को पूरा करेगा और अपना काम करेगा। जैसे-जैसे विश्वास इतना बलवन्त और साहसी हो जाता है कि सामान्य प्रतिज्ञा की पूर्ति का दावा विशेष अवसर में करे, वैसे-वैसे हमें यह आश्वासन हो सकता है कि हमारी प्रार्थनाएँ सुनी गई हैं: वे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हैं। हमारे मूल-पाठ के आगेवाले पद में यूहन्ना के शब्दों को एक दृष्टान्त के रूप में लें: “यदि कोई अपने भाई को ऐसा पाप करते देखे जो मृत्यु का न हो, तो वह माँगे और परमेश्वर उसे जीवन देगा।” ऐसी है वह सामान्य प्रतिज्ञा; और वह विश्वासी जो इस प्रतिज्ञा के आधार पर दुहाई देता है, परमेश्वर की इच्छा के अनुसार प्रार्थना करता है, और यूहन्ना उसे यह जानने का हियाव देगा कि जो वह माँगता है वह बिनती उसे मिल गई है।

परन्तु परमेश्वर की इच्छा की यह समझ कोई आत्मिक वस्तु है, और आत्मिक रीति से ही परखी जानी चाहिए। यह तर्क के विषय के रूप में नहीं कि हम इसे तर्क से सिद्ध कर सकें: परमेश्वर ने यह कहा है; अतः मुझे यह मिलना ही चाहिए। और न ही हर मसीही का एक ही वरदान या बुलावा है। यद्यपि प्रतिज्ञा में प्रगट की गई सामान्य इच्छा सब के लिये एक ही है, तौभी हर एक के लिये परमेश्वर के प्रयोजन के अनुसार एक विशेष भिन्न इच्छा है। और पवित्र लोगों की बुद्धि इसी में है, कि हम में से हर एक के लिये परमेश्वर की इस विशेष इच्छा को, हमें दिए गए अनुग्रह के माप के अनुसार जानें, और इस प्रकार प्रार्थना में ठीक वही माँगें जो परमेश्वर ने हर एक के लिये तैयार किया और सम्भव बनाया है। पवित्र आत्मा हम में इसी बुद्धि को संचारित करने के लिये वास करता है। वचन की सामान्य प्रतिज्ञाओं को हमारी विशेष व्यक्तिगत आवश्यकताओं पर व्यक्तिगत रूप से लागू करना—पवित्र आत्मा की अगुवाई हमें इसी के लिये दी गई है।

वचन और आत्मा की शिक्षा की इसी एकता को बहुत से लोग नहीं समझते, और इसलिये यह जानने में दुहरी कठिनाई है कि परमेश्वर की इच्छा क्या हो सकती है। कुछ लोग परमेश्वर की इच्छा को किसी भीतरी अनुभूति या दृढ़ विश्वास में खोजते हैं, और चाहते हैं कि आत्मा उन्हें वचन के बिना अगुवाई करे। दूसरे उसे वचन में खोजते हैं, पवित्र आत्मा की जीवित अगुवाई के बिना। इन दोनों को एक होना चाहिए: केवल वचन में, केवल आत्मा में, परन्तु इनमें बड़े निश्चय से, हम परमेश्वर की इच्छा जान सकते हैं, और उसके अनुसार प्रार्थना करना सीख सकते हैं। हृदय में वचन और आत्मा को मिलना चाहिए: केवल भीतर वास करने के द्वारा ही हम उनकी शिक्षा का अनुभव कर सकते हैं। वचन को हम में वास करना, बना रहना चाहिए: हृदय और जीवन को दिन-प्रतिदिन उसके प्रभाव के अधीन रहना चाहिए। बाहर से नहीं, वरन् भीतर से, आत्मा के द्वारा वचन का जीवन आता है। केवल वही जो अपने आप को अपने सारे जीवन में पूर्णतः वचन और परमेश्वर की इच्छा की सर्वोच्चता को सौंप देता है, वही विशेष अवसरों में यह पहचानने की आशा कर सकता है कि वह वचन और इच्छा उसे साहस से क्या माँगने की अनुमति देते हैं। और जैसे वचन के साथ, ठीक वैसे ही आत्मा के साथ भी: यदि मैं चाहूँ कि प्रार्थना में आत्मा की अगुवाई मुझे आश्वस्त करे कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, तो मेरा सारा जीवन उस अगुवाई को सौंपा हुआ होना चाहिए; केवल तभी मन और हृदय आत्मिक और परमेश्वर की पवित्र इच्छा जानने के योग्य बन सकते हैं। वही जो, वचन और आत्मा के द्वारा, परमेश्वर की इच्छा में जीता है, उसे करने के द्वारा, वही उस इच्छा के अनुसार इस भरोसे में प्रार्थना करना जानेगा कि वह हमारी सुनता है।

काश मसीही यह देख पाते कि वे इस विचार से अपनी कितनी अनगिनत हानि करते हैं कि क्योंकि सम्भवतः उनकी प्रार्थना परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं है, इसलिये उन्हें बिना उत्तर के ही सन्तुष्ट रहना होगा। परमेश्वर का वचन हमें बताता है कि अनुत्तरित प्रार्थना का बड़ा कारण यह है कि हम ठीक रीति से प्रार्थना नहीं करते: “तुम माँगते हो और पाते नहीं, क्योंकि बुरी रीति से माँगते हो।” उत्तर न देकर, पिता हमें बताता है कि हमारी प्रार्थना में कुछ गड़बड़ है। वह हमें सिखाना चाहता है कि हम उसे ढूँढ़ निकालें और उसका अंगीकार करें, और इस प्रकार हमें सच्ची विश्वासयुक्त और प्रबल प्रार्थना के लिये शिक्षित करे। वह अपने उद्देश्य को केवल तभी प्राप्त कर सकता है जब वह हमें यह देखने पर ले आए कि उत्तर के रोके जाने के दोषी हम हैं; हमारा लक्ष्य, या हमारा विश्वास, या हमारा जीवन वैसा नहीं जैसा होना चाहिए। परन्तु परमेश्वर का यह उद्देश्य तब तक विफल होता रहता है जब तक हम यह कहने से सन्तुष्ट रहते हैं: शायद इसलिये कि मेरी प्रार्थना उसकी इच्छा के अनुसार नहीं है, वह मेरी नहीं सुनता। हे, आओ हम अपनी अनुत्तरित प्रार्थनाओं का दोष अब और परमेश्वर की गुप्त इच्छा पर न डालें, वरन् अपनी बुरी रीति से माँगने पर। वह वचन, “तुम पाते नहीं क्योंकि बुरी रीति से माँगते हो,” प्रभु के दीपक के समान हो, जो हृदय और जीवन को टटोलकर यह सिद्ध करे कि हम सचमुच वैसे ही हैं जैसों को मसीह ने निश्चित उत्तरों की अपनी प्रतिज्ञाएँ दीं। आओ हम विश्वास करें कि हम जान सकते हैं कि हमारी प्रार्थना परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है या नहीं। आओ हम अपना हृदय सौंप दें कि पिता का वचन उसमें बहुतायत से वास करे, कि मसीह का वचन हम में बना रहे। आओ हम दिन-प्रतिदिन उस अभिषेक के साथ जीएँ जो हमें सब बातें सिखाता है। आओ हम अपने आप को बिना किसी आरक्षण के पवित्र आत्मा को सौंप दें, जैसे वह हमें मसीह में बने रहना, पिता की उपस्थिति में वास करना सिखाता है, और हम शीघ्र ही समझ जाएँगे कि पिता का प्रेम कैसे लालायित है कि बालक उसकी इच्छा जाने, और इस भरोसे में कि उस इच्छा में वह सब समाया है जो उसके सामर्थ्य और प्रेम ने करने की प्रतिज्ञा की है, यह भी जाने कि वह उन विनतियों को सुनता है जो हम उससे माँगते हैं। “हमारा जो हियाव है, वह यह है, कि यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगें, तो वह हमारी सुनता है।”

“हे प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखा।”

हे धन्य स्वामी! अपने सारे हृदय से मैं इस धन्य पाठ के लिये तेरा धन्यवाद करता हूँ, कि प्रार्थना के उत्तरों से भरे जीवन का मार्ग परमेश्वर की इच्छा के बीच से होकर जाता है। हे प्रभु! मुझे इस धन्य इच्छा को उसमें जीने, उससे प्रेम करने, और सदा उसे करने के द्वारा जानना सिखा। तब मैं उस इच्छा के अनुसार प्रार्थनाएँ चढ़ाना सीखूँगा, और परमेश्वर की धन्य इच्छा के साथ उनके मेल में, प्रार्थना में अपना हियाव और उत्तर स्वीकार करने में अपना भरोसा पाऊँगा।

हे पिता! यह तेरी इच्छा है कि तेरा बालक तेरी उपस्थिति और आशीष का आनन्द भोगे। यह तेरी इच्छा है कि तेरे बालक के जीवन में सब कुछ तेरी इच्छा के अनुसार हो, और पवित्र आत्मा यह उसमें कार्य करे। यह तेरी इच्छा है कि तेरा बालक प्रार्थना के स्पष्ट उत्तरों के प्रतिदिन के अनुभव में जीए, ताकि वह तेरे साथ जीवित और सीधी संगति का आनन्द भोगे। यह तेरी इच्छा है कि तेरे नाम की महिमा तेरे बालकों में और उनके द्वारा हो, और जो तुझ पर भरोसा रखते हैं उनमें यह होगी। हे मेरे पिता! तेरी यह इच्छा ही जो कुछ मैं माँगता हूँ उस सब में मेरा भरोसा हो।

हे धन्य उद्धारकर्ता! मुझे इस इच्छा की महिमा में विश्वास करना सिखा। वह इच्छा वह अनन्त प्रेम है, जो ईश्वरीय सामर्थ्य के साथ हर उस मानवी इच्छा में अपना प्रयोजन पूरा करता है जो अपने आप को उसे सौंप देती है। हे प्रभु! मुझे यह सिखा। तू मुझे यह देख सकने योग्य बना सकता है कि वचन की हर प्रतिज्ञा और हर आज्ञा सचमुच परमेश्वर की इच्छा है, और उसकी पूर्ति स्वयं परमेश्वर के द्वारा मेरे लिये सुनिश्चित की गई है। इस प्रकार परमेश्वर की इच्छा मेरे लिये वह दृढ़ चट्टान बन जाए जिस पर मेरी प्रार्थना और उत्तर का मेरा आश्वासन सदा टिका रहे। आमीन।

टिप्पणी।

परमेश्वर की इच्छा के विषय में प्रायः बड़ा भ्रम रहता है। लोग सोचते हैं कि जो परमेश्वर चाहता है वह अनिवार्य रूप से होना ही चाहिए। यह किसी भी रीति से ऐसा नहीं है। परमेश्वर अपने लोगों के लिये बहुत सी आशीष चाहता है, जो उन तक कभी नहीं पहुँचती। वह उसे बड़ी उत्कटता से चाहता है, परन्तु वे उसे नहीं चाहते, और वह उन तक नहीं आ सकती। स्वतन्त्र इच्छा के साथ मनुष्य की सृष्टि का, और छुटकारे में उसकी इच्छा के नवीनीकरण का यही बड़ा भेद है, कि परमेश्वर ने बहुत सी बातों में अपनी इच्छा के क्रियान्वयन को मनुष्य की इच्छा पर निर्भर कर दिया है। परमेश्वर की उस इच्छा में से, जो उसकी प्रतिज्ञाओं में प्रगट है, उतना ही पूरा होगा जितना हमारा विश्वास ग्रहण करता है। प्रार्थना वह सामर्थ्य है जिसके द्वारा वह होता है जो अन्यथा न होता। और विश्वास वह सामर्थ्य है जिसके द्वारा यह निर्णय होता है कि परमेश्वर की इच्छा का कितना अंश हम में पूरा किया जाएगा। जब एक बार परमेश्वर किसी प्राण पर प्रगट कर देता है कि वह उसके लिये क्या करने को तैयार है, तब उस इच्छा के क्रियान्वयन का उत्तरदायित्व हम पर आ पड़ता है।

कुछ लोग डरते हैं कि यह मनुष्य के हाथों में बहुत अधिक सामर्थ्य दे देना है। परन्तु मसीह यीशु में सारा सामर्थ्य मनुष्य के हाथों में दे दिया गया है। सारी प्रार्थना और सारे सामर्थ्य की कुंजी उसी की है, और जब हम यह समझना सीख जाते हैं कि वह जितना पिता के साथ है उतना ही हमारे साथ भी है, और कि हम भी उसके साथ उतने ही एक हैं जितना वह पिता के साथ है, तब हम देखेंगे कि यह कितना स्वाभाविक और उचित और सुरक्षित है कि जो उसमें बने रहते हैं जैसे वह पिता में, उन्हें ऐसा सामर्थ्य दिया जाए। यह मसीह पुत्र है जिसे यह अधिकार है कि जो चाहे माँगे: उसमें बने रहने और उसके हम में बने रहने के द्वारा ही (एक ऐसी ईश्वरीय वास्तविकता में जिसकी हमें बहुत कम समझ है) उसका आत्मा हम में वह साँस लेता है जो वह हमारे द्वारा माँगना और प्राप्त करना चाहता है। हम उसके नाम से प्रार्थना करते हैं: वे प्रार्थनाएँ सचमुच हमारी हैं और उतनी ही सचमुच उसकी।

फिर दूसरे डरते हैं कि यह विश्वास करना कि प्रार्थना में ऐसा सामर्थ्य है, परमेश्वर की स्वतन्त्रता और प्रेम को सीमित करना है। हे, यदि हम केवल जानते कि हम उसे उसी एकमात्र रीति से कार्य करने न देकर उसकी स्वतन्त्रता और उसके प्रेम को कैसे सीमित कर रहे हैं जिस रीति से वह कार्य करना चुनता है, अब जबकि उसने हमें अपने साथ संगति में उठा लिया है—हमारी प्रार्थनाओं और हमारे विश्वास के द्वारा। एक भाई ने, जो सेवकाई में था, एक बार पूछा, जब हम इस विषय पर बात कर रहे थे, कि क्या यह सोचने का कोई खतरा नहीं कि प्राणों के प्रति हमारा प्रेम और उन्हें आशीषित देखने की हमारी इच्छा परमेश्वर के प्रेम और उन्हें आशीष देने की परमेश्वर की इच्छा को हिला देगी। हम अभी कुछ बड़े पानी के पाइपों के पास से गुजर रहे थे, जिनके द्वारा पानी एक बड़ी पहाड़ी धारा से पहाड़ और घाटी के ऊपर से होकर कुछ दूरी पर बसे एक नगर को पहुँचाया जा रहा था। इन पाइपों को बस देखो, यह उत्तर था; इन्होंने पानी को पहाड़ियों से नीचे बहने को तैयार नहीं किया, न ही इन्होंने उसे आशीष और तरावट का उसका सामर्थ्य दिया: यह तो उसका अपना स्वभाव ही है। ये केवल इतना ही कर सके कि उसकी दिशा निश्चित करें: इसके द्वारा नगर के निवासियों ने कहा कि वे आशीष वहाँ चाहते हैं। और ठीक इसी प्रकार, प्रेम करना और आशीष देना परमेश्वर का अपना स्वभाव ही है। नीचे और सदा नीचे उसका प्रेम अपनी जीवनदायी और तरोताज़ा करनेवाली धाराओं के साथ आने को लालायित है। परन्तु उसने यह प्रार्थना पर छोड़ दिया है कि वह कहे कि आशीष कहाँ आनी है। उसने यह अपने विश्वास करनेवाले लोगों को सौंपा है कि वे जीवन का जल उजाड़ स्थानों तक लाएँ: आशीष देने की परमेश्वर की इच्छा मनुष्य की इच्छा पर निर्भर है कि वह कहे कि आशीष कहाँ उतरनी चाहिए। “उसके पवित्र लोगों को ऐसा ही आदर प्राप्त है।” “और उसके सामने हमारा जो हियाव है, वह यह है, कि यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगें, तो वह हमारी सुनता है। और यदि हम जानते हैं कि जो कुछ हम माँगते हैं वह हमारी सुनता है, तो हम यह भी जानते हैं कि हमने वे बिनतियाँ पा ली हैं जो हमने उससे माँगी थीं।”

1इसका दृष्टान्त इस पुस्तक के अन्त में जॉर्ज म्यूलर के उद्धरणों में देखें।

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