प्रार्थना की पाठशाला में मसीह के साथ
वचन और प्रार्थना

अध्याय 23 · 11 मिनट का पठन

वचन और प्रार्थना

“यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें, तो जो चाहो माँगो, और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।”—यूहन्ना 15:7।

वचन और प्रार्थना के बीच का जीवनदायी सम्बन्ध मसीही जीवन के सबसे सरल और सबसे आरम्भिक पाठों में से एक है। जैसा उस नये मन-फिराए अन्यजाति के व्यक्ति ने कहा था: मैं प्रार्थना करता हूँ—मैं अपने पिता से बात करता हूँ; मैं पढ़ता हूँ—मेरा पिता मुझ से बात करता है। प्रार्थना से पहले, परमेश्वर का वचन ही मुझे उसके लिये तैयार करता है, यह प्रगट करके कि पिता ने मुझे क्या माँगने को कहा है। प्रार्थना में, परमेश्वर का वचन ही मुझे बल देता है, मेरे विश्वास को उसका आधार और उसकी दलील देकर। और प्रार्थना के बाद, परमेश्वर का वचन ही मुझे उत्तर लाकर देता है जब मैं ने प्रार्थना कर ली हो, क्योंकि उसी में आत्मा मुझे पिता का शब्द सुनने देता है। प्रार्थना एकालाप नहीं वरन् संवाद है; उसका सबसे मुख्य अंश मेरी वाणी के उत्तर में परमेश्वर की वाणी है। परमेश्वर की वाणी को सुनना ही इस आश्वासन का रहस्य है कि वह मेरी सुनेगा। “अपना कान लगा, और सुन;” “मेरी ओर कान लगा;” “मेरी वाणी सुन;” ये ऐसे शब्द हैं जो परमेश्वर मनुष्य से कहता है, और मनुष्य भी परमेश्वर से। उसका सुनना हमारे सुनने पर निर्भर करेगा; उसके शब्द जितना प्रवेश मुझ में पाते हैं, वही उसके सम्मुख मेरे शब्दों के सामर्थ्य का माप होगा। परमेश्वर के शब्द मेरे लिये क्या हैं, यही इस बात की परख है कि वह स्वयं मेरे लिये क्या है, और इस प्रकार प्रार्थना में उसकी खोज की मेरी अभिलाषा की सच्चाई की भी परख है।

यही वचन और हमारी प्रार्थना के बीच का सम्बन्ध है जिसकी ओर यीशु संकेत करते हैं जब वे कहते हैं, “यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें, तो जो चाहो माँगो, और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।” इस सत्य का गहरा महत्त्व तब स्पष्ट होता है जब हम उस दूसरी अभिव्यक्ति पर ध्यान देते हैं जिसका स्थान इस ने लिया है। एक से अधिक बार यीशु ने कहा था, “मुझ में बने रहो, और मैं तुम में।” उनका हम में बना रहना हमारे उन में बने रहने की पूर्ति और मुकुट था। परन्तु यहाँ, “तुम मुझ में और मैं तुम में” कहने के बदले, वे कहते हैं, “तुम मुझ में और मेरी बातें तुम में।” उनकी बातों का बना रहना उनके स्वयं के बने रहने के तुल्य है।

यहाँ हमारे सामने कैसा दृश्य खुलता है कि परमेश्वर की बातों को, जो मसीह में हैं, हमारे आत्मिक जीवन में और विशेषकर हमारी प्रार्थना में क्या स्थान पाना है। मनुष्य अपने शब्दों में अपने आप को प्रगट करता है। अपनी प्रतिज्ञाओं में वह अपने आप को दे देता है, वह अपने आप को उसके प्रति बाँध लेता है जो उसकी प्रतिज्ञा ग्रहण करता है। अपनी आज्ञाओं में वह अपनी इच्छा प्रकट करता है, और चाहता है कि अपने आप को उसका स्वामी बना ले जिसकी आज्ञाकारिता का वह दावा करता है, ताकि उसे ऐसे चलाए और काम में लाए मानो वह उसी का एक भाग हो। हमारे शब्दों के द्वारा ही आत्मा आत्मा के साथ संगति रखती है, कि एक मनुष्य की आत्मा दूसरे में जाकर अपने आप को हस्तान्तरित कर देती है। मनुष्य के शब्दों के द्वारा ही, जो सुने और ग्रहण किए और थामे और माने जाएँ, वह अपने आप को दूसरे को दे सकता है। परन्तु यह सब एक बहुत ही सापेक्ष और सीमित अर्थ में।

परन्तु जब परमेश्वर, वह अनन्त सत्ता, जिसमें सब कुछ जीवन और सामर्थ्य, आत्मा और सत्य है, इन शब्दों के सबसे गहरे अर्थ में,—जब परमेश्वर अपने शब्दों में अपने आप को कह देता है, तब वह सचमुच अपने आप को दे देता है, अपना प्रेम और अपना जीवन, अपनी इच्छा और अपना सामर्थ्य, उन्हें जो इन शब्दों को ग्रहण करते हैं, ऐसी वास्तविकता में जो समझ से परे है। हर एक प्रतिज्ञा में वह अपने आप को हमारे वश में कर देता है कि हम उसे थामें और अधिकार में लें; हर एक आज्ञा में वह अपने आप को हमारे वश में कर देता है कि हम उसके साथ उसकी इच्छा, उसकी पवित्रता, उसकी सिद्धता में भागी हों। परमेश्वर के वचन में परमेश्वर हमें अपने आप को देता है; उसका वचन अनन्त पुत्र, मसीह यीशु से कम कुछ नहीं है। और इसलिये मसीह की सारी बातें परमेश्वर की बातें हैं, जो ईश्वरीय जिलानेवाले जीवन और सामर्थ्य से भरी हुई हैं। “जो बातें मैं ने तुम से कहीं हैं, वे आत्मा हैं, और जीवन भी हैं।”

जिन्होंने बहरे और गूँगों का अध्ययन किया है वे हमें बताते हैं कि बोलने का सामर्थ्य कितना सुनने के सामर्थ्य पर निर्भर करता है, और बच्चों में सुनने की हानि के पीछे बोलने की हानि भी कैसे आ जाती है। यह एक व्यापक अर्थ में सत्य है: जैसा हम सुनते हैं, वैसा ही हम बोलते हैं। परमेश्वर के साथ हमारे व्यवहार में तो यह सर्वोच्च अर्थ में सत्य है। एक प्रार्थना चढ़ाना—कुछ इच्छाओं को व्यक्त करना और कुछ प्रतिज्ञाओं की दुहाई देना—सहज बात है, और मनुष्य से मानवी बुद्धि के द्वारा सीखी जा सकती है। परन्तु आत्मा में प्रार्थना करना, ऐसे शब्द बोलना जो परमेश्वर तक पहुँचें और उसे छू लें, जो अनदेखे जगत की शक्तियों पर असर डालें और उन्हें प्रभावित करें,—ऐसी प्रार्थना, ऐसा बोलना, पूर्णतः इस पर निर्भर करता है कि हम परमेश्वर की वाणी सुनें। जहाँ तक हम उस वाणी और भाषा को सुनते हैं जो परमेश्वर बोलता है, और परमेश्वर के शब्दों में उसके विचार, उसका मन, उसका जीवन अपने हृदय में ग्रहण करते हैं, वहीं तक हम उस वाणी और उस भाषा में बोलना सीखेंगे जिसे परमेश्वर सुनता है। यह शिष्य का कान ही है, जो प्रति भोर जगाया जाता है, जो सिखाए हुए की जीभ को तैयार करता है, कि वह परमेश्वर से और मनुष्यों से यथोचित रीति से बोले (यशायाह 50:4)।

परमेश्वर की वाणी का यह सुनना वचन के विचारपूर्ण अध्ययन से कहीं बढ़कर है। वचन का ऐसा अध्ययन और ज्ञान भी हो सकता है जिसमें जीवित परमेश्वर के साथ बहुत कम वास्तविक संगति हो। परन्तु वचन का ऐसा पढ़ना भी है, पिता की उपस्थिति में और आत्मा की अगुवाई में, जिसमें वचन हमारे पास स्वयं परमेश्वर की ओर से जीवित सामर्थ्य में आता है; वह हमारे लिये पिता की सचमुच की वाणी बन जाता है, स्वयं उसके साथ एक सच्ची व्यक्तिगत संगति। यह परमेश्वर की जीवित वाणी ही है जो हृदय में प्रवेश करती है, जो आशीष और बल लाती है, और एक ऐसे जीवित विश्वास की प्रतिक्रिया जगाती है जो फिर परमेश्वर के हृदय तक पहुँच जाती है।

इसी वाणी को सुनने पर आज्ञा मानने और विश्वास करने दोनों का सामर्थ्य निर्भर करता है। मुख्य बात यह जानना नहीं है कि क्या परमेश्वर ने हमें करने को कहा है, वरन् यह कि स्वयं परमेश्वर ही हम से यह कहता है। न तो व्यवस्था, न पुस्तक, न ही यह ज्ञान कि क्या उचित है, आज्ञाकारिता उत्पन्न करता है, वरन् परमेश्वर का व्यक्तिगत प्रभाव और उसकी जीवित संगति। और इसी प्रकार यह ज्ञान नहीं कि परमेश्वर ने क्या प्रतिज्ञा की है, वरन् स्वयं परमेश्वर की उपस्थिति ही, प्रतिज्ञा करनेवाले के रूप में, प्रार्थना में विश्वास और भरोसा जगाती है। केवल परमेश्वर की भरपूर उपस्थिति में ही अनाज्ञाकारिता और अविश्वास असम्भव हो जाते हैं।

“यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें, तो जो चाहो माँगो, और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।” हम देखते हैं कि इसका क्या अर्थ है। इन बातों में उद्धारकर्ता अपने आप को देता है। हमें इन बातों को अपने भीतर रखना है, अपनी इच्छा और जीवन में समाहित करके, अपने स्वभाव और आचरण में उन्हें पुनः प्रकट करते हुए। हमें उन्हें अपने में बना रहने देना है: हमारा सारा जीवन उन बातों की एक निरन्तर व्याख्या हो जो भीतर हैं और हमें भर रही हैं; वे बातें भीतर मसीह को प्रगट करें, और हमारा जीवन बाहर उसे प्रगट करे। जैसे-जैसे मसीह की बातें हमारे हृदय में प्रवेश करती हैं, हमारा जीवन बन जाती हैं और उसे प्रभावित करती हैं, वैसे-वैसे हमारे शब्द उसके हृदय में प्रवेश करेंगे और उसे प्रभावित करेंगे। मेरी प्रार्थना मेरे जीवन पर निर्भर करेगी; परमेश्वर के शब्द मेरे लिये और मुझ में जैसे हैं, वैसे ही मेरे शब्द परमेश्वर के लिये और परमेश्वर में होंगे। यदि मैं वह करूँ जो परमेश्वर कहता है, तो परमेश्वर वह करेगा जो मैं कहता हूँ।

पुराने नियम के भक्त परमेश्वर के शब्दों और हमारे शब्दों के बीच के इस सम्बन्ध को कितनी अच्छी तरह समझते थे, और उनके साथ प्रार्थना सचमुच कैसे उसके प्रति प्रेममय प्रतिक्रिया थी जो उन्होंने परमेश्वर को बोलते हुए सुना था! यदि वचन कोई प्रतिज्ञा होता, तो वे परमेश्वर पर भरोसा रखते कि वह अपने कहे अनुसार करेगा। “जैसा तू ने कहा है वैसा ही कर;” “क्योंकि हे यहोवा, तू ही ने यह कहा है;” “अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार;” “अपने वचन के अनुसार;” ऐसी अभिव्यक्तियों में उन्होंने दिखाया कि परमेश्वर ने प्रतिज्ञा में जो कहा, वही उनकी प्रार्थना में कहे हुए की जड़ और जीवन था। यदि वचन कोई आज्ञा होती, तो वे बस वैसा ही करते जैसा प्रभु ने कहा था: “तब अब्राम प्रभु के कहने के अनुसार चल दिया।” उनका जीवन परमेश्वर के साथ संगति था, शब्द और विचार का आदान-प्रदान। परमेश्वर जो बोलता, वे सुनते और करते; वे जो बोलते, परमेश्वर सुनता और करता। जो-जो शब्द वह हम से कहता है, उनमें से हर एक में सम्पूर्ण मसीह अपने आप को देता है कि वह उसे हमारे लिये पूरा करे। हर एक शब्द के लिये वह इससे कम कुछ नहीं माँगता कि हम सम्पूर्ण मनुष्य दे दें ताकि उस शब्द को थामें और उसकी पूर्ति पाएँ।

“यदि मेरी बातें तुम में बनी रहें;” यह शर्त सरल और स्पष्ट है। उसकी बातों में उसकी इच्छा प्रगट होती है। जैसे-जैसे वे बातें मुझ में बनी रहती हैं, उसकी इच्छा मुझ पर शासन करती है; मेरी इच्छा वह रीता पात्र बन जाती है जिसे उसकी इच्छा भरती है, वह इच्छुक साधन जिसे उसकी इच्छा चलाती है; वह मेरे अन्तःकरण को भर देता है। आज्ञाकारिता और विश्वास के अभ्यास में मेरी इच्छा उत्तरोत्तर बलवन्त होती जाती है, और उसके साथ गहरे आन्तरिक मेल में आ जाती है। वह उस पर पूरा भरोसा कर सकता है कि वह उसी को चाहेगी जो वह चाहता है; वह यह प्रतिज्ञा देने से नहीं डरता, “यदि मेरी बातें तुम में बनी रहें, तो जो चाहो माँगो, और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।” उन सब के लिये जो इस पर विश्वास करते और इसके अनुसार चलते हैं, वह इसे अक्षरशः सच्चा कर देगा।

मसीह के चेलो! क्या हमें यह अधिकाधिक स्पष्ट नहीं होता जा रहा कि जब हम अपनी अनुत्तरित प्रार्थनाओं, प्रार्थना में अपनी असमर्थता का बहाना, परमेश्वर की बुद्धि और इच्छा के प्रति एक कल्पित समर्पण से बनाते रहे हैं, तब असली कारण यह रहा है कि हमारा अपना निर्बल जीवन ही हमारी निर्बल प्रार्थनाओं का कारण रहा है। परमेश्वर के मुख से हमारे पास आनेवाले वचन के सिवा और कोई वस्तु मनुष्यों को बलवन्त नहीं बना सकती: उसी से हमें जीना है। मसीह का वचन ही, जो प्रिय जाना जाए, जिसमें जीवन बिताया जाए, जो हम में बना रहे, आज्ञाकारिता और कर्म के द्वारा हमारी सत्ता का भाग बनकर, हमें मसीह के साथ एक करता है, जो हमें आत्मिक रूप से परमेश्वर को छूने, उसे थामने के योग्य बनाता है। जो कुछ संसार का है वह मिटता जाता है; परन्तु जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है वह सर्वदा बना रहता है। हे प्रभु, आओ हम हृदय और जीवन मसीह की बातों को सौंप दें, उन बातों को जिनमें वह सदा अपने आप को देता है, वह व्यक्तिगत जीवित उद्धारकर्ता, और उसकी प्रतिज्ञा हमारा समृद्ध अनुभव बन जाएगी: “यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें, तो जो चाहो माँगो, और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।”

“हे प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखा!”

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हे धन्य प्रभु! आज तेरे पाठ ने मुझ पर मेरी मूर्खता फिर प्रगट कर दी है। मैं देखता हूँ कि क्यों मेरी प्रार्थना अधिक विश्वासयुक्त और प्रबल नहीं रही। मैं तुझ से अपने बोलने में उतना लगा रहा जितना तेरे मुझ से बोलने में नहीं। मैं यह नहीं समझा कि विश्वास का रहस्य यही है: विश्वास उतना ही हो सकता है जितना जीवित वचन आत्मा में वास करता है।

और तेरे वचन ने मुझे इतनी स्पष्टता से सिखाया था: हर एक मनुष्य सुनने में तत्पर और बोलने में धीरा हो; तेरा मन परमेश्वर के सम्मुख कुछ कहने में उतावला न हो। हे प्रभु, मुझे सिखा कि केवल तेरे वचन को अपने जीवन में ग्रहण करने से ही मेरे शब्द तेरे हृदय में ग्रहण किए जा सकते हैं; कि तेरा वचन, यदि वह मेरे भीतर एक जीवित सामर्थ्य हो, तो वह तेरे संग एक जीवित सामर्थ्य होगा; जो तेरे मुख ने कहा है, वह तेरा हाथ पूरा करेगा।

हे प्रभु! मुझे खतनारहित कान से छुड़ा। मुझे शिष्य का वह खुला हुआ कान दे, जो प्रति भोर जगाया जाए कि पिता की वाणी सुने। जैसे तू केवल वही बोलता था जो तू सुनता था, वैसे ही मेरा बोलना तेरे मुझ से बोलने की प्रतिध्वनि हो। “जब मूसा उससे बातें करने को मिलापवाले तम्बू में गया, तब उसने प्रायश्चित्त के ढकने के ऊपर से एक वाणी को अपने साथ बोलते सुना।” हे प्रभु, मेरे साथ भी ऐसा ही हो। ऐसा जीवन और चरित्र जिस पर यही एक चिह्न हो, कि तेरी बातें उसमें बनी रहती और दिखाई देती हैं, वही उस भरपूर आशीष की तैयारी हो: “जो चाहो माँगो, और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।” आमीन।

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