प्रार्थना की पाठशाला में मसीह के साथ
मनुष्य की नियति के साथ मेल में प्रार्थना

अध्याय 19 · 9 मिनट का पठन

मनुष्य की नियति के साथ मेल में प्रार्थना

‘उसने उनसे कहा, यह मूरत और नाम किसका है?—मत्ती 21:20

‘फिर परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार, अपनी समानता में बनाएँ।’—उत्पत्ति 1:26

‘यह मूरत किसकी है?’ इसी प्रश्न से यीशु ने अपने शत्रुओं को मात दी, जब वे उसे पकड़ने की सोच रहे थे, और कर के विषय में कर्तव्य की बात सुलझा दी। यह प्रश्न और वह सिद्धान्त जो इसमें निहित है, सर्वत्र लागू होते हैं। कहीं भी इतने सच्चे रूप से नहीं जितना स्वयं मनुष्य में। जो मूरत वह धारण करता है, वही उसकी नियति ठहराती है। परमेश्वर की मूरत धारण करते हुए, वह परमेश्वर का है: परमेश्वर से प्रार्थना करना ही वह है जिसके लिये वह सृजा गया। प्रार्थना उस अद्भुत समानता का एक भाग है जो वह अपने ईश्वरीय मूल के साथ धारण करता है; प्रेम की उस संगति के गहरे भेद की, जिसमें त्रिएक अपनी धन्यता पाता है, प्रार्थना पार्थिव मूरत और समानता है।

हम जितना अधिक मनन करते हैं कि प्रार्थना क्या है, और परमेश्वर के साथ उसकी कैसी अद्भुत सामर्थ्य है, उतना ही अधिक हम यह पूछने पर विवश अनुभव करते हैं कि मनुष्य कौन और क्या है, कि परमेश्वर की युक्तियों में उसे ऐसा स्थान दिया गया। पाप ने उसे इतना नीचे गिरा दिया है, कि वह अब जो है उससे हम इसकी कोई कल्पना नहीं कर सकते कि वह क्या होने के लिये ठहराया गया था। हमें मनुष्य की सृष्टि के परमेश्वर के अपने वृत्तान्त की ओर लौटना होगा कि वहाँ जानें कि परमेश्वर का उद्देश्य क्या था, और उस उद्देश्य की पूर्ति के लिये मनुष्य को कैसी सामर्थ्यों से युक्त किया गया था।

मनुष्य की नियति सृष्टि के समय परमेश्वर की भाषा से स्पष्ट रूप से प्रकट होती है। वह यह थी कि वह पृथ्वी और उसकी हर वस्तु को भर दे, उसे अपने वश में कर ले, और उस पर अधिकार रखे। ये तीनों अभिव्यक्तियाँ हमें दिखाती हैं कि मनुष्य को, परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में, यहाँ पृथ्वी पर शासन करने के लिये ठहराया गया था। परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में उसे परमेश्वर का स्थान भरना था: स्वयं परमेश्वर के अधीन रहते हुए, उसे और सब कुछ उसके अधीन रखना था। परमेश्वर की यही इच्छा थी कि जो कुछ पृथ्वी पर किया जाना था वह सब उसी के द्वारा किया जाए: पृथ्वी का इतिहास पूरी तरह उसी के हाथ में होना था।

ऐसी नियति के अनुरूप ही वह स्थान था जो उसे धारण करना था, और वह सामर्थ्य जो उसके हाथ में थी। जब कोई पार्थिव राजा किसी दूर के प्रान्त में अपना उपराजा भेजता है, तो यह समझा जाता है कि वह जो नीति अपनाई जानी है उस पर सलाह देता है, और उस सलाह के अनुसार काम किया जाता है: कि वह उस नीति को कार्यान्वित करने या साम्राज्य की गरिमा बनाए रखने के लिये आवश्यक सेना और अन्य साधन माँगने के लिये स्वतंत्र है। यदि उसकी नीति स्वीकार न हो, तो उसे वापस बुला लिया जाता है कि किसी ऐसे को स्थान मिले जो अपने राजा की इच्छाओं को बेहतर समझता हो; जब तक उस पर भरोसा किया जाता है, उसकी सलाह पर अमल किया जाता है। परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में मनुष्य को शासन करना था; सब कुछ उसकी इच्छा और शासन के अधीन किया जाना था; उसकी सलाह पर और उसके निवेदन पर स्वर्ग को पृथ्वी पर अपनी आशीष देनी थी। उसकी प्रार्थना वह अद्भुत, फिर भी सरल और अत्यन्त स्वाभाविक माध्यम होनी थी, जिसमें स्वर्ग में के राजा और उसके विश्वासयोग्य सेवक मनुष्य के बीच, जो इस संसार का स्वामी था, संगति बनी रहनी थी। संसार की नियति मनुष्य की इच्छाओं, उसकी अभिलाषा, उसकी प्रार्थना की सामर्थ्य में दे दी गई थी।

पाप के साथ यह सब एक भयंकर परिवर्तन से गुज़रा—मनुष्य के पतन ने सारी सृष्टि को शाप के अधीन कर दिया। छुटकारे के साथ एक महिमामय पुनर्स्थापना का आरम्भ दिखाई दिया। ज्यों ही परमेश्वर ने अब्राहम में अपने लिये एक ऐसी प्रजा बनानी आरम्भ की जिसमें से राजा, वरन् वह महान राजा, निकलेंगे, त्यों ही हम देखते हैं कि परमेश्वर के विश्वासयोग्य सेवक की प्रार्थना में उनकी नियति ठहराने की कैसी सामर्थ्य है जो उसके संपर्क में आते हैं। अब्राहम में हम देखते हैं कि प्रार्थना केवल, या मुख्यतः भी, अपने लिये आशीष पाने का साधन नहीं, वरन् मनुष्यों की नियति और उन पर शासन करनेवाली परमेश्वर की इच्छा पर प्रभाव डालने के उसके राजसी विशेषाधिकार का प्रयोग है। हम अब्राहम को एक बार भी अपने लिये प्रार्थना करते नहीं पाते। सदोम और लूत के लिये, अबीमेलेक के लिये, इश्माएल के लिये उसकी प्रार्थना सिद्ध करती है कि जो मनुष्य परमेश्वर का मित्र है, उसमें अपने चारों ओर के लोगों का इतिहास रचने की कैसी सामर्थ्य है।

यह आरम्भ ही से मनुष्य की नियति रही थी। पवित्रशास्त्र हमें केवल यही नहीं बताता, वरन् यह भी सिखाता है कि परमेश्वर मनुष्य को ऐसी ऊँची बुलाहट किस प्रकार सौंप सका। यह इसलिये कि उसने उसे अपने ही स्वरूप और समानता में सृजा था। बाहरी शासन उसे भीतरी योग्यता के बिना नहीं सौंपा गया: अधिकार रखने में, सब का स्वामी होने में परमेश्वर की मूरत धारण करना, उसकी जड़ भीतरी समानता में, उसके स्वभाव में थी। परमेश्वर और मनुष्य के बीच एक भीतरी सहमति और मेल था, और एक आरम्भिक परमेश्वर-सादृश्य, जिसने मनुष्य को परमेश्वर और उसके संसार के बीच मध्यस्थ होने के लिये सचमुच योग्य बनाया, क्योंकि उसे भविष्यद्वक्ता, याजक, और राजा होना था—कि परमेश्वर की इच्छा की व्याख्या करे, प्रकृति की आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व करे, परमेश्वर की उदारता को ग्रहण करे और बाँटे। यह परमेश्वर की मूरत धारण करने में ही था कि वह परमेश्वर का शासन धारण कर सका; वह सचमुच परमेश्वर के इतना समान था, परमेश्वर के उद्देश्यों में प्रवेश करने, और उसकी योजनाओं को कार्यान्वित करने के इतने योग्य था, कि परमेश्वर उसे यह अद्भुत विशेषाधिकार सौंप सका कि वह जो कुछ संसार को चाहिए वह माँगे और पाए। और यद्यपि पाप ने कुछ समय के लिये परमेश्वर की योजनाओं को विफल कर दिया है, तौभी प्रार्थना अब भी वही बनी हुई है जो वह होती यदि मनुष्य कभी गिरा ही न होता: मनुष्य के परमेश्वर-सादृश्य का प्रमाण, अनन्त अनदेखे जन के साथ उसकी संगति का वाहन, वह सामर्थ्य जिसे उस हाथ को थामने की अनुमति है जो विश्व की नियति को थामे हुए है। प्रार्थना केवल दया के लिये विनती करनेवाले की पुकार मात्र नहीं; वह मनुष्य के द्वारा अपनी इच्छा का उच्चतम प्रकटीकरण है, जो अपने आप को ईश्वरीय मूल का जानता है, जो राजा-सी स्वतंत्रता में अनन्त की युक्तियों का कार्यान्वयक होने के लिये सृजा गया और उसके योग्य है।

जो पाप ने नष्ट किया, उसे अनुग्रह ने पुनर्स्थापित किया है। जो पहले आदम ने खोया, उसे दूसरे ने पुनः जीत लिया है। मसीह में मनुष्य अपना मूल स्थान फिर पाता है, और कलीसिया, मसीह में बनी रहते हुए, इस प्रतिज्ञा की अधिकारी होती है: ‘जो चाहो सो माँगो, और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।’ ऐसी प्रतिज्ञा किसी भी रीति से, सबसे पहले, उस अनुग्रह या आशीष का संदर्भ नहीं देती जिसकी हमें अपने लिये आवश्यकता है। उसका संबंध हमारी उस स्थिति से है कि हम स्वर्गीय दाखलता की फल लानेवाली डालियाँ हैं, जो उसी के समान केवल पिता के कार्य और महिमा के लिये जीती हैं। यह उनके लिये है जो उसमें बने रहते हैं, जिन्होंने अपने आप को त्यागकर उसमें, उसके आज्ञाकारिता और आत्म-बलिदान के जीवन के साथ, अपना निवास कर लिया है, जिन्होंने अपना जीवन खोकर उसी में पाया है, जो अब पूरी तरह पिता और उसके राज्य के हितों को सौंप दिए गए हैं। ये वे हैं जो समझते हैं कि किस प्रकार उनकी नई सृष्टि उन्हें उनकी मूल नियति में वापस ले आई है, ने परमेश्वर की मूरत और समानता को पुनर्स्थापित किया है, और उसके साथ अधिकार रखने की सामर्थ्य को भी। ऐसे लोगों में सचमुच यह सामर्थ्य है, हर एक अपने-अपने मण्डल में, कि यहाँ पृथ्वी पर स्वर्ग की शक्तियों को पाएँ और बाँटें। पवित्र साहस के साथ वे जो चाहें प्रकट कर सकते हैं: वे परमेश्वर की उपस्थिति में याजकों के समान जीते हैं; राजाओं के समान आनेवाले जगत की शक्तियाँ उनके हाथ में आने लगती हैं। वे इस प्रतिज्ञा की पूर्ति में प्रवेश करते हैं: ‘जो कुछ चाहो सो माँगो, वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।’

हे जीवित परमेश्वर की कलीसिया! तेरी बुलाहट उससे कहीं ऊँची और पवित्र है जितनी तू जानती है। तेरे सदस्यों के द्वारा, जो परमेश्वर के लिये राजा और याजक हैं, परमेश्वर संसार पर शासन करना चाहता है; उनकी प्रार्थनाएँ स्वर्ग की आशीष देती और रोक रखती हैं। अपने उन चुने हुओं में जो केवल अपने आप के बच जाने से ही सन्तुष्ट नहीं, वरन् अपने आप को पूरी तरह सौंप देते हैं, कि उनके द्वारा, ठीक जैसे पुत्र के द्वारा, पिता अपनी सारी महिमामय युक्ति पूरी करे, अपने इन चुने हुओं में, जो रात-दिन उसकी दुहाई देते हैं, परमेश्वर यह सिद्ध करना चाहता है कि मनुष्य की मूल नियति कैसी अद्भुत थी। पृथ्वी पर परमेश्वर की मूरत-धारी के रूप में, पृथ्वी सचमुच उसके हाथ में दी गई थी। जब वह गिरा, तो सब कुछ उसके साथ गिरा: सारी सृष्टि एक साथ कराहती और पीड़ा में तड़पती है। परन्तु अब वह छुड़ाया गया है; मूल गरिमा की पुनर्स्थापना आरम्भ हो गई है। यह सचमुच परमेश्वर का उद्देश्य है कि उसके अनन्त उद्देश्य की पूर्ति, और उसके राज्य का आना, उसके उन लोगों पर निर्भर हो जो, मसीह में बने रहते हुए, अपने सिर, उस महान याजक-राजा, में अपना स्थान लेने को तैयार हैं, और अपनी प्रार्थनाओं में इतने साहसी हैं कि कह सकें कि वे क्या चाहते हैं कि उनका परमेश्वर करे। पृथ्वी पर परमेश्वर की मूरत-धारी और प्रतिनिधि के रूप में, छुड़ाए गए मनुष्य को अपनी प्रार्थनाओं के द्वारा इस पृथ्वी का इतिहास ठहराना है। मनुष्य सृजा गया, और अब फिर छुड़ाया गया है, इसलिये कि प्रार्थना करे, और अपनी प्रार्थना के द्वारा अधिकार रखे।

‘हे प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखा।’

हे प्रभु, मनुष्य क्या है कि तू उसका स्मरण रखे? और आदमी क्या है कि तू उसकी सुधि ले? क्योंकि तूने उसे स्वर्गदूतों से थोड़ा ही कम बनाया है, और महिमा और आदर का मुकुट उसके सिर पर रखा है। तूने उसे अपने हाथों के कार्यों पर अधिकार दिया है: तूने सब कुछ उसके पाँवों के नीचे कर दिया है। हे यहोवा, हमारे प्रभु, सारी पृथ्वी पर तेरा नाम क्या ही उत्तम है!

हे प्रभु परमेश्वर! पाप ने मनुष्य को कितना नीचे गिरा दिया है। और इसने उसके मन को कितनी भयंकर रीति से अन्धकारमय कर दिया है, कि वह अपनी ईश्वरीय नियति को, अर्थात् तेरा सेवक और प्रतिनिधि होने को, जानता तक नहीं। हाय! कि तेरे लोग भी, जब उनकी आँखें खुलती हैं, अपनी बुलाहट को स्वीकार करने, और परमेश्वर के साथ सामर्थ्य पाने की खोज करने को इतने कम तैयार होते हैं, कि उन्हें मनुष्यों के साथ भी उन्हें आशीष देने की सामर्थ्य मिले।

हे प्रभु यीशु! तुझ में ही है कि पिता ने फिर मनुष्य को महिमा और आदर का मुकुट पहनाया है, और हमारे लिये वह मार्ग खोल दिया है कि हम वह बनें जो वह हमें बनाना चाहता है। हे प्रभु, अपने लोगों पर दया कर, और अपने निज भाग की सुधि ले! अपनी कलीसिया में सामर्थ्य से कार्य कर, और अपने विश्वास करनेवाले चेलों को सिखा कि वे अपने राजकीय याजकपद में, और प्रार्थना की उस सामर्थ्य में जिसे तूने ऐसी अद्भुत प्रतिज्ञाएँ दी हैं, आगे बढ़ें, कि तेरे राज्य की सेवा करें, जातियों पर शासन रखें, और पृथ्वी पर परमेश्वर के नाम को महिमामय करें। आमीन।

पृष्ठ 1 / 1 · 9 मिनट अध्याय में शेष