प्रार्थना की पाठशाला में मसीह के साथ
परमेश्वर के अस्तित्व के साथ मेल में प्रार्थना

अध्याय 18 · 12 मिनट का पठन

परमेश्वर के अस्तित्व के साथ मेल में प्रार्थना

‘हे पिता, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि तूने मेरी सुन ली है। और मैं जानता था कि तू सदा मेरी सुनता है।’—यूहन्ना 11:41, 42

‘तू मेरा पुत्र है; आज मैंने तुझे जन्म दिया है। मुझ से माँग, और मैं तुझे दूँगा।’—भजन संहिता 2:7, 8

नए नियम में हम विश्वास और ज्ञान के बीच एक भेद पाते हैं। ‘क्योंकि एक को आत्मा के द्वारा बुद्धि का वचन दिया जाता है; और दूसरे को उसी आत्मा के अनुसार ज्ञान का वचन; और किसी को उसी आत्मा में विश्वास।’ किसी बालक में या किसी सरल-हृदय मसीही में थोड़े ज्ञान के साथ बहुत विश्वास हो सकता है। बालक-सी सरलता सत्य को बिना किसी कठिनाई के ग्रहण कर लेती है, और अक्सर अपने या दूसरों के लिये अपने विश्वास का इसके सिवा और कोई कारण देने की कम ही परवाह करती है कि: परमेश्वर ने कहा है। परन्तु परमेश्वर की यही इच्छा है कि हम केवल अपने सारे हृदय से ही नहीं, वरन् अपनी सारी बुद्धि से भी उससे प्रेम करें और उसकी सेवा करें; कि हम उसके सब मार्गों और वचनों और कार्यों की ईश्वरीय बुद्धि और सुन्दरता की अन्तर्दृष्टि में बढ़ते जाएँ। यह केवल इसी प्रकार है कि विश्वासी परमेश्वर के अनुग्रह की महिमा के पूरी तरह निकट आने और उसकी उचित रीति से आराधना करने योग्य होगा; और केवल इसी प्रकार कि हमारा हृदय उन बुद्धि और ज्ञान के खज़ानों को बुद्धिमानी से ग्रहण कर सके जो छुटकारे में हैं, और उस गीत के उच्चतम स्वर में पूरी तरह प्रवेश करने को तैयार हो जो सिंहासन के सामने उठता है: ‘अहा! परमेश्वर की बुद्धि और ज्ञान का धन क्या ही गहरा है!’

हमारे प्रार्थना-जीवन में इस सत्य का पूरा अनुप्रयोग होता है। यद्यपि प्रार्थना और विश्वास इतने सरल हैं कि नया जन्मा हुआ मन-फिरा भी सामर्थ्य से प्रार्थना कर सकता है, तौभी सच्चा मसीही विज्ञान प्रार्थना के सिद्धान्त में अपनी कुछ सबसे गहरी समस्याएँ पाता है। प्रार्थना की सामर्थ्य कहाँ तक एक यथार्थ है? यदि है, तो परमेश्वर प्रार्थना को ऐसी प्रबल सामर्थ्य कैसे दे सकता है? प्रार्थना की क्रिया परमेश्वर की इच्छा और उसके निर्णयों के साथ कैसे मेल में बिठाई जा सकती है? परमेश्वर की सर्वसत्ता और हमारी इच्छा, परमेश्वर की स्वतंत्रता और हमारी, कैसे मिलाई जा सकती हैं?—ये और ऐसे ही और प्रश्न मसीही मनन और खोज के उपयुक्त विषय हैं। जितनी अधिक उत्कटता और श्रद्धा से हम ऐसे भेदों के निकट आते हैं, उतना ही अधिक हम आराधनामय आश्चर्य में उसकी स्तुति करने को गिरेंगे जिसने प्रार्थना में मनुष्य को ऐसी सामर्थ्य दी है।

प्रार्थना के विषय में गुप्त कठिनाइयों में से एक—एक ऐसी जो, यद्यपि व्यक्त नहीं की जाती, तौभी अक्सर सचमुच प्रार्थना को रोकती है—परमेश्वर की पूर्णता से, अर्थात् उसके अपने से बाहर की हर वस्तु से उसकी नितान्त स्वतंत्रता से, निकलती है। क्या वह वही अनन्त सत्ता नहीं जो अपने होने का ऋणी केवल अपने ही आप है, जो अपने आप को ठहराता है, और जिसकी बुद्धिमान और पवित्र इच्छा ने वह सब ठहरा दिया है जो होना है? तो प्रार्थना उस पर कैसे प्रभाव डाल सकती है, या वह प्रार्थना से ऐसा करने को कैसे प्रेरित हो सकता है जो अन्यथा न किया जाता? क्या प्रार्थना के उत्तर की प्रतिज्ञा केवल हमारी दुर्बलता के प्रति एक कृपादृष्टि मात्र नहीं? प्रार्थना की सामर्थ्य—उसकी बहुत काम आनेवाली सामर्थ्य—के विषय में जो कहा जाता है, क्या वह हमारी सोचने की रीति के अनुकूल एक समझौते से बढ़कर कुछ है, क्योंकि ईश्वरत्व अपने कार्यों के लिये कभी बाहर की किसी क्रिया पर निर्भर नहीं हो सकता? और क्या प्रार्थना की आशीष केवल वह प्रभाव मात्र नहीं जो वह हम पर ही डालती है?

ऐसे प्रश्नों का उत्तर ढूँढ़ते हुए, हम कुंजी परमेश्वर के अस्तित्व में ही, पवित्र त्रिएकता के भेद में पाते हैं। यदि परमेश्वर केवल एक ही व्यक्ति होता, अपने ही में बन्द, तो उसके निकट होने या उस पर प्रभाव डालने का कोई विचार ही न हो सकता। परन्तु परमेश्वर में तीन व्यक्ति हैं। परमेश्वर में हमारे पास पिता और पुत्र हैं, जिनके पास पवित्र आत्मा में एकता और संगति का उनका जीवित बन्धन है। जब अनन्त प्रेम ने पुत्र को जन्म दिया, और पिता ने पुत्र को दूसरे व्यक्ति के रूप में अपने बराबर और अपने मंत्री के रूप में अपने पास एक स्थान दिया, तब स्वयं ईश्वरत्व के अन्तरतम जीवन में ही प्रार्थना और उसके प्रभाव के लिये एक मार्ग खुल गया। जैसे पृथ्वी पर, वैसे ही स्वर्ग में पिता और पुत्र के बीच का सारा संबंध देने और लेने का है। और यदि वह लेना उतना ही स्वेच्छापूर्ण और आत्म-निश्चित हो जितना देना, तो पुत्र की ओर से एक माँगना और पाना अवश्य होना चाहिए। ईश्वरीय व्यक्तियों की पवित्र संगति में, पुत्र का यह माँगना परमेश्वर के त्रिधन्य जीवन के महान कार्यों में से एक था। इसलिये हम इसे भजन 2 में पाते हैं: ‘आज मैंने तुझे जन्म दिया है: मुझ से माँग और मैं तुझे दूँगा।’ पिता ने पुत्र को अपने ऊपर कार्य करने का स्थान और सामर्थ्य दी। पुत्र का माँगना कोई निरा दिखावा या छाया न था, वरन् उन जीवन-गतियों में से एक था जिनमें पिता और पुत्र का प्रेम मिलकर एक दूसरे को पूरा करता था। पिता ने ठहराया था कि वह अपनी युक्तियों में अकेला न हो: एक पुत्र था जिसके माँगने और स्वीकार करने पर उनकी पूर्ति निर्भर हो। और यों स्वयं परमेश्वर के अस्तित्व और जीवन में एक माँगना था जिसका पृथ्वी पर की प्रार्थना प्रतिबिम्ब और उद्गार होनी थी। यीशु ने इसी को सम्मिलित किए बिना यह न कहा था, ‘मैं जानता था कि तू सदा मेरी सुनता है।’ जैसे पृथ्वी पर यीशु का पुत्रत्व स्वर्ग में उसके पुत्रत्व से अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही पृथ्वी पर उसकी प्रार्थना के साथ भी: वह स्वर्ग में उसके माँगने का ही निरन्तरता और प्रतिरूप है। मनुष्य मसीह यीशु की प्रार्थना पिता की गोद में एकलौते पुत्र के अनन्त माँगने और पृथ्वी पर मनुष्यों की प्रार्थना के बीच की कड़ी है। प्रार्थना का उद्गम और उसका सबसे गहरा स्रोत स्वयं परमेश्वर के अस्तित्व में है। ईश्वरत्व की गोद में कभी कुछ प्रार्थना के बिना नहीं किया जाता—अर्थात् पुत्र का माँगना और पिता का देना।

यह हमें कुछ हद तक यह समझने में सहायता कर सकता है कि किस प्रकार मनुष्य की प्रार्थना, पुत्र के द्वारा आकर, परमेश्वर पर प्रभाव डाल सकती है। परमेश्वर के निर्णय ऐसे निश्चय नहीं हैं जो उसने पुत्र, या उसके निवेदन, या उसके द्वारा ऊपर भेजे जानेवाले निवेदन के संदर्भ के बिना किए हों। कदापि नहीं। प्रभु यीशु पहलौठा है, सब वस्तुओं का सिर और वारिस: सब वस्तुएँ उसी के द्वारा और उसी के लिये सृजी गईं, और सब वस्तुएँ उसी में स्थिर रहती हैं। पिता की युक्तियों में, पुत्र का, समस्त सृष्टि के प्रतिनिधि के रूप में, सदा एक स्वर रहा; अनन्त उद्देश्य के निर्णयों में मध्यस्थ और मध्यस्थता करनेवाले के रूप में पुत्र की स्वतंत्रता के लिये, और इसलिये उन सब के निवेदनों के लिये जो पुत्र में पिता के निकट आते हैं, सदा स्थान छोड़ा गया।

और यदि यह विचार आए कि पिता पर कार्य करने की पुत्र की यह स्वतंत्रता और सामर्थ्य ईश्वरीय निर्णयों की अपरिवर्तनीयता के विरुद्ध है, तो हम यह न भूलें कि परमेश्वर के साथ मनुष्य के समान कोई ऐसा भूतकाल नहीं जिससे वह अटल रूप से बँधा हो। परमेश्वर अपने भूत और भविष्य समेत समय में नहीं जीता; समय के भेदों का उससे कोई संबंध नहीं जो अनन्तकाल में वास करता है। और अनन्तकाल एक सदा-वर्तमान ‘अब’ है, जिसमें भूत कभी बीता हुआ नहीं, और भविष्य सदा वर्तमान है। हमारी मानवीय दुर्बलता के अनुकूल होने के लिये, पवित्रशास्त्र को बीते हुए निर्णयों और आनेवाले भविष्य की बात करनी पड़ती है। वास्तव में, परमेश्वर की युक्ति की अपरिवर्तनीयता सदा उसकी उस स्वतंत्रता के साथ पूर्ण मेल में बनी रहती है कि वह जो चाहे सो करे। पुत्र और उसके लोगों की प्रार्थनाएँ अनन्त निर्णयों में यों नहीं उठा ली गईं कि उनका प्रभाव केवल एक आभास मात्र हो; वरन् यों, कि पिता का हृदय अपने आप को हर उस प्रार्थना को सुनने के लिये खुला और स्वतंत्र रखता है जो पुत्र के द्वारा उठती है, और कि परमेश्वर सचमुच अपने आप को प्रार्थना के द्वारा यह करने का निश्चय करने देता है जो वह अन्यथा न करता।

ईश्वरीय सर्वसत्ता और मानवीय स्वतंत्रता का यह पूर्ण मेल और एकता हमारे लिये एक अथाह भेद है, क्योंकि परमेश्वर उस अनन्त सत्ता के रूप में हमारे सब विचारों से परे है। परन्तु यह हमारी शान्ति और बल हो कि हमें यह निश्चय हो कि पिता और पुत्र की अनन्त संगति में प्रार्थना की सामर्थ्य का अपना उद्गम और निश्चय है, और कि पुत्र के साथ अपनी एकता के द्वारा हमारी प्रार्थना उठा ली जाती है और धन्य त्रिएकता के अन्तरतम जीवन में अपना प्रभाव डाल सकती है। परमेश्वर के निर्णय कोई लोहे का ढाँचा नहीं जिसके विरुद्ध मनुष्य की स्वतंत्रता व्यर्थ ही जूझने की चेष्टा करे। नहीं। परमेश्वर स्वयं जीवित प्रेम है, जिसने अपने पुत्र में मनुष्य के रूप में उस सब के साथ जो मानवीय है सबसे कोमल संबंध में प्रवेश किया है, जो पवित्र आत्मा के द्वारा उस सब को जो मानवीय है प्रेम के ईश्वरीय जीवन में उठा लेता है, और अपने आप को स्वतंत्र रखता है कि वह हर मानवीय प्रार्थना को संसार के अपने शासन में उसका स्थान दे।

ऐसे विचारों के उषाकाल के प्रकाश में ही है कि धन्य त्रिएकता का सिद्धान्त अब कोई अमूर्त कल्पना नहीं रहता, वरन् उस मार्ग की जीवित अभिव्यक्ति बन जाता है जिससे मनुष्य के लिये यह संभव हुआ कि वह परमेश्वर की संगति में उठा लिया जाए, और उसकी प्रार्थना इस पृथ्वी पर परमेश्वर के शासन में एक यथार्थ कारक बन जाए। और हम, मानो दूर से, उस प्रकाश की झलकियाँ पा सकते हैं जो अनन्त जगत से इन जैसे शब्दों पर चमकता है: ‘उसी के द्वारा हम दोनों की एक ही आत्मा में पिता तक पहुँच होती है।’

‘हे प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखा।’

अनन्त परमेश्वर! त्रिएक और त्रिधन्य पवित्र! गहरी श्रद्धा में मैं ढँके हुए मुँह से तेरे ईश्वरीय अस्तित्व के पवित्र भेद के सामने आराधना करूँ। और यदि तुझे भाए, हे परम महिमामय परमेश्वर, कि तू उस भेद का कुछ भाग अनावृत्त करे, तो मैं भय और कँपकँपी के साथ झुकूँ, कहीं ऐसा न हो कि तेरे विरुद्ध पाप करूँ, जब मैं तेरी महिमा पर मनन करता हूँ।

पिता! मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि तू यह नाम केवल यहाँ पृथ्वी पर अपनी सन्तान के पिता के रूप में ही नहीं धारण करता, वरन् अनन्तकाल से अपने एकलौते पुत्र के साथ पिता के रूप में विद्यमान रहा है। मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि पिता के रूप में तू हमारी प्रार्थना सुन सकता है, क्योंकि तूने अनन्तकाल से अपने पुत्र के माँगने को अपनी युक्तियों में स्थान दिया है। मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि हम ने उसमें पृथ्वी पर देखा है कि स्वर्ग में तेरे साथ उसकी वह धन्य संगति कैसी थी; और किस प्रकार अनन्तकाल से तेरी सब युक्तियों और निर्णयों में उसकी प्रार्थना और उनके उत्तरों के लिये स्थान छोड़ा गया था। और सबसे बढ़कर मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि ऊपर तेरे सिंहासन पर उसके सच्चे मानवीय स्वभाव के द्वारा, और यहाँ नीचे हमारे मानवीय स्वभाव में तेरे पवित्र आत्मा के द्वारा, एक मार्ग खुल गया है जिससे आवश्यकता की हर मानवीय पुकार परमेश्वर के जीवन और प्रेम में उठा ली जाकर उसे छू सकती है, और उत्तर में वह सब पा सकती है जो कुछ वह माँगे।

धन्य यीशु! जिसमें पुत्र के रूप में प्रार्थना का मार्ग खुल गया है, और जो हमें उत्तर का निश्चय देता है, हम तुझ से विनती करते हैं, अपने लोगों को प्रार्थना करना सिखा। ओह, यह हर दिन हमारे पुत्रत्व का चिह्न हो, कि तेरे समान हम भी जानें कि पिता सदा हमारी सुनता है। आमीन।

टिप्पणी।

‘“परमेश्वर प्रार्थना सुनता है।” प्रार्थना का यह सरलतम दृष्टिकोण समस्त पवित्रशास्त्र में लिया गया है। यह हमारे हृदय और जीवन पर प्रार्थना के परावर्ती प्रभाव पर नहीं ठहरता, यद्यपि यह एक कार्य के रूप में प्रार्थना और एक अवस्था के रूप में प्रार्थना के बीच के संबंध को भरपूर रीति से दिखाता है। यह बल्कि बड़ी निश्चितता से प्रार्थना के वस्तुनिष्ठ या यथार्थ उद्देश्यों को स्थिर करता है—परमेश्वर से आशीष, दान, छुटकारे पाना। ‘माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा,” यीशु कहता है।

‘चाहे यह विचार कितना ही सच्चा और मूल्यवान क्यों न हो कि परमेश्वर ने, सब बातों को पहले से देखकर और पहले से ठहराकर, हमारी प्रार्थनाओं को भी घटनाओं की, कारण और परिणाम की शृंखला में कड़ियों के रूप में, एक यथार्थ सामर्थ्य के रूप में, पहले से देखा और पहले से ठहराया है, तौभी हमें विश्वास है कि यह वह प्रकाश नहीं जिसमें मन इस महान विषय में शान्ति पा सके, न ही हम यह सोचते हैं कि यहीं वह आकर्षक शक्ति है जो हमें प्रार्थना में खींचे। हमें बल्कि यह अनुभव होता है कि ऐसा विचार ध्यान को उस वस्तु से हटा देता है जिससे प्रार्थना की प्रेरणा, जीवन और बल आते हैं। जीवित परमेश्वर, समकालीन और केवल अनन्त ही नहीं, वह जीवित, दयालु, पवित्र जन, वह परमेश्वर जो अपने आप को प्राण पर प्रकट करता है, वह परमेश्वर जो कहता है, “मेरे मुख को ढूँढ़ो;” यही वह चुम्बक है जो हमें खींचता है, यही अकेला हृदय और होंठ खोल सकता है। . .

‘परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह में हमारे पास इस कठिनाई का पूरा समाधान है। उसने पृथ्वी पर प्रार्थना की, और वह केवल मनुष्य के रूप में ही नहीं, वरन् देहधारी परमेश्वर के पुत्र के रूप में। पृथ्वी पर उसकी प्रार्थना अनन्तकाल से उसकी प्रार्थना की ही अभिव्यक्ति है, जब ईश्वरीय युक्ति में वह मसीह के रूप में ठहराया गया था। . . . पुत्र सब वस्तुओं का वारिस होने के लिये नियुक्त किया गया। अनन्तकाल से परमेश्वर का पुत्र मार्ग था, मध्यस्थ था। वह, हमारी अपूर्ण भाषा में कहें तो, अनन्तकाल से संसार की ओर से पिता से बातें करता रहा।’—सैफ़िर, गुप्त जीवन, अध्याय 6। यह भी देखें प्रभु की प्रार्थना, पृ. 12।

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