प्रबल प्रार्थना
बाइबल की प्रार्थनाएँ

अध्याय 1 · 17 मिनट का पठन

बाइबल की प्रार्थनाएँ

जिन लोगों ने इस पाप से शापित पृथ्वी पर सबसे गहरी छाप छोड़ी है, वे प्रार्थना करनेवाले पुरुष और स्त्रियाँ रहे हैं। तुम पाओगे कि प्रार्थना वह महान सामर्थ्य रही है जिसने न केवल परमेश्वर को, वरन् मनुष्य को भी हिलाया है। अब्राहम प्रार्थना करनेवाला मनुष्य था, और स्वर्गदूत स्वर्ग से उतरकर उससे बातें करने आए। याकूब की प्रार्थना का उत्तर पनीएल की उस अद्भुत भेंट में मिला, जिसके फल से उसे इतनी बड़ी आशीष मिली, और उसके भाई एसाव का मन भी नरम हो गया; हन्ना की प्रार्थना के उत्तर में बालक शमूएल दिया गया; एलिय्याह की प्रार्थना ने साढ़े तीन वर्ष तक आकाश को बन्द कर दिया, और फिर उसने प्रार्थना की, और आकाश से वर्षा हुई।

प्रेरित याकूब हमें बताता है कि एलिय्याह भविष्यद्वक्ता “हमारे समान दुःख-सुख भोगी मनुष्य” था। मैं आभारी हूँ कि जो पुरुष और स्त्रियाँ प्रार्थना में इतने सामर्थी थे, वे ठीक हमारे ही जैसे थे। हम यह सोचने लगते हैं कि पुराने समय के वे भविष्यद्वक्ता और सामर्थी पुरुष और स्त्रियाँ हम से भिन्न थे। यह सच है कि वे कहीं अधिक अन्धकार के युग में जीते थे, परन्तु वे भी हमारे ही समान दुःख-सुख भोगी थे।

हम पढ़ते हैं कि एक और अवसर पर एलिय्याह ने कर्मेल पर्वत पर आकाश से आग उतारी। बाल के नबी देर तक और ऊँचे शब्द से पुकारते रहे, परन्तु कोई उत्तर न आया। एलिय्याह के परमेश्वर ने उसकी प्रार्थना सुनी और उसका उत्तर दिया। आओ, हम स्मरण रखें कि एलिय्याह का परमेश्वर आज भी जीवित है। भविष्यद्वक्ता तो उठा लिया गया और स्वर्ग पर चला गया, परन्तु उसका परमेश्वर आज भी जीवित है, और उसके पास पहुँचने का वही अधिकार हमें भी है जो एलिय्याह को था। हमें भी वही अधिकार है कि परमेश्वर के पास जाएँ और माँगें कि स्वर्ग से आग उतरे और हमारी अभिलाषाओं और वासनाओं को भस्म कर दे—हमारे मैल को जला दे, और मसीह को हम में से चमकने दे।

एलीशा ने प्रार्थना की, और एक मरे हुए बालक में फिर से प्राण आ गए। हमारे बहुत से बच्चे अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए हैं। आओ, हम भी वैसा ही करें जैसा एलीशा ने किया; आओ, हम परमेश्वर से विनती करें कि वह हमारी प्रार्थनाओं के उत्तर में उन्हें जिला उठाए।

राजा मनश्शे एक दुष्ट मनुष्य था, और उसने अपने पिता के परमेश्वर के विरुद्ध जो कुछ वह कर सकता था, सब किया था; फिर भी जब बाबेल में उसने परमेश्वर की दुहाई दी, तो उसकी दुहाई सुनी गई, और वह बन्दीगृह से निकाला गया और यरूशलेम में फिर सिंहासन पर बैठाया गया। निश्चय, यदि परमेश्वर ने दुष्ट मनश्शे की प्रार्थना पर ध्यान दिया, तो वह हमारे संकट के समय हमारी भी सुनेगा। क्या हमारे बहुत से संगी मनुष्यों के लिये यह संकट का समय नहीं है? क्या हम में से बहुतों के मन बोझ से दबे हुए नहीं हैं? जब हम अनुग्रह के सिंहासन के पास जाएँ, तो आओ, स्मरण रखें कि परमेश्वर प्रार्थना का उत्तर देता है।

फिर शिमशोन को देखो। उसने प्रार्थना की; और उसका बल लौट आया, यहाँ तक कि जितने उसने अपने मरते समय मारे वे उनसे भी अधिक थे जिन्हें उसने अपने जीवन में मारा था। वह एक लौटा हुआ पथभ्रष्ट था, और परमेश्वर के साथ उसका सामर्थ्य था। जो लोग पथभ्रष्ट हो गए हैं, यदि वे केवल परमेश्वर की ओर लौट आएँ, तो देखेंगे कि परमेश्वर कितनी शीघ्रता से प्रार्थना का उत्तर देता है।

अय्यूब ने प्रार्थना की, और उसकी बँधुआई पलट गई। अन्धकार की जगह उजियाला आया, और परमेश्वर ने उसे उसकी पहली समृद्धि से भी ऊँचा उठा दिया—प्रार्थना के उत्तर में।

दानिय्येल ने परमेश्वर से प्रार्थना की, और जिब्राईल उसे यह बताने आया कि वह परमेश्वर की दृष्टि में अति प्रिय ठहरा है। तीन बार यह सन्देश प्रार्थना के उत्तर में स्वर्ग से उसके पास आया। स्वर्ग के भेद उस पर प्रगट किए गए, और उसे बताया गया कि परमेश्वर का पुत्र अपनी प्रजा के पापों के लिये काटा जाएगा। हम यह भी पाते हैं कि कुरनेलियुस ने प्रार्थना की; और पतरस उसके पास भेजा गया कि उससे ऐसी बातें कहे, जिनके द्वारा वह और उसका सारा घराना उद्धार पाए। प्रार्थना के उत्तर में यह बड़ी आशीष उस पर और उसके घराने पर आई। पतरस तीसरे पहर प्रार्थना करने के लिये छत पर चढ़ा था, तभी उसने आकाश से उतरती उस चादर का अद्भुत दर्शन देखा। और जब कलीसिया पतरस के लिये लौ लगाकर परमेश्वर से प्रार्थना कर रही थी, तभी स्वर्गदूत उसे छुड़ाने के लिये भेजा गया।

इसी प्रकार पूरे पवित्रशास्त्र में तुम पाओगे कि जब विश्वास की प्रार्थना परमेश्वर के पास ऊपर गई, तो उत्तर नीचे उतर आया। मैं सोचता हूँ कि यह एक बहुत ही रोचक अध्ययन होगा कि सारी बाइबल को आरम्भ से अन्त तक पढ़ें और देखें कि जब परमेश्वर के लोग घुटनों पर होकर उसे पुकार रहे थे, तब क्या-क्या हुआ। निश्चय ऐसा अध्ययन हमारे विश्वास को बहुत दृढ़ करेगा—क्योंकि वह दिखाएगा कि जब-जब सहायता के लिये पुकार उसके पास पहुँची, परमेश्वर ने कितनी अद्भुत रीति से सुना और छुड़ाया है।

फिलिप्पी के बन्दीगृह में पौलुस और सीलास को देखो। जब वे प्रार्थना कर रहे थे और भजन गा रहे थे, तो वह स्थान हिल गया, और दरोगा का मन फिर गया। सम्भवतः बाइबल में लिखे किसी भी और मन-फिराव से बढ़कर इसी एक मन-फिराव ने लोगों को परमेश्वर के राज्य में लाने का काम किया है। कितने ही लोग इस प्रश्न का उत्तर खोजते हुए आशीषित हुए हैं—“उद्धार पाने के लिये मैं क्या करूँ?” उन दो भक्त पुरुषों की प्रार्थना ही थी जिसने दरोगा को घुटनों पर ला दिया, और उस पर और उसके परिवार पर आशीष ले आई।

तुम्हें स्मरण है कि कैसे स्तिफनुस ने प्रार्थना करते हुए ऊपर देखा, और स्वर्ग को खुला हुआ, और मनुष्य के पुत्र को परमेश्वर के दाहिनी ओर देखा; स्वर्ग का प्रकाश उसके चेहरे पर ऐसा पड़ा कि वह चमक उठा। यह भी स्मरण करो कि मूसा जब पर्वत से उतरा तो उसका चेहरा कैसे चमक रहा था; वह परमेश्वर के साथ संगति में रहा था। इसी प्रकार जब हम सचमुच परमेश्वर के साथ संगति में पहुँचते हैं, तो वह अपना मुख हमारी ओर करता है; और तब हमारे चेहरों पर उदासी के बदले चमक होगी, क्योंकि परमेश्वर ने हमारी प्रार्थनाएँ सुनी हैं और उनका उत्तर दिया है।

मैं विशेष रूप से तुम्हारा ध्यान मसीह की ओर दिलाना चाहता हूँ, जो सब बातों में हमारे लिये आदर्श है; और प्रार्थना से बढ़कर किसी बात में नहीं। हम पढ़ते हैं कि मसीह ने हर बात के लिये अपने पिता से प्रार्थना की। उसके जीवन के हर बड़े मोड़ से पहले प्रार्थना हुई। मैं कुछ स्थल उद्धृत करता हूँ। कुछ वर्ष पहले तक मैंने कभी ध्यान नहीं दिया था कि मसीह अपने बपतिस्मे के समय प्रार्थना कर रहा था। जब वह प्रार्थना कर रहा था, तो आकाश खुल गया, और पवित्र आत्मा उस पर उतरा। उसके जीवन की एक और बड़ी घटना उसका रूपान्तर था। “जब वह प्रार्थना कर ही रहा था, तो उसके चेहरे का रूप बदल गया, और उसका वस्त्र श्वेत होकर चमकने लगा।”

हम फिर पढ़ते हैं: “उन दिनों में वह पहाड़ पर प्रार्थना करने को निकला, और परमेश्वर से प्रार्थना करने में सारी रात बिताई।” यही एक स्थान है जहाँ लिखा है कि उद्धारकर्ता ने सारी रात प्रार्थना में बिताई। उसके बाद क्या होनेवाला था? जब वह पहाड़ से उतरा तो उसने अपने चेलों को अपने चारों ओर इकट्ठा किया, और वह महान उपदेश दिया जो पहाड़ी उपदेश कहलाता है—वह सबसे अद्भुत उपदेश जो नश्वर मनुष्यों को कभी सुनाया गया। सम्भवतः किसी और उपदेश ने इतनी भलाई नहीं की, और उससे पहले प्रार्थना की एक रात बीती थी। यदि हमारे उपदेशों को लोगों के हृदयों और विवेक तक पहुँचना है, तो हमें परमेश्वर से बहुत प्रार्थना करनी होगी, कि वचन के साथ सामर्थ्य हो।

यूहन्ना रचित सुसमाचार में हम पढ़ते हैं कि लाज़र की कब्र पर यीशु ने स्वर्ग की ओर आँखें उठाकर कहा: “हे पिता, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि तूने मेरी सुन ली है। और मैं जानता था, कि तू सदा मेरी सुनता है, परन्तु जो भीड़ आस-पास खड़ी है, उनके कारण मैंने यह कहा, जिससे कि वे विश्वास करें, कि तूने मुझे भेजा है।” ध्यान दो, कि मुरदे से बोलकर उसे जीवन देने से पहले वह अपने पिता से बोला। यदि हमारे आत्मिक रूप से मरे हुए प्रियजनों को जी उठना है, तो पहले हमें परमेश्वर के साथ सामर्थ्य पाना होगा। हम अपने संगी मनुष्यों के मन को छूने में इतनी बार इसलिए असफल होते हैं कि हम पहले परमेश्वर के साथ सामर्थ्य पाए बिना उन्हें जीतने का प्रयत्न करते हैं। यीशु अपने पिता के साथ संगति में था, और इसलिए उसे निश्चय था कि उसकी प्रार्थनाएँ सुनी गई हैं।

हम फिर यूहन्ना के बारहवें अध्याय में पढ़ते हैं कि उसने पिता से प्रार्थना की। मैं सोचता हूँ कि यह सारी बाइबल के सबसे दुःखभरे अध्यायों में से एक है। वह यहूदी जाति को छोड़कर जगत के पाप के लिये प्रायश्चित्त करने को था। सुनो वह क्या कहता है: “अब मेरा जी व्याकुल हो रहा है। इसलिए अब मैं क्या कहूँ? हे पिता, मुझे इस घड़ी से बचा? परन्तु मैं इसी कारण इस घड़ी को पहुँचा हूँ।” वह लगभग क्रूस की छाया तले था; मनुष्यजाति के अधर्म उस पर लादे जाने को थे; उसके बारह चेलों में से एक उसका इन्कार करने और शपथ खाकर कहने को था कि वह उसे कभी नहीं जानता था; दूसरा उसे चाँदी के तीस सिक्कों में बेचने को था; सब उसे छोड़कर भाग जानेवाले थे। उसका मन बहुत उदास था, और वह प्रार्थना करता है; जब उसका जी व्याकुल था, तब परमेश्वर ने उससे बात की। फिर गतसमनी की बारी में, जब वह प्रार्थना कर रहा था, तो स्वर्ग से एक दूत उसको दिखाई दिया जो उसे सामर्थ्य देता था। उसकी इस पुकार के उत्तर में, “हे पिता अपने नाम की महिमा कर”, वह महिमा में से उतरता हुआ एक शब्द सुनता है—“मैंने उसकी महिमा की है, और फिर भी करूँगा।”

हमारे प्रभु की एक और स्मरणीय प्रार्थना गतसमनी की बारी में हुई: “वह आप उनसे अलग एक ढेला फेंकने की दूरी भर गया, और घुटने टेककर प्रार्थना करने लगा।” मैं तुम्हारा ध्यान इस लिखे हुए तथ्य की ओर दिलाना चाहता हूँ कि चार बार, जब उद्धारकर्ता परमेश्वर से प्रार्थना कर रहा था, उत्तर सीधे स्वर्ग से उतर आया। पहली बार उसके बपतिस्मे के समय, जब आकाश खुल गया, और उसकी प्रार्थना के उत्तर में आत्मा उस पर उतरा। फिर, रूपान्तर के पर्वत पर, परमेश्वर प्रगट हुआ और उससे बोला। फिर जब यूनानी उसे देखने की इच्छा से आए, तो उसकी पुकार के उत्तर में परमेश्वर का शब्द सुनाई दिया; और फिर, जब उसने अपनी पीड़ा के बीच पिता की दुहाई दी, तो सीधा उत्तर दिया गया। मुझे सन्देह नहीं कि ये बातें इसलिए लिखी गई हैं कि हम प्रार्थना करने के लिये उत्साहित हों।

हम पढ़ते हैं कि उसके चेले उसके पास आए, और कहा, “हे प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखा दे।” यह कहीं नहीं लिखा कि उसने उन्हें प्रचार करना सिखाया। मैंने बहुत बार कहा है कि मैं जिब्राईल के समान प्रचार करना जानने की अपेक्षा दानिय्येल के समान प्रार्थना करना जानना अधिक चाहूँगा। यदि तुम अपने प्राण में प्रेम भर लो, ताकि प्रार्थना के उत्तर में परमेश्वर का अनुग्रह उतरे, तो लोगों तक पहुँचने में कोई कठिनाई न होगी। नाश होते प्राणों तक सुन्दर-सुन्दर उपदेशों के द्वारा नहीं पहुँचा जाएगा; हमें परमेश्वर की सामर्थ्य चाहिए, ताकि आशीष उतरे।

जो प्रार्थना हमारे प्रभु ने अपने चेलों को सिखाई, वह प्रायः प्रभु की प्रार्थना कहलाती है। मैं सोचता हूँ कि ठीक-ठीक कहें तो प्रभु की प्रार्थना वह है जो यूहन्ना के सत्रहवें अध्याय में है। यीशु की जो प्रार्थना लिखी हुई है, उनमें वही सबसे लम्बी है। तुम उसे धीरे-धीरे और ध्यान से लगभग चार-पाँच मिनट में पढ़ सकते हो। मैं सोचता हूँ कि हम यहाँ एक पाठ सीख सकते हैं। हमारे स्वामी की सबके सामने की गई प्रार्थनाएँ छोटी होती थीं; जब वह परमेश्वर के साथ अकेला होता था, तब बात और थी, और वह सारी रात अपने पिता के साथ संगति में बिता सकता था। मेरा अनुभव यह है कि जो लोग अपनी कोठरी में सबसे अधिक प्रार्थना करते हैं, वे प्रायः सबके सामने छोटी प्रार्थना करते हैं। लम्बी प्रार्थनाएँ बहुधा प्रार्थनाएँ होती ही नहीं, और वे लोगों को थका देती हैं। चुंगी लेनेवाले की प्रार्थना कितनी छोटी थी: “हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर!” सूरूफिनीकी स्त्री की प्रार्थना तो और भी छोटी थी: “हे प्रभु, मेरी सहायता कर!” वह सीधे निशाने पर पहुँची, और जो वह चाहती थी वह उसे मिल गया। क्रूस पर के डाकू की प्रार्थना भी छोटी थी: “हे यीशु, जब तू अपने राज्य में आए, तो मेरी सुधि लेना!” पतरस की प्रार्थना यह थी, “हे प्रभु, मुझे बचा, नहीं तो मैं नाश हो जाऊँगा!” इस प्रकार, यदि तुम पवित्रशास्त्र में देखो, तो पाओगे कि जिन प्रार्थनाओं का तुरन्त उत्तर मिला, वे प्रायः छोटी थीं। हमारी प्रार्थनाएँ मुद्दे की हों, बस परमेश्वर को यह बताएँ कि हमें क्या चाहिए।

यूहन्ना के सत्रहवें अध्याय में हमारे प्रभु की प्रार्थना में हम पाते हैं कि उसने सात विनतियाँ कीं—एक अपने लिये, चार अपने आस-पास के चेलों के लिये, और दो आनेवाले युगों के चेलों के लिये। उस एक ही प्रार्थना में वह छः बार दोहराता है कि परमेश्वर ने उसे भेजा है। जगत उसे एक धोखेबाज समझता था; और वह चाहता था कि वे जान लें कि वह स्वर्ग से भेजा गया है। वह नौ बार जगत की चर्चा करता है, और अपने चेलों और उन पर जो उस पर विश्वास करते हैं, पचास बार बात करता है।

क्रूस पर मसीह की अन्तिम प्रार्थना छोटी थी: “हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये जानते नहीं कि क्या कर रहें हैं।” मैं विश्वास करता हूँ कि उस प्रार्थना का उत्तर मिला। हम पाते हैं कि वहीं क्रूस के सामने एक रोमी सूबेदार का मन फिर गया। सम्भवतः यह उद्धारकर्ता की प्रार्थना के उत्तर में हुआ। मैं विश्वास करता हूँ कि डाकू का मन-फिराव हमारे धन्य प्रभु की उसी प्रार्थना के उत्तर में हुआ। हो सकता है तरसुस के शाऊल ने उसे सुना हो, और जब वह दमिश्क की ओर जा रहा था तो वे शब्द उसके पीछे-पीछे चलते रहे हों; ताकि जब प्रभु मार्ग में उससे बोला, तो उसने वह शब्द पहचान लिया हो। एक बात हम निश्चय जानते हैं; कि पिन्तेकुस्त के दिन प्रभु के कुछ शत्रुओं का मन फिर गया। निश्चय यह उस प्रार्थना के उत्तर में हुआ, “हे पिता, इन्हें क्षमा कर!”

इससे हम देखते हैं कि आत्मिक जीवन के अभ्यासों में प्रार्थना का स्थान बहुत ऊँचा है। परमेश्वर के सब लोग प्रार्थना करनेवाले लोग रहे हैं। उदाहरण के लिये, बैक्सटर को देखो! उसने अपनी प्रार्थना की साँसों से अपने अध्ययन-कक्ष की दीवारों पर दाग डाल दिए; और पवित्र आत्मा का अभिषेक पाने के बाद उसने किडरमिन्स्टर पर जीवन के जल की नदी बहा दी, और सैकड़ों लोगों का मन फिराया। लूथर और उसके साथी परमेश्वर से ऐसी सामर्थी विनती करनेवाले लोग थे कि उन्होंने युगों का जादू तोड़ दिया, और जातियों को वश में करके क्रूस के चरणों में ला डाला। जॉन नॉक्स ने विश्वास की अपनी बलवन्त भुजाओं में सारे स्कॉटलैंड को थाम लिया; उसकी प्रार्थनाओं से अत्याचारी काँपते थे। व्हाइटफील्ड अपनी कोठरी में बहुत पवित्र और विश्वासयोग्य विनती करने के बाद शैतान के मेले में गया, और एक ही दिन में एक हज़ार से अधिक प्राणों को सिंह के पंजे से निकाल लाया। देखो, प्रार्थना करनेवाला वेस्ली दस हज़ार से अधिक प्राणों को प्रभु की ओर फेरता है! प्रार्थना करनेवाले फिन्नी को देखो, जिसकी प्रार्थनाओं, विश्वास, उपदेशों और लेखों ने इस सारे देश को हिला दिया है, और समुद्र के दोनों ओर की कलीसियाओं में आशीष की एक लहर भेज दी है।

डॉ. गुथरी प्रार्थना और उसकी आवश्यकता के विषय में यों कहते हैं: “आत्मिक जीवन का पहला सच्चा चिन्ह, प्रार्थना, उसे बनाए रखने का साधन भी है। मनुष्य जैसे साँस लिए बिना शारीरिक रूप से नहीं जी सकता, वैसे ही प्रार्थना किए बिना आत्मिक रूप से भी नहीं जी सकता। जीवों की एक जाति है—ह्वेल जैसे समुद्री जीव, जो न मछली हैं न समुद्री पक्षी—जो गहरे समुद्र में रहते हैं। वही उनका घर है, वे उसे छोड़कर कभी किनारे पर नहीं आते; फिर भी, यद्यपि वे उसकी लहरों के नीचे तैरते और उसकी सबसे अन्धेरी गहराइयों को नापते हैं, उन्हें बार-बार सतह पर आना पड़ता है कि हवा में साँस ले सकें। इसके बिना गहरे समुद्र के ये राजा उस घने तत्व में जीवित नहीं रह सकते जिसमें वे जीवित रहते, और चलते फिरते, और स्थिर रहते हैं। और जो कुछ उन पर शारीरिक आवश्यकता से लादा गया है, उसी के समान कुछ मसीही को आत्मिक आवश्यकता से करना पड़ता है। बार-बार परमेश्वर की ओर ऊपर चढ़कर, प्रार्थना के द्वारा ईश्वरीय अनुग्रह की आपूर्ति के लिये एक ऊँचे और शुद्ध लोक में उठकर ही वह अपना आत्मिक जीवन बनाए रखता है। इन जीवों को सतह पर आने से रोक दो, तो वे साँस के बिना मर जाते हैं; मसीही को परमेश्वर की ओर उठने से रोक दो, तो वह प्रार्थना के बिना मर जाता है। ‘मुझे भी सन्तान दे,’ राहेल ने पुकारा, ‘नहीं तो मर जाऊँगी।’ ‘मुझे साँस लेने दो,’ हाँफता हुआ मनुष्य कहता है, ‘नहीं तो मैं मर जाऊँगा।’ ‘मुझे प्रार्थना करने दो,’ मसीही कहता है, ‘नहीं तो मैं मर जाऊँगा।’”

“जब से मैंने,” डॉ. पेसन ने विद्यार्थी होते हुए कहा, “अपनी पढ़ाई पर परमेश्वर की आशीष माँगनी आरम्भ की है, तब से मैंने एक सप्ताह में उससे अधिक काम किया है जितना उससे पहले सारे वर्ष में किया था।” लूथर ने, जब वह काम से सबसे अधिक दबा हुआ था, कहा, “मुझे इतना काम करना है कि प्रतिदिन तीन घंटे प्रार्थना किए बिना मेरा काम नहीं चल सकता।” और केवल धर्मशास्त्री ही प्रार्थना के विषय में ऊँचे विचार नहीं रखते और ऊँची बातें नहीं कहते; जीवन के हर पद और स्थिति के लोगों ने ऐसा ही अनुभव किया है। यदि कूच का समय छः बजे होता, तो जनरल हैवलॉक चार बजे उठ जाते थे, ताकि निकलने से पहले परमेश्वर के साथ संगति के अनमोल सौभाग्य को न खोएँ। सर मैथ्यू हेल कहते हैं: “यदि मैं सवेरे प्रार्थना करना और परमेश्वर का वचन पढ़ना छोड़ दूँ, तो सारे दिन कुछ भी ठीक नहीं होता।”

“मेरे समय का बड़ा भाग,” मैकचेन ने कहा, “अपने हृदय को प्रार्थना के लिये सुर में लाने में बीतता है। यही वह कड़ी है जो पृथ्वी को स्वर्ग से जोड़ती है।”

इस विषय पर व्यापक दृष्टि डालने से पता चलेगा कि सच्ची प्रार्थना के लिये नौ तत्व आवश्यक हैं। पहला है आराधना; आरम्भ में ही हम परमेश्वर से बराबरी के स्तर पर नहीं मिल सकते। हमें उसके पास यह जानकर जाना चाहिए कि वह हमारी पहुँच और दृष्टि से बहुत परे है। अगला है अंगीकार; पाप को मार्ग से हटाना ही होगा। जब तक हमारे और परमेश्वर के बीच कोई भी अपराध खड़ा है, तब तक हमारी उससे कोई संगति नहीं हो सकती। यदि तुमने किसी मनुष्य के साथ कोई अन्याय किया है और वह बीच में खड़ा है, तो जब तक तुम उसके पास जाकर अपना दोष न मान लो, तब तक तुम उस मनुष्य की कृपा की आशा नहीं कर सकते। एक और तत्व भरपाई है; जहाँ तक सम्भव हो, हमें अन्याय की भरपाई करनी है। उसके बाद धन्यवाद है; परमेश्वर ने अब तक हमारे लिये जो किया है, उसके लिये हमें धन्यवादी होना चाहिए। फिर आती है क्षमा, और फिर एकता; और फिर ऐसी प्रार्थना के लिये, जैसी ये बातें उत्पन्न करती हैं, विश्वास होना चाहिए। इन सब से प्रभावित होकर हम सीधी विनती करने को तैयार होंगे। हम बहुत सी ऐसी प्रार्थना सुनते हैं जो केवल उपदेश देना है, और यदि तुम उस मनुष्य की आँखें बन्द न देखो, तो समझोगे कि वह प्रचार कर रहा है। फिर, बहुत कुछ जिसे प्रार्थना कहा जाता है, केवल दोष निकालना है। हमारी प्रार्थनाओं में और अधिक विनती होनी चाहिए। इन सब के बाद अधीनता आनी चाहिए। प्रार्थना करते समय हमें परमेश्वर की इच्छा को स्वीकार करने के लिये तैयार रहना चाहिए। हम इन नौ तत्वों पर विस्तार से विचार करेंगे, और अपनी खोज को ऐसी घटनाएँ देकर समाप्त करेंगे जो दिखाती हैं कि ऐसी शर्तों के अधीन प्रार्थनाओं के उत्तर पाना हमारे लिये कितना निश्चित है।

प्रार्थना की घड़ी

“प्रभु, तेरी उपस्थिति में बिताई एक छोटी घड़ी
हमारे भीतर कैसा परिवर्तन ले आती है!
कैसे भारी बोझ हमारे मन से उतार देती है;
कैसी सूखी भूमि को मानो वर्षा से हरा कर देती है।

“हम घुटने टेकते हैं—और चारों ओर सब कुछ धुँधला लगता है;
हम उठते हैं—और सब कुछ, दूर का भी और पास का भी,
धूप में उजली, साहसी और स्पष्ट रेखाओं में खड़ा दिखता है;
हम घुटने टेकते हैं: कितने निर्बल!—हम उठते हैं: कितने सामर्थी!

“तो फिर हम क्यों अपने साथ यह अन्याय करें,
या दूसरों के साथ—कि हम सदा बलवन्त न रहें?
कि हम सदा चिन्ता से दबे रहें;
कि हम कभी निर्बल या निरुत्साहित हों,
व्याकुल या घबराए हुए, जबकि हमारे साथ प्रार्थना है,
और आनन्द, और बल, और साहस तेरे साथ हैं?”

ट्रेंच।

अध्याय 1 पूरा हुआ

बाइबल की प्रार्थनाएँ

पृष्ठ 1 / 1 · 17 मिनट अध्याय में शेष