मसीह में पवित्र
पवित्रता और क्रूस पर चढ़ाया जाना

अध्याय 18 · 14 मिनट का पठन

पवित्रता और क्रूस पर चढ़ाया जाना

‘उनके लिये मैं अपने आपको पवित्र करता हूँ ताकि वे भी सत्य के द्वारा पवित्र किए जाएँ।’—यूहन्ना 17:19।

‘फिर यह भी कहता है, देख, मैं आ गया हूँ, ताकि तेरी इच्छा पूरी करूँ। उसी इच्छा से हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार बलिदान चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं। क्योंकि उसने एक ही चढ़ावे के द्वारा उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है।’—इब्रानियों 10:9, 10, 14।

गतसमनी और कलवरी की ओर जाते हुए, अपनी महायाजकीय प्रार्थना में यीशु ने पिता से यों कहा था: ‘मैं अपने आपको पवित्र करता हूँ।’ इससे कुछ ही पहले उसने अपने विषय में कहा था कि वह ‘पुत्र है जिसे पिता ने पवित्र ठहराकर जगत में भेजा है।’ पवित्रशास्त्र की भाषा से हम इस विचार से परिचित हैं कि जिसे परमेश्वर ने पवित्र किया है, उसे मनुष्य को भी पवित्र करना होता है। पुत्र को पवित्र करने में पिता का कार्य ही अपने आपको पवित्र करने में पुत्र के कार्य का आधार और नींव है। यदि मनुष्य के रूप में उसकी पवित्रता उसकी स्वतंत्र और निजी सम्पत्ति होनी थी, जिसे उसने स्वेच्छा से और सचेत होकर, अपने ही निर्णय से ग्रहण करके आत्मसात् किया हो, तो इतना पर्याप्त न था कि पिता उसे पवित्र करे: उसे अपने आपको भी पवित्र करना था।


हमारे प्रभु का यह अपने आपको पवित्र करना उसके पूरे जीवन भर होता रहा, परन्तु उसके क्रूस पर चढ़ाए जाने में यह अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है और विशेष स्पष्टता से प्रगट होता है। यह किस बात में है, यह इब्रानियों की पत्री के वचनों से स्पष्ट हो जाता है। मसीहा ने कहा: ‘देख, मैं आ गया हूँ, ताकि तेरी इच्छा पूरी करूँ।’ और फिर आगे कहा गया है, ‘उसी इच्छा से हम यीशु मसीह की देह के बलिदान चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं।’ मसीह की देह का बलिदान चढ़ाया जाना ही परमेश्वर की इच्छा थी: उस इच्छा को पूरी करने में उसने हमें पवित्र किया। अपनी देह के बलिदान में उसी इच्छा को पूरी करने के विषय में उसने कहा था, ‘मैं अपने आपको पवित्र करता हूँ ताकि वे भी सत्य के द्वारा पवित्र किए जाएँ।’ गतसमनी की पीड़ा में अपनी इच्छा को परमेश्वर की इच्छा के आगे सौंप देना, और फिर मृत्यु तक की आज्ञाकारिता में उस इच्छा को पूरी करना, यही मसीह का अपने आपको और हमें भी पवित्र करना था। आओ, हम इसे समझने का यत्न करें।

परमेश्वर की पवित्रता उसकी इच्छा में प्रगट होती है। ईश्वरीय सत्ता में भी पवित्रता का कोई नैतिक मूल्य नहीं, जब तक कि वह स्वतंत्र रूप से चाही न गई हो। त्रिएकता की चर्चा करते हुए धर्मविज्ञानियों ने दिखाया है कि जहाँ पिता सनातन भलाई की पूर्ण अनिवार्यता को दर्शाता है, वहाँ पुत्र उसकी स्वतंत्रता को प्रमाणित करता है: ईश्वरीय सत्ता के भीतर वह प्रेम में चाही जाती है। और पृथ्वी पर पुत्र का यही कार्य था कि मानव जीवन की परीक्षाओं और प्रलोभनों के बीच, किसी भी मूल्य पर, पिता की इच्छा को ग्रहण करे और दृढ़ता से थामे रहे, और अपने पूरे मन से उसे चाहे। ‘पुत्र होने पर भी, उसने दुःख उठा-उठाकर आज्ञा माननी सीखी।’ गतसमनी में मानव स्वभाव की इच्छा और ईश्वरीय इच्छा के बीच का संघर्ष अपनी चरम सीमा पर पहुँचा: वह ऐसी भाषा में प्रगट होता है जिसे सुनकर हम उसकी निष्पापता के विषय में लगभग काँप उठते हैं, क्योंकि वह अपनी इच्छा की बात परमेश्वर की इच्छा के विरोध में करता है। परन्तु यह संघर्ष एक विजय है, क्योंकि अपनी इच्छा रखने का क्या अर्थ है, इसकी अत्यन्त स्पष्ट चेतना के रहते हुए भी, वह उसे त्याग देता है और कहता है, ‘तेरी इच्छा पूरी हो।’ परमेश्वर की इच्छा में प्रवेश करने के लिये वह अपना प्राण तक दे देता है। इस प्रकार अपने क्रूस पर चढ़ाए जाने में वह पवित्रता की व्यवस्था को प्रगट करता है। पवित्रता हमारी इच्छा का परमेश्वर की इच्छा में पूर्ण प्रवेश है। या यों कहें, पवित्रता परमेश्वर की इच्छा का ऐसा प्रवेश है जो हमारी इच्छा की मृत्यु बन जाए। हमारी इच्छा का एकमात्र अन्त, और उससे एकमात्र छुटकारा, परमेश्वर के धर्मी न्याय के अधीन उसके प्रति मर जाना है। क्रूस की मृत्यु के लिये अपने आपको सौंप देने में ही मसीह ने अपने आपको पवित्र किया, और हमें पवित्र किया, ताकि हम भी सत्य के द्वारा पवित्र किए जाएँ।

और अब, जैसे पिता ने उसे पवित्र किया, और उसने उसके बल पर उसे अपनाकर अपने आपको पवित्र किया, वैसे ही हमें भी, जिन्हें उसने पवित्र किया है, उसे अपने लिये अपनाना है। क्रूस पर चढ़ाए जाने के सिवा, अर्थात् अपने आपको मृत्यु के हाथ सौंप देने के सिवा, और किसी रीति से मसीह उस पवित्रता को साकार नहीं कर सकता था जो उसे पिता से मिली थी। और किसी दूसरी रीति से हम भी उस पवित्रता को साकार नहीं कर सकते जो हमें उसमें मिली है। उसकी अपनी और हमारी पवित्रता पर क्रूस की एक ही छाप लगी है। हम पहले देख चुके हैं कि आज्ञाकारिता पवित्रता का मार्ग है। मसीह में हम देखते हैं कि सिद्ध पवित्रता का मार्ग सिद्ध आज्ञाकारिता है। और वह है मृत्यु तक की आज्ञाकारिता, प्राण तक दे देने की, हाँ, क्रूस की मृत्यु तक की। क्योंकि जो पवित्रता मसीह ने अपनी देह के बलिदान तक जाकर हमारे लिये पूरी की, उस पर मृत्यु की छाप लगी है, इसलिए जब तक हम अपने आप और उसकी इच्छा के प्रति न मरें, तब तक हम उसके भागी नहीं हो सकते, उसमें प्रवेश नहीं कर सकते। क्रूस पर चढ़ाया जाना ही पवित्रता का मार्ग है।

यह पाठ उन सब बातों से मेल खाता है जो हम देख चुके हैं। मूसा पर परमेश्वर की पवित्रता का पहला प्रकाशन इस आज्ञा के साथ हुआ था, उतार दे। परमेश्वर की यह स्तुति, कि वह पवित्रता के कारण महाप्रतापी और स्तुति करनेवालों के भय के योग्य है, मिस्रियों की लोथों के ऊपर गाई गई थी। जब सीनै पर मूसा को पर्वत को पवित्र रखने की आज्ञा दी गई, तब कहा गया, ‘जो कोई उसे छूए, चाहे पशु हो चाहे मनुष्य, वह जीवित न बचे।’ परमेश्वर की पवित्रता हर उस वस्तु के लिये मृत्यु है जो पाप के सम्पर्क में है। केवल मृत्यु के द्वारा, लहू बहाए जाने के द्वारा ही, परमपवित्र स्थान में प्रवेश हो सकता था। मसीह ने मृत्यु को चुना, हाँ, श्राप के रूप में मृत्यु को, ताकि वह हमारे लिये अपने आपको पवित्र करे, और हमारे लिये पवित्रता का, परमपवित्र स्थान का, उस पवित्र का मार्ग खोल दे। और आज भी ऐसा ही है। कोई मनुष्य परमेश्वर का दर्शन करके जीवित नहीं रह सकता। केवल मृत्यु में, अर्थात् अपने आपे की और स्वभाव की मृत्यु में ही, हम निकट आकर परमेश्वर को देख सकते हैं। मसीह ने मार्ग दिखाया। कोई मनुष्य परमेश्वर का दर्शन करके जीवित नहीं रह सकता। ‘तो हे प्रभु, मुझे मरने दे,’ किसी ने पुकारकर कहा है, ‘परन्तु तेरा दर्शन तो मुझे करना ही है।’ हाँ, परमेश्वर धन्य हो, मसीह में हमारा भाग और उसके साथ हमारी एकता इतनी वास्तविक है कि हम उसकी मृत्यु में जीवित रह सकते हैं; जब दिन-प्रतिदिन अपना आपा मृत्यु के स्थान में रखा जाता है, तब मसीह का जीवन और उसकी पवित्रता हमारी हो सकती है।

और मृत्यु का वह स्थान कहाँ है? और वह क्रूस पर चढ़ाया जाना, जो पवित्रता तक और परमेश्वर तक ले जाता है, हम में कैसे पूरा हो सकता है? परमेश्वर का धन्यवाद हो! यह हमारा अपना कोई काम नहीं, अपने आपको क्रूस पर चढ़ाने की कोई थका देनेवाली प्रक्रिया नहीं। जिस क्रूस पर चढ़ाए जाने से हमें पवित्र होना है, वह एक पूरा हो चुका तथ्य है। क्रूस पर यह झण्डा फहराता है, ‘पूरा हुआ।’ उसी पर मसीह ने हमारे लिये अपने आपको पवित्र किया, ताकि हम सत्य के द्वारा पवित्र किए जाएँ। हमारा क्रूस पर चढ़ाया जाना, हमारी पवित्रता के समान, ऐसी बात है जो मसीह में पूरी और सिद्ध रीति से पूरी हो चुकी है। ‘हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार बलिदान चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं।’ ‘उसने एक ही चढ़ावे के द्वारा उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है।’ उस परिपूर्णता में, जिसके विषय में पिता की प्रसन्नता यह है कि वह मसीह में वास करे, हमारे पुराने मनुष्यत्व का, शरीर का, संसार का, और हमारे अपने आप का क्रूस पर चढ़ाया जाना, सब एक आत्मिक वास्तविकता है; जो मसीह की लालसा करता है, उसे जानता है और ग्रहण करता है, वह यह सब उसमें पूरी रीति से पा लेता है। और जब वह मसीह, जिसे पहले अधिकतर उसके क्षमा करनेवाले, जिलानेवाले और उद्धार करनेवाले अनुग्रह में जाना गया था, अब फिर से पाप की सामर्थ्य से सच्चे छुड़ानेवाले के रूप में, पवित्र करनेवाले के रूप में खोजा जाता है, तो वह आता है और प्राण को अपनी इच्छा के बलिदान की सहभागिता में उठा लेता है। ‘उसने अपने ही बलिदान के द्वारा पाप को दूर कर दिया,’ यह बात जैसे उसके विषय में सच है, वैसे ही हमारे विषय में भी सच होनी चाहिए। वह प्रगट करता है कि उसके उद्धार का एक भाग यह है कि वह हमें ऐसी इच्छा का भागी बनाए जो पूरी रीति से परमेश्वर की इच्छा को सौंप दी गई हो, ऐसे जीवन का भागी बनाए जिसने अपने आपको मृत्यु के हाथ सौंप दिया था और फिर परमेश्वर की सामर्थ्य से मरे हुओं में से लौटा दिया गया था, ऐसा जीवन जिसका आत्मा और जिसकी सामर्थ्य अपनी इच्छा का क्रूस पर चढ़ाया जाना ही था। वह इसे प्रगट करता है, और जो प्राण इसे देखता है, और इसके लिये सहमत होता है, और अपनी इच्छा और अपना जीवन सौंप देता है, और यीशु पर अपनी मृत्यु और अपने जीवन के रूप में, और उसके क्रूस पर चढ़ाए जाने पर अपनी सम्पत्ति और अपनी मीरास के रूप में विश्वास करता है, वह उसके आनन्द और अनुभव में प्रवेश करता है। अब उसकी भाषा यह होती है, ‘मैं मर गया ताकि जीवित रहूँ: मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, और अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है।’ और अब जो जीवन वह जीता है, वह परमेश्वर के पुत्र पर के विश्वास से है, अर्थात् उसे प्रतिदिन विश्वास से ग्रहण करने से, जो हमारे भीतर एक ऐसी मृत्यु की सामर्थ्य में जीवित है जिसमें से वह होकर निकल चुका है और जो सदा के लिये पूरी हो चुकी है।

‘उनके लिये मैं अपने आपको पवित्र करता हूँ ताकि वे भी सत्य के द्वारा पवित्र किए जाएँ।’ ‘मैं आ गया हूँ, ताकि हे परमेश्वर तेरी इच्छा पूरी करूँ। उसी इच्छा से,’ अर्थात् परमेश्वर की उस इच्छा से जिसे मसीह ने पूरा किया, ‘हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार बलिदान चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं।’ आओ, हम इसे समझें और दृढ़ता से थामे रहें: मसीह का गतसमनी में अपनी इच्छा को त्याग देना और मरने में परमेश्वर की इच्छा को स्वीकार करना; मसीह का क्रूस की मृत्यु तक की आज्ञाकारिता में उस इच्छा को पूरी करना, यही उसका अपने आपको पवित्र करना है, और यही हमारा सत्य के द्वारा पवित्र किया जाना है। ‘उसी इच्छा से हम पवित्र किए गए हैं।’ अपने आपे के प्रति मृत्यु, अर्थात् अपने ही जीवन को, उसकी इच्छा, उसकी सामर्थ्य और उसके लक्ष्यों समेत, पूरी रीति से और नितान्त रूप से क्रूस को और मसीह के क्रूस पर चढ़ाए जाने में सौंप देना, प्रतिदिन क्रूस उठाए फिरना—ऐसा क्रूस नहीं जिस पर हमें अभी चढ़ाया जाना है, परन्तु क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह का वह क्रूस जिसमें मार डालने और मृतक कर देने की सामर्थ्य है—यही पवित्रता के जीवन का भेद है—यही सच्ची पवित्रता है।

हे विश्वासी! क्या यही वह पवित्रता है जिसे तुम खोज रहे हो? क्या तुमने यह देखा है और इस बात से सहमत हुए हो कि केवल परमेश्वर ही पवित्र है, कि अपना आपा पूरी रीति से अपवित्र है, और कि पवित्र बनाए जाने का इसके सिवा कोई मार्ग नहीं कि ईश्वरीय पवित्रता की आग भीतर आकर अपने आपे की मृत्यु बन जाए? ‘यीशु की मृत्यु को अपनी देह में हर समय लिये फिरना, कि यीशु का जीवन भी हमारे मरनहार शरीर में प्रगट हो’—यही हर उस जन का मार्ग है जो सत्य के द्वारा पवित्र किया जाना चाहता है, ठीक जैसे उसने अपने आपको पवित्र किया; ठीक यीशु के समान पवित्र किया जाना।

उसने हमारे लिये अपने आपको पवित्र किया, ताकि हम भी सत्य के द्वारा पवित्र किए जाएँ। हाँ, हमारी पवित्रता उसकी पवित्रता पर, स्वयं उस पर, टिकी है और उसी में जड़ पकड़े हुए है। और हम उसमें हैं। हमारे अस्तित्व की गुप्त जड़ें यीशु में रोपी गई हैं: जितना हम देख या अनुभव कर सकते हैं उससे कहीं अधिक गहराई में, वहाँ वह हमारी दाखलता होकर हमें सम्भाले रहता है और जीवन देता है। आओ, हम विश्वास से यह समझें कि ऐसी रीति से और ऐसी मात्रा में जो हमारी समझ से बहुत परे है, जो अत्यन्त ईश्वरीय और वास्तविक है, हम उसमें हैं जिसने हमारे लिये अपने आपको पवित्र किया। आओ, हम वहीं वास करें, जहाँ परमेश्वर ने हमें रखा है। और आओ, हम पिता के सामने घुटने टेकें, कि वह हमें यह दान दे कि हम उसके आत्मा से सामर्थ्य पाकर बहुत बलवन्त हों, कि मसीह हमारी पवित्रता के रूप में हमारे हृदयों में बसे, कि उसकी मृत्यु और उसके जीवन की सामर्थ्य हम में प्रगट हो, और परमेश्वर की इच्छा हम में वैसे ही पूरी हो जैसे उसमें हुई।

पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।

हे पवित्र पिता! तेरे इस अनमोल और धन्य वचन के लिये, तेरे प्रिय पुत्र के इस अनमोल और धन्य कार्य के लिये मैं तुझे धन्य कहता हूँ। उसकी कभी न रुकनेवाली मध्यस्थता में तू सदा यह अद्भुत प्रार्थना सुनता है, ‘उनके लिये मैं अपने आपको पवित्र करता हूँ ताकि वे भी सत्य के द्वारा पवित्र किए जाएँ।’

हे धन्य पिता! मैं तुझसे विनती करता हूँ कि अपने आत्मा के द्वारा मुझे सामर्थ्य देकर बहुत बलवन्त कर, ताकि जीवित विश्वास से मैं उस पवित्रता को ग्रहण कर सकूँ और उसमें जी सकूँ जो मेरे प्रभु यीशु में मेरे लिये तैयार की गई है। मुझे आत्मिक समझ दे कि मैं जान सकूँ कि इसका क्या अर्थ है कि उसने अपने आपको पवित्र किया, कि मेरी पवित्रता उसकी पवित्रता में सुरक्षित है, और कि जब मैं विश्वास से उसमें बना रहता हूँ, तो उसकी सामर्थ्य मेरे पूरे जीवन पर छाई रहेगी। उसकी पवित्रता सचमुच मेरी पवित्रता की व्यवस्था हो, जैसे वह उसका जीवन है। तेरी पितृ-इच्छा के प्रति उसका समर्पण, उसकी निरन्तर निर्भरता और आज्ञाकारिता, उसकी जड़ और उसका बल हो। संसार और पाप के प्रति उसकी मृत्यु उसका दैनिक नियम हो। सबसे बढ़कर, स्वयं वही, हे मेरे पिता! स्वयं वही, जो मेरे लिये पवित्र किया गया, वह जीवित यीशु, मेरा एकमात्र भरोसा और सहारा हो। उसने मेरे लिये अपने आपको पवित्र किया, ताकि मैं भी सत्य के द्वारा पवित्र किया जाऊँ।

हे प्रिय उद्धारकर्ता! इस अद्भुत अनुग्रह के लिये मैं कैसे ठीक रीति से तुझे धन्य कहूँ, तुझसे प्रेम करूँ और तेरी महिमा करूँ! तूने अपने आपको दे दिया, ताकि अब मैं तुझमें पवित्र हूँ। मैं अपने आपको देता हूँ, ताकि तुझमें मैं भी सत्य के द्वारा पवित्र किया जाऊँ। आमीन। हे प्रभु यीशु! आमीन।

1. ‘यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आपका इन्कार करे और अपना क्रूस उठाए, और मेरे पीछे हो ले।’ यीशु का अर्थ यह है कि हमारा जीवन ठीक उसके जीवन की प्रतिछाया हो, यहाँ तक कि क्रूस पर चढ़ाए जाने में भी। ऐसे जीवन का आरम्भ अपने आपका इन्कार करना है, ताकि मसीह को उसका स्थान मिले। यहूदी अपने आपका इन्कार नहीं करना चाहते थे, परन्तु उन्होंने ‘उस पवित्र का तिरस्कार किया, और जीवन के कर्ता को मार डाला।’ चुनाव अब भी मसीह और अपने आपे के बीच है। आओ, हम उस अपवित्र का इन्कार करें, और उसे मृत्यु के हाथ सौंप दें।

2. इस मार्ग के पग ये हैं: पहले, यह सोच-समझकर किया गया निर्णय कि अपना आपा मृत्यु के हाथ सौंप दिया जाए; फिर, क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह के प्रति समर्पण, कि वह हमें अपने क्रूस पर चढ़ाए जाने का भागी बनाए; फिर, ‘यह जानकर कि हमारा पुराना मनुष्यत्व क्रूस पर चढ़ाया गया,’ वह विश्वास जो कहता है, ‘मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ;’ और फिर, क्रूस पर चढ़ाए गए जन के रूप में जीने की, और मसीह के क्रूस का घमण्ड करने की सामर्थ्य।

3. यही परमेश्वर का ठहराया हुआ पवित्रता का मार्ग है, एक ईश्वरीय भेद, जिसे केवल पवित्र आत्मा ही प्रतिदिन हम में बनाए रख सकता है। परमेश्वर धन्य हो, यह वह जीवन है जिसे एक मसीही जी सकता है, क्योंकि मसीह हम में जीवित है।

4. मुख्य विचार यह है: हम मसीह में हैं, जिसने अपनी इच्छा त्याग दी और परमेश्वर की इच्छा पूरी की। पवित्र आत्मा के द्वारा जो स्वभाव उसमें था वह हम में है, अपनी इच्छा क्रूस पर चढ़ा दी गई है, और हम परमेश्वर की इच्छा में जीते हैं।


अठारहवाँ दिन।

अध्याय 18 पूरा हुआ

पवित्रता और क्रूस पर चढ़ाया जाना

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