मसीह में पवित्र
प्रस्तावना

अध्याय 1 · 5 मिनट का पठन

प्रस्तावना


पवित्रशास्त्र में पवित्र शब्द से बढ़कर कोई ऐसा शब्द नहीं जो अपने उद्गम और अर्थ में इतना स्पष्ट रूप से ईश्वरीय हो। ऐसा कोई शब्द नहीं जो हमें ईश्वरत्व के भेद में इससे ऊँचा ले जाए, और न परमेश्वर की सन्तानों के विशेषाधिकार और धन्यता में इससे गहरा उतारे। फिर भी यह ऐसा शब्द है जिसका बहुत-से मसीहियों ने न कभी अध्ययन किया है, और न उसे समझा है।

ऐसे लोग थोड़े नहीं जो परमेश्वर की स्तुति कर सकते हैं कि पिछले बीस वर्षों में पवित्र बनो का नारा बहुत-सी कलीसियाओं और मसीही मण्डलियों में पहले से कहीं अधिक गम्भीरता के साथ अपनाया गया है। पुस्तकों और पत्रिकाओं में, सम्मेलनों और सभाओं में, विश्वासियों की गवाहियों और जीवनों में, हमें इस बात के भरपूर चिह्न मिलते हैं कि जिसे पवित्रता-आन्दोलन कहा जाता है, वह एक वास्तविकता है।

फिर भी अभी कितनी कमी है! विश्वास करनेवाले मसीहियों की कैसी भीड़ है जिनके मन में पवित्रता क्या है, इसके विषय में अत्यन्त धुँधले विचारों के सिवा और कुछ नहीं! और जो इसकी खोज में लगे हैं, उनमें से कितने ऐसे हैं जिन्होंने अभी तक मुश्किल से यह सीखा है कि उस शिक्षा के लिये परमेश्वर के वचन और स्वयं परमेश्वर के पास आना क्या है, जो अकेली ही मसीह और परमेश्वर के भेद के इस भाग को प्रकट कर सकती है! बहुतों के लिये पवित्रता केवल मसीही जीवन के अधिक गम्भीर रूप का एक सामान्य नाम रही है, और इस पर अधिक विचार नहीं किया गया कि इस शब्द का वास्तव में अर्थ क्या है।

यह छोटी-सी पुस्तक लिखने में मेरा उद्देश्य यह खोजना रहा है कि परमेश्वर इस शब्द को किस अर्थ में प्रयोग करता है, ताकि हमारे लिये भी इसका वही अर्थ हो जो उसके लिये है। पवित्रशास्त्र के जिन सबसे महत्त्वपूर्ण स्थलों में यह शब्द आता है, उनमें से कुछ में मैंने इसका पीछा करने का यत्न किया है, ताकि वहीं यह सीखूँ कि परमेश्वर की पवित्रता क्या है, हमारी पवित्रता कैसी होनी है, और वह मार्ग कौन-सा है जिससे हम उसे प्राप्त करते हैं। मुझे विशेष चिन्ता यह दिखाने की रही है कि जो तत्त्व मिलकर सच्ची पवित्रता बनाते हैं—वह पवित्रता जो अपनी सारी भरपूरी और सिद्धता में मसीही जीवन की ईश्वरीय अभिव्यक्ति है—वे कितने अनेक और विविध हैं। साथ ही मैंने निरन्तर यह भी ध्यान में रखने का यत्न किया है कि यीशु के व्यक्तित्व में केन्द्रित होने के कारण उसमें कैसी अद्भुत एकता और सरलता है। जैसे-जैसे मैं अपने काम में आगे बढ़ा, मैंने और भी गहराई से अनुभव किया कि दूसरों को परमप्रधान के पवित्रस्थान के बाहरी आँगनों तक भी ले चलने का प्रस्ताव करके मैंने कितना ऊँचा काम अपने हाथ में लिया है। फिर भी इस काम की कठिनाई ने ही मुझे यह निश्चय दिला दिया कि यह कितना आवश्यक था।

मुझे डर है कि कुछ लोगों को यह पुस्तक निराश कर सकती है। उन्होंने सुना है कि पवित्रता के जीवन में प्रवेश प्रायः केवल एक कदम की बात होती है। उन्होंने ऐसे विश्वासियों के विषय में सुना है या उन्हें देखा है जो बता सकते थे कि जब से उन्होंने विश्वास के द्वारा पवित्रता का अद्भुत भेद पाया, तब से उनके जीवन में कैसा धन्य परिवर्तन आया है। और अब वे इस भेद की खोज में हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि यह भेद उन्हें नहीं मिलता जो इसे खोजते हैं, परन्तु केवल उन्हें मिलता है जो यीशु को खोजते हैं। वे बड़ी चाह से एक ऐसी पुस्तक चाहते कि पवित्रता और उस तक पहुँचने के मार्ग के विषय में जो कुछ उन्हें जानना आवश्यक है, वह सब थोड़े-से सरल पाठों में इकट्ठा कर दिया गया हो, जिन्हें सीखना, स्मरण रखना और व्यवहार में लाना आसान हो। ऐसी पुस्तक उन्हें यहाँ नहीं मिलेगी। यीशु के चेलों के लिये आज भी पिन्तेकुस्त जैसी बात होती है; परन्तु वह उसे मिलती है जिसने केवल यीशु के पीछे चलने के लिये सब कुछ छोड़ दिया है, और पूरी रीति से पीछे चलते हुए स्वामी को यह अवसर दिया है कि वह उसे डाँटे और सिखाए। पाप से छुड़ानेवाले उद्धारकर्ता के रूप में मसीह के बहुधा बड़े धन्य प्रकाशन होते हैं, एकान्त कोठरी में भी और पवित्र लोगों की सभाओं में भी; परन्तु वे उन्हीं को दिए जाते हैं जिनके लिये वे तैयार किए गए हैं, और जो उन्हें ग्रहण करने के लिये तैयार किए गए हैं। सब लोग यीशु पर भरोसा रखना और उसमें आनन्दित होना सीखें, चाहे उनका अनुभव वैसा न भी हो जैसा वे चाहते हैं। वह हमें पवित्र बनाएगा। परन्तु चाहे हमने यीशु को अपनी पवित्रता मानकर उस पर विश्वास के धन्य जीवन में प्रवेश कर लिया हो, चाहे हम अब भी दूर से उसकी लालसा कर रहे हों, हम सब को एक ही बात की आवश्यकता है: हमारे परमेश्वर के कहे हुए हर एक वचन को सरल, विश्वासपूर्ण और आज्ञाकारी मन से ग्रहण करना। मेरी हार्दिक इच्छा रही है कि उसके धन्य वचन में लिखे हुए, युगों-युगों में हुए परमेश्वर की पवित्रता के अद्भुत प्रकाशन का अपने भाइयों के साथ पीछा करते हुए, मैं उनके विश्वास में सहायक बन सकूँ। मेरी निरन्तर प्रार्थना रही है कि परमेश्वर इस लिखे हुए का उपयोग करके अपनी सन्तानों में यह दृढ़ निश्चय बढ़ाए कि हमें पवित्र होना ही है; यह ज्ञान बढ़ाए कि हम कैसे पवित्र हों; यह आनन्द बढ़ाए कि पवित्र होना हमारा सौभाग्य है; और यह विश्वास बढ़ाए कि हम पवित्र हो सकते हैं। और वह हम सब को उभारे कि हम रात-दिन उसकी दुहाई दें कि उसकी सारी प्रजा पर पवित्रता के आत्मा और पवित्रता की सामर्थ्य का आगमन हो, ताकि मसीही और पवित्र जन, ये दोनों नाम एक ही अर्थ रखें, और हर एक विश्वासी ऐसा पात्र हो जो पवित्र किया गया और स्वामी के काम आने योग्य हो।

ए. एम.

वेलिंगटन, 16 नवम्बर 1887।

पृष्ठ 1 / 1 · 5 मिनट अध्याय में शेष