परमेश्वर के लिये साहसी
जॉर्ज म्यूलर: वह मनुष्य जिसने नाश्ते के लिये प्रार्थना की

अध्याय 4 · 2 मिनट का पठन

जॉर्ज म्यूलर: वह मनुष्य जिसने नाश्ते के लिये प्रार्थना की

जब जॉर्ज म्यूलर जर्मनी में एक छोटा बालक था, तब वह बिलकुल भी अच्छा न था। वह झूठ बोलता था, और चोरी करता था — यहाँ तक कि अपने ही पिता से भी — और सोलह वर्ष का होने से पहले ही वह बन्दीगृह में जा पहुँचा। ऐसा लगता था मानो पूरी पृथ्वी पर वही सबसे अन्तिम व्यक्ति हो जो कभी विश्वास का वीर बन सके।

परन्तु जॉर्ज की भेंट यीशु से हुई, और सब कुछ बदल गया। वह इंग्लैंड के ब्रिस्टल नगर में जा बसा, और वहाँ उसने एक ऐसी बात देखी जिससे उसका हृदय टूट गया: ऐसे बच्चे जिनके न माता थीं न पिता, जो सड़कों पर सोते थे, भूखे और अकेले। जॉर्ज ने ठान लिया कि वह उनके लिये एक घर बनाएगा।

फिर उसने एक और भी अचम्भे की बात ठानी। वह उस घर को इस रीति से चलाएगा कि सब लोगों को दिखाई दे कि परमेश्वर कितना सच्चा है। वह किसी एक भी व्यक्ति से कभी पैसा न माँगेगा। वह न तो माँगनेवाली चिट्ठियाँ भेजेगा, और न ही यह संकेत देगा कि उसके पास कमी है। वह केवल परमेश्वर ही को अपनी आवश्यकता बताएगा, और प्रतीक्षा करता रहेगा।

एक प्रसिद्ध सवेरे, बच्चे लम्बी मेज़ों पर बैठ गए, और उनके सामने उनकी थालियाँ और प्याले रखे थे — परन्तु घर में तो कुछ भी खाने को न था, और न ही कुछ खरीदने के लिये पैसा। जॉर्ज खड़ा हुआ और जो नाश्ता वे खाने ही वाले थे उसके लिये उसने परमेश्वर का धन्यवाद किया, यद्यपि वहाँ खाने को कुछ भी न था।

ज्यों ही उसने प्रार्थना समाप्त की, त्यों ही द्वार पर खटखटाहट हुई। बाहर एक रोटी बनानेवाला खड़ा था। उसने कहा कि रात को उसे नींद नहीं आई, और उसे ऐसा लगा कि उसे उठकर बच्चों के लिये रोटी सेंकनी चाहिए, और देखो, यह रही — अब भी गरम। फिर से खटखटाहट हुई। यह दूधवाला था: उसकी गाड़ी ठीक बाहर ही टूट गई थी, और वह नहीं चाहता था कि दूध खराब हो जाए — क्या बच्चे इसे लेना चाहेंगे? आखिरकार उस सवेरे बच्चों ने नाश्ता कर ही लिया।

ऐसी बातें केवल एक ही बार नहीं हुईं। अपने लम्बे जीवन में जॉर्ज म्यूलर ने दस हज़ार से भी अधिक अनाथों की देखभाल की, और उन्हें गरम रखने, खिलाने और सिखाने के लिये बड़े-बड़े घर बनाए। और इन सब में उसने परमेश्वर के सिवा किसी और से कुछ न माँगा।

जॉर्ज म्यूलर चाहता था कि सारा संसार एक सरल बात देखे: कि परमेश्वर सुनता है, और परमेश्वर देता है। उसने इसे चतुराई भरे शब्दों से नहीं, परन्तु दस हज़ार बच्चों के द्वारा प्रमाणित किया, जो हर रात पेट भरकर सोने जाते थे, क्योंकि जर्मनी के एक बुरे बालक ने प्रार्थना करना सीख लिया था।

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